आनंद स्वरूप वर्मा-
‘युद्ध संवाददाता’ अजीत अंजुम को सलाम

दिल्ली पुलिस की बर्बर दमनात्मक कार्रवाई के दौरान लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोलों के बीच जिस तरह अजीत अंजुम ने रिपोर्टिंग की उसे देखकर ऐसा ही लगता था जैसे कोई पत्रकार युद्ध के मैदान से रिपोर्टिंग कर रहा हो।
शिक्षा में प्रश्न पत्रों के लीक होने के मामले से पैदा संकट के नतीजे के तौर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा की मांग को लेकर देशभर के युवकों के आंदोलन ने कल से ही अभूतपूर्व रूप ले लिया जब राजधानी दिल्ली में संसद तक मार्च का उनका कार्यक्रम शुरू हुआ। उनकी तैयारी से लेकर आज तक के पिछले तीन-चार दिनों की रिपोर्टिंग को इस पत्रकार ने जितने संतुलित ढंग से अंजाम दिया वह प्रशंसनीय है।
इतना ही नहीं इसकी रिपोर्टिंग में मानवीय करुणा की भी झलक उस समय देखने को मिली जब वह पुलिस की लाठी से घायल युवकों और युवतियों को अस्पताल पहुंचाने के लिए पुलिस अधिकारियों से एंबुलेंस मंगाने की मांग करता रहा।
मोदी और शाह की सरकार ने सपने में भी नहीं सोचा था कि आंदोलन इतना विराट रूप ले लेगा। जंतर मंतर ही नहीं बल्कि जनपथ, कनॉट प्लेस, टॉलस्टॉय मार्ग, हेली रोड हर जगह आंदोलनकारी युवकों के जत्थे दिखाई दे रहे थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्ता में बैठे कुछ लोगों ने सोच समझ कर ऐसे आंदोलन की योजना बनाई थी ताकि पर्चा लीक के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में छात्रों और युवकों को गोलबंद करने की राहुल गांधी की मुहिम को बाधित किया जाय लेकिन मौजूदा निजाम के प्रति युवकों के बीच गुस्सा इतना ज्यादा था कि आंदोलन उन लोगों के हाथ से निकल गया जिन्होंने एक योजना के तहत इसकी शुरुआत की थी।
1885 में जब एक अवकाश प्राप्त अंग्रेजी प्रशासक ए.ओ. ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की थी तो उसने भी यही सोचा था कि यह पार्टी अंग्रेजों के लिए सेफ्टी वॉल्व का काम करेगी लेकिन देश की वस्तुगत स्थितियां ऐसी तैयार हो गई थी कि इस पार्टी ने ही अंग्रेजों को देश से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया।
अत्यंत संदिग्ध परिस्थितियों में और काफी हद तक अज्ञात/संदिग्ध चरित्र के लोगों द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन कैसे विकसित होता गया, इस पर जल्दी ही लिखूंगा।
यह पोस्ट पत्रकार अजीत अंजुम के अभिवादन के लिए और लोगों से इस आग्रह के लिए है कि अजीत की रिपोर्टिंग को देखें। अकेले अजीत ही नहीं कम से कम पांच ऐसे यूट्यूब पत्रकारों को मैंने देखा जिन्होंने स्टूडियो में बैठकर रिपोर्टिंग करने की बजाय मैदान में जाने का जोखिम उठाया।


