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दस ग्राम बायस्ड सोच के चलते हम अभिनव के 100 किलो एफर्ट्स को इग्नोर नहीं कर सकते!

Man with a beard in a dark kurta speaks into a microphone during an outdoor interview at night.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर आफ मीडिया स्टडीज से पढ़कर निकले मेरे प्रतिभाशाली छात्र अभिनव पांडे और उनकी साहसिक पत्रकारिता के बारे में सिद्धार्थ अरोड़ा की सामायिक टिप्पणी पढ़ने के बाद में इसे शेयर करने से खुद को रोक न सका। पत्रकारिता का विशुद्ध उद्देश्य क्या है और एक ईमानदार पत्रकार को कैसा होना चाहिए अभिनव ने अपनी जिम्मेदारी भरी पत्रकारिता और मेहनत से यह सब साबित किया है। सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’ को पढ़ा जाए…
-एसके यादव


सिद्धार्थ अरोड़ा-

अभिनव पांडे, इन्होंने पिछले साल 15 अगस्त से ही, अपना खुद का चैनल न्यूज़ पिन्च शुरु किया और अभी एक साल होने में पूरे 25 दिन बाक़ी हैं और इनके यूट्यूब पर साढ़े सत्रह लाख फॉलोवर्स हो चुके हैं। फेसबुक पर 16 लाख फॉलोवर्स हैं और इंस्टाग्राम पर 11 लाख।

ये आदमी कल से लगातार सड़कों पर ही दिख रहा है। जब हमारे 12-15 करोड़ का पैकेज लेने वाले अति-फ़ेमस मीडिया कर्मी स्टूडियोज़ में बैठे कुर्सियाँ तोड़ रहे हैं, तब ये बंदा दिल्ली की सड़कों पर कभी लाठी खा रहा है, कभी स्टूडेंट्स से सवाल कर रहा है कभी उन्हें समझा रहा है तो आज शाम 5 बजे से पीएम आवास के बाहर राहुल के प्रदर्शन को कवर कर रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अभिनव पांडे और उनके साथ सौरभ त्रिपाठी सेंटर से लेफ्ट वाले हैं। मौजूदा सरकार के खिलाफ़ जो भी आता है वो इनका फेवरेट है, कोई बात नहीं। हर पत्रकार की अपनी आइडीआलजी होती ही है, होनी भी चाहिए। लेकिन इस 10 ग्राम बायस्ड सोच के चलते हम अभिनव के 100 किलो एफर्ट्स को इग्नोर नहीं कर सकते।

एक समय पत्रकारों के पास एसी स्टूडियोज़ में चिल्लाने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं होता था। मौका ए जुलूस की तस्वीरें और वीडियोज़ भी एएनआई और पीटीआई भरोसे स्क्रीन पर दिखाते रहते थे। या ग्राउन्ड पर रेपोर्टिंग के लिए कोई इन्टर्न या जूनियर रिपोर्टर होता था, जिसका अंतिम लक्ष्य तो न्यूज़ रूम तक पहुँचना ही था।

वो मेन लट्ठबाजी से 20 मीटर की दूरी बनाकर रेपोर्टिंग करता था और दो घंटे बाद छोले कुलचे खाकर लौट आता था।

अभिनव पांडे को मैं लगातार भीड़, लाठीचार्ज, मंच आदि में घुसते देख रहा हूँ। ये आदमी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। कल रात ढाई बजे जंतर-मंतर पर था। फिर सुबह घर आया, कपड़े बदले, और फिर सड़कों पर।

जबकि ये कोई नया-नया जर्नलिस्ट नहीं है जिसे स्टूडियो में घुसने का लालच हो; इस भाई के पास 12 साल का अनुभव है, अपना खुद का स्टूडियो है, फिर भी पूरे जोश के साथ सड़कों से लड़कों की तस्वीरें और बाइट्स लगातार भेज रहा है। ग़जब।

बहुत बहुत बढ़िया अभिनव भाई। बहुत बढ़िया।”

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