नवीन कुमार-
दिल्ली का ऐवान-ए-गालिब सभागार मुश्किल से भरता है। ३१ जुलाई के रोज़ लगभग भरा हुआ था। मौका था प्रेमचंद की १४६वीं जयंती का। और इस जयंती के बहाने होने वाले हंस के सालाना वैचारिक जलसे का। इसकी पहचान राजेंद्र यादव की औघड़ बैठकी की तरह रही है। सप्तम सुर पर झोंके जा रहे भूतो न भविष्यति टाइप के विद्वानों के बीच विश्वविद्यालय का कोई छोकरा उठता और इतने बुनियादी सवाल उठा देता कि पूरी संगत ही विक्षत हो जाती। राजेंद्र जी ऐसे मौकों पर बहुत चतुराई से ख़ुद को एकदम अलग कर लेते थे और सवालों से निपटने के लिए विद्वान और विदुषी वक्ताओं को खुला छोड़ देते थे। वो इसे लोकतांत्रिकता कहते थे। राजेंद्र जी के जाने के बाद यह परंपरा लगभग क़ायम रही है। हंस ने कुछ ऐसे मुद्दों पर वैचारिकी को मोड़ने की कोशिश की है जिनसे हिंदी का शातिर समाज भागता रहा है। यही वजह है कि ऐसे इनामधन्य स्वनामधन्य पुरस्कृत अलंकृत सत्कृत लेखक-लेखिकाएं ग़ायब इस शानदार आयोजन से ग़ायब रहती हैं। कुछ आए भी थे तो हॉल में जाने से पहले रखे गए चाय समोसे सैंडविच के स्टॉल को ही धन्य करके चले गए थे। हिंदी विभागों के अध्यापकों और अध्यापिकाओं ने तो हंस के कार्यकरम का लगभग बहिष्कार ही कर दिया है।
खैर, इस बार का विषय था विकास, विस्थापन और आदिवासी। हंस के संपादक संजय सहाय ने विषय प्रवर्तन करते हुए बहुत गहराई और सूक्ष्मता के साथ पूरी चर्चा की एक दिशा निर्धारित कर दी थी। लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि उस लय को पूरी सभा मिलकर भी आगे नहीं ले जा सकी। अनुज लुगुन के संचालन में नंदिनी सुंदर, दयामनि बारला, जसिंता केरकेट्टा, विकास तिवारी (रानू तिवारी) और आशुतोष भारद्वाज ने अपनी बातें रखीं। सत्ता की घबराहट कहें या नैतिक बेईमानी या चालूपना, कई वक्ता तो किसी संगठन व्यक्ति समूह का नाम तक लेने से परहेज़ करते रहे। वो आदिवासियों के अस्तित्व से जुड़े सुलगते हुए विषय को एकेडेमिक थ्योरिटिकल फ्रेमवर्क से आगे देख पाने की हिम्मत ही नहीं जुटा सके। यह उनकी चेतना और दृष्टि का अभाव भी हो सकता है। हालांकि हम मानकर चलते हैं कि हंस के आमंत्रित वक्ता ऐसे नहीं होंगे लेकिन पिछले कुछ वर्षों के वक्ताओं ने निराश किया है।
सारे वक्ता बोलकर बैठ चुके थे। उनमें से अकेले विकास तिवारी ही ऐसे थे जो सचमुच में आदिवासियों के बीच रहते हैं। उन्हें बस्तर जगदलपुर के आदिवासियों के एक समूह का विश्वास भी हासिल है। उन्होंने बहुत विस्तार से बताया कि कैसे आदिवासी विकास में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं और अपनी ज़मीन के मुआवजे से बेहतर जिंदगी के ख़्वाब बुनते हैं। बहुत ही महीन तरीके से उन्होंने इसे ख़ास तौर पर रेखांकित किया कि ये बात उन्हें अडानी के लिए लूटे गए जंगल के सामने जल, जंगल, ज़मीन बचाने के लिए प्रदर्शन कर रहे आदिवासियों में से ही कुछ लोगों ने कही। लेकिन सचमुच में मुझे जिस बात का इंतज़ार था वो यह कि विकास तिवारी अमित शाह के आदमी के तौर पर आदिवासियों का आत्मसमर्पण कराने के पीछे के लक्ष्यों पर बात करेंगे। वो इसे लेकर घोषित तौर पर गौरवबोध से भरे हुए हैं। लेकिन लगभग २० मिनट के उद्बोधन में उन्होंने इस सबसे महत्त्वपूर्ण चक्र को ही गोल कर दिया।
ग़ालिब ऑडिटोरियम उस वक्त सन्नाटे से भर गया जब मैंने उठकर साफ-साफ शब्दों में पूछा कि आप अमित शाह के उस ड्रीम प्रोजेक्ट का हिस्सा रहे हैं जिसमें उन्होंने ३१ मार्च २०२६ तक देश से नक्सलवाद खत्म कर देने की बात कही थी तो बताइए कि आदिवासियों के आत्मसमर्पण को लेकर अमित शाह के साथ आपकी क्या डील हुई है। यह जानना भयानक था कि मंच पर बैठा हर आदमी या तो इस तथ्य से नावाक़िफ़ है या उसने इस तथ्य को बहुत चतुराई के साथ छिपा लिया है। जब मैंने कहा कि आपने १७१ आदिवासियों के सरेंडर में भूमिका निभाई है तो विकास तिवारी ने गर्व के साथ मुझे सुधारते हुए कहा, १७१ नहीं २१०. सवाल सीधा था- आपने अमित शाह की तरफ़ से जिस मुख्यधारा में आदिवासियों को शामिल करने का झुनझुना थमाया है वह मुख्यधारा क्या है।
विकास तिवारी ने पहले तो इससे इंकार कर दिया कि वो अमित शाह के एजेंट हैं लेकिन बाद में उन्होंने ख़ुद कहा कि उनकी अमित शाह से बात हुई है। लेकिन साथ में यह भी कहा कि आदिवासियों से कोई वादा नहीं किया गया है। सरकार के पास इसका कोई रोडमैप नहीं है। यही वह बिंदु है जहां आदिवासियों के साथ छल का सिलसिला शुरु होता है। विकास तिवारी को इस बात से बड़ी समस्या थी कि जब वो बोलने आए हैं तो हॉल खचाखच भरा हुआ क्यों नहीं है। लेकिन उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि लाखों आदिवासियों के भविष्य पर उन्होंने बंद कमरे में अमित शाह के साथ क्या समझौता किया है। यह भेद खुल गया था कि मुख्यधारा नाम का जो विमर्श बहुत ही धूर्तता के साथ खड़ा किया गया है वो एक फर्जीवाड़े से ज्यादा कुछ नहीं है। या कहें यह मनुवादी व्यवस्था में गोली बंदूक़ के दम पर आदिवासियों को कोऑप्ट कर लेने की मक्कारी है ताकि उन्हें सस्ता मजदूर और गुलाम बनाया जा सके।
हंस को इस बात के लिए शुक्रिया कहा जाना चाहिए कि उसने मौजूद दर्शकों पाठकों श्रोताओं की भागीदारी से इस पूरे धागे को खुल जाने दिया। वर्ना मंचासीन लोगों ने तो इसे ज़मीन खोदकर दफ़्न कर दिया था। आदिवासियों के सबसे बुनियादी अधिकारों की तरह।


