मनीष दुबे-
संसद मार्च की कवरेज के दौरान कई स्थानों पर पत्रकारों के खिलाफ नारेबाजी और विरोध की घटनाओं ने मीडिया की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि मुख्यधारा के टीवी चैनलों की संपादकीय नीतियों या एंकरों की भूमिका को लेकर नाराजगी है, तो उसका खामियाजा ग्राउंड पर रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को क्यों भुगतना पड़ रहा है।
कई पत्रकारों और मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में टीवी समाचार चैनलों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर लगातार सवाल उठे हैं। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ चैनलों ने सत्ता के पक्ष में एकतरफा नैरेटिव प्रस्तुत किए, जिससे दर्शकों के एक वर्ग में मीडिया के प्रति अविश्वास बढ़ा है।
हालांकि, इसी बहस के बीच कई वरिष्ठ पत्रकारों ने स्पष्ट किया है कि स्टूडियो में संपादकीय फैसले लेने वाले एंकरों और ग्राउंड पर रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टरों के बीच फर्क किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि रिपोर्टर घटनास्थल पर केवल अपना पेशेवर दायित्व निभाते हैं और उन्हें किसी भी तरह की अभद्रता, धमकी या हिंसा का निशाना बनाना उचित नहीं है।
संसद मार्च के बाद सोशल मीडिया पर यही सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि मीडिया की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकती है, लेकिन खबर जुटाने वाले पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान भी उतना ही जरूरी है।
एक टीवी चैनल के एंकर-एंकरिनियाँ चिल्ला रहे हैं कि दंगाइयों ने पुलिस के साथ मारपीट की। धरना-प्रदर्शनकारियों को दंगाई कह रहे हैं और कुछ दृश्य भी दिखा रहे हैं, जिनमें दो पुलिसवालों को चोट लगी है।
यूट्यूब चैनल नहीं होते और जनता अपने मोबाइल पर वीडियो नहीं बनाती, तो जिस तरह एंकरों द्वारा नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, ग़लत ख़बर फैलाई जा रही है, उस पर हर व्यक्ति विश्वास कर लेता और प्रदर्शनकारियों को ग़लत मान बैठता।
इंटेलिजेंस की विफलता पर किसी चैनल पर बात नहीं हो रही है। कुछ चैनल तो दूसरी ख़बरें दिखा रहे हैं, लेकिन धरना-प्रदर्शन की बहुत कम। कितने बच्चों के हाथ-पैर टूट गए, सिर फट गए, कुछ बेहोश हो गए, कुछ लड़कियां रोने लगी अत्याचार से कुछ पर एफआईआर दर्ज कर दी गई। कुछ लोगों को उनके परिवार वाले खोज रहे हैं। इस पर कोई टीवी चैनल कुछ नहीं बोल रहा है।
भला हो यूट्यूब चैनल वालों का और उन लोगों का, जिन्होंने वीडियो बनाए और तस्वीरें खींचीं।
-शालिनी श्रीनेत


