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आयोजन

अशोक बाजपेयी ने 21 लाख रुपये का श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान खुद के पास रख लिया, आयोजक बना हथियारों का सौदागर अभिषेक वर्मा!

Poster commemorating Shri Kant Varma's 95th birth anniversary with a portrait of a smiling man in glasses, floral accents, and Hindi event details.

जितेंद्र कुमार-

फेसबुक से पता चला कि कवि, नौकरशाह और रजा फॉउंडेशन के कर्ता-धर्ता अशोक वाजपेयी जी ने खुद के लिए श्रीकान्त वर्मा शिखर सम्मान अपने पास रख लिया है!

मेरी जानकारी के मुताबिक पिछले साल कांग्रेस के पूर्व सांसद व हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा के हथियारों के सौदागर व कई-कई अन्य धन्धों में लिप्त रहने वाले सुपुत्र अभिषेक वर्मा ने अपनी खोयी साख वापस पाने के लिए अशोक वाजपेयी से आग्रह किया था कि आप श्रीकांत वर्मा के नाम पर एक पुरस्कार समिति का संयोजक बनें और जिसे उपयुक्त समझे, उन्हें यह पुरस्कार दें, मैं बस राशि मुहैया कराऊंगा. उन्होंने संयोजकत्व का भार संभाला, पिछले साल यह जानने के लिए एक महती कार्यक्रम करवाया कि “लोग-बाग क्या कहते” हैं, लेकिन पुरस्कार किसी को नहीं दिया.

थोड़ी-बहुत फेसबुकिया हलचल के अलावा सबने इसे स्वीकार कर लिया. इसलिए इस बार अवसर का लाभ उठाकर 21 लाख रुपए का यह पुरस्कार हिन्दी साहित्य में एकमात्र मौजूद “शलाका पुरुष” अशोक वाजपेयी ने 85 साल की उम्र में यह पुरस्कार खुद अपने पास रख लिया! वैसे जो लोग इस बात को जानते हैं, वे भी भलीभांति जानते हैं कि उनकी पैसे में इतनी दिलचस्पी नहीं है जितना यश ‘पाने या कमाने’ में है!

खैर…. हिन्दी पत्रकारिता की तरह हिन्दी साहित्य में भी कोई आस नहीं देख पाता हूं (मैं अपनी रोजी-रोटी इसी से कमाता हूं) कारण तो आप जानते ही हैं- वहां 90 फीसदी की हैसियत देश-समाज की तरह बिल्कुल नहीं रहने दी गयी है!


पुष्प रंजन-

साहित्य और सियार

जम्बूदीपे भारतखण्डे में पिंगलक नामक एक सियार रहता था. दशकों पहले की बात है, जंगल के राजा ने सियरे की क़ाबिलियत को देखकर भोजपाल अभ्यारण्य का प्रशासनिक अधिभार उसके हवाले कर दिया। प्रभावशाली व्यक्तिव वाले दँते सियार में स्वतःस्फूर्त साहित्यिक अभिरुचि जगी. वो साहित्य में गंभीर भाव-भंगिमा के साथ हुआँ-हुआँ करने लगा.

सियार ने देखते-देखते देश-विदेश के अभ्यारण्यों में अपनी दुकान जमा ली. सियारिनें भी उसके इर्द-गिर्द जमा होने लगीं। सियार रिटायर होने तक अपने मठ स्थापित कर चुका था. वयोवृद्ध हो चुके इस सियार की क़िस्मत देखिये, एक दिन अचानक उसे अलादीन जैसा एक चिराग़ हाथ लग गया. उस चिराग़ का नाम था-‘अजा-बजा-रजा चिराग़’। उस जादुई चिराग़ की चमक से प्रभावित नृत्य-संगीत-साहित्य और मीडिया के तमाम महत्वाकांक्षी जीव-जंतु, ज़ईफ़-जर्जर पिंगलक के गिर्द जमा होने लगे.

सियार शिरोमणि को अपनी चतुराई पर बहुत भरोसा था, और उसके साथी उसके भरोसे को बनाए रखते थे। वह कोई तरकीब सुझाता, साथी वाह-वाह करते, और अक्सर तरकीब चल जाती। सालों से यही हो रहा था। अब सियार अत्यंत बूढ़ा हो चला है, लेकिन भौतिक-लौकिक सुख की ललक और लपक कम नहीं हुई है.

इस बीच सियार की दोस्ती दमनक नामक हाथी से हो गई. गजराज को जहाँ गरज होती, उस दिशा में चल देता, जंगल के सारे जानवर दमनक को हसद और हसरत भरी नज़रों से देखते। उसकी दबंगई से कुढ़ते, पीठ पीछे गरियाते भी. पर सामने पड़ जाने पर दमनक की विद्वता पर आह-वाह करते। दमनक की देहभाषा डरावनी होती, चुनांचे बाक़ी कछुए-खरगोश किनारा कर लेते।

चतुर सियार ने कुछेक और सियार अपने हुजरे में बुला लिये। पिंगलक के हुजरे में पधारा हुआ एक सियार हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में हुआँ-हुआँ करता है. पाटलीपुत्र से लेकर हस्तिनापुर के जंगल तक उसकी पहचान स्थापित हो चुकी थी. लेकिन, सभी सियार जुगाड़ भिड़ाने में पिंगलक से उन्नीस पड़ते थे, उम्र में भी और क़द में भी। सियारों में एक बात एक जैसी थी। वे पिंगलक से पूछते कुछ नहीं थे। वह तरकीब बताता और वे चल देते, और अगर तरकीब काम कर जाती तो वे कहते कि इसे तो सिर्फ़ पिंगलक ही सोच सकता था। अगर काम न करती तो वे इसका ज़िम्मा हालात पर डाल देते, और सीनियर मोस्ट सियार उन्हें रोकता नहीं था।

सियार गैंग की तरकीबें ज़्यादातर एक ही क़िस्म की होती थीं। मोटा बकरा फाँसो, और उसे हलाल करो. लेकिन, इसबार जंगल के राजा ने जिस जेल रिटर्न शैववर्णी बकरे को सियार के शिकार के वास्ते छोड़ा है, उसमें फँस चुका है पुरस्कार वापसी गैंग का सरगना पिंगलक. जम्बूदीपे भारतखण्डे के राजा ने उस बजरंगी बकरे का डीएनए चेंज कर उसे एनडीए की खाल पहना दी, फिर शिकार के लिए जंगल में छोड़ दिया।

सियार शिरोमणि ने सर्वाधिक मालदार पुरस्कार का चक्रव्यूह क्या रचा जंगल में आग की तरह ख़बर फ़ैल गई. सियार श्री पिंगलक ने साथी सियारों को चयन समिति में डाला, फिर पुरस्कार की मुनादी अपने नाम करवा ली. इस सीनियर मोस्ट सियार के महामस्तिकाभिषेक की सूचना पर जंगल के बाक़ी जानवर थू -थू करने लगे. इस चौतरफ़ा थुक्कम-फ़ज़ीहत को रोकने के लिए सियार श्री पिंगलक ने अपने पक्ष में प्रशंसा अभियान आरम्भ करवाया है. साहित्य के इस जंगल के ज़्यादातर जानवर, दिमाग़ नहीं लगाते। और एक-दूसरे पर शक भी नहीं करते, क्योंकि शक करने में मेहनत लगती है।


कृष्ण देव कल्पित-

जिस रस्ते से आता था शव
उस रस्ते से जाता है शव!

कल दिल्ली में विख्यात कवि श्रीकांत वर्मा की स्मृति में शिवसेना, आर एस एस और श्रीकांत वर्मा फाउंडेशन के तत्वावधान में श्रीकांत वर्मा की स्मृति में एक आयोजन हुआ।

Stage with a panel of speakers seated on chairs, a podium on the left, banners flanking the stage, and an audience in red seats below.

इसमें भाग लेने वाले थे अशोक वाजपेयी, ओम थानवी और विनोद भारद्वाज। ये सब लिबरल कहलाते हैं लेकिन हैं अवसरवादी। अचूक अवसरवादी!

जबसे श्रीकांत वर्मा के आर्म्स दलाली में कभी पकड़े गए बदनाम बेटे अभिषेक वर्मा ने, श्रीकांत वर्मा के नाम से इक्कीस लाख के पुरस्कार की घोषणा की है, तब से हिन्दी के कवियों लेखकों की जहाँ से पूँछ झड़ गई थी, वहाँ मीठी खुजली चल रही है।

इक्कीस लाख का सबसे बड़ा पुरस्कार! अवा को न ज्ञानपीठ मिला, न सरस्वती, न व्यास। इसकी भरपाई वे श्रीकांत वर्मा पुरस्कार से करने वाले हैं।

पहला श्रीकांत वर्मा पुरस्कार अशोक वाजपेयी को मिलेगा। यह मेरी भविष्यवाणी है।

अवा के विरुद्ध ललित कला अकादमी में रहते हुए भ्रष्टाचार के जो गंभीर आरोप सीबीआई ने लगाए थे, वह केस अभी बंद नहीं हुआ है। ठंडे बस्ते में है। अभिषेक वर्मा शायद बच गए हैं। कब तक? पता नहीं।

हमारे मित्र विनोद भारद्वाज के बारे में तो यही कहा जा सकता है कि वे हर उस जगह उपस्थित रहते हैं, जहां कोई भी संभावना हो।

समारोह सभागार शिवसैनिकों से भरा हुआ था और वहां सावरकर और गोडसे को महिमा मंडित किया जा रहा था और ये लोग दुम दबाए हुए चुपचाप बैठे हुए थे और संस्मरण सुन/सुना रहे थे। शर्मनाक!

मूल खबर…

कवि, आलोचक अशोक वाजपेयी को श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान!

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