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सुख-दुख

उन 8 बच्चों में से 5 डॉक्टर बन गए… लेकिन अब जो हालत है उसमें कमजोर तबके का कोई बच्चा डॉक्टर बनने का सपना नहीं देख सकता!

Surgeons in an operating room performing surgery with bright overhead lights and sterile gowns and masks.

सत्येंद्र पीएस-

डॉ भानु प्रताप सिंह युवा गैस्ट्रो सर्जन हैं. उन्होंने चिकित्सा की दुनिया की सबसे बड़ी डिग्रियाँ ली हैं. MBBS, MS और उसके बाद MCh की डिग्री ली. वह भी एम्स दिल्ली जैसे श्रेष्ठ संस्थान से. पढ़ने के बाद लखनऊ के प्रसिद्ध राम मनोहर लोहिया मेडिकल कॉलेज में पढ़ाने लगे.

वह बताते हैं कि पिताजी फार्मासिस्ट थे. गाँव में कोई खास खेती बाड़ी नहीं थी. पूरा परिवार 2 कमरे के सरकारी क्वार्टर में रहता था. हम लोग पढ़ने में अच्छे थे तो पिताजी के विभाग का एक बन्दा खुंदक खाता था और उनका ट्रांसफर करा देता था, जिससे कि इनके बच्चों की पढ़ाई चौपट हो जाए. एक बार तो पिताजी को मेडिकल लीव लेकर रुकना पड़ा कि क्वार्टर न खाली करना पड़े और बोर्ड का एग्जाम पूरा हो पाए.

उस सरकारी क्वार्टर में भानु के 4 साल ऊपर नीचे उम्र के 8 बच्चे थे और उनमें से ज्यादातर पिता के निजी संकट और आर्थिक संकट वाले थे. इनके परिवार पर ज्यादा ही संकट था, क्योंकि बच्चे ज्यादा होनहार थे.

लेकिन बच्चों के मन में आ गया कि हम डॉक्टर बन जाएं तो दुख दूर हो जाएगा! भानु बताते हैं कि हम लोग सुबह 4 बजे उठकर देखते थे कि किसके घर की लाइट जल रही है और फिर सभी बच्चों के घर की बत्ती जल जाती थी कि हमको पढ़ना है, डॉक्टर बनना है.

डॉ भानु से यह मैं सुनकर अचंभित और आश्चर्य चकित था कि उन 8 बच्चों में से 5 डॉक्टर बन गए! इतना शानदार स्ट्राइक रेट! उम्र में जो सबसे बड़े थे, डॉ राणा प्रताप सिंह हैं. उन्होंने MBBS, MS किया और उसके बाद न्यूरो सर्जरी में MCh किया. अभी वह गोरखपुर में ही अपना अस्पताल चला रहे हैं और न्यूरो के उभरते हुए जाने माने सर्जन हैं. डॉ भानु प्रताप सिंह के बारे में बताया ही. तीसरे डॉ सन्नी प्रताप सिंह हैं जिन्होंने MBBS और MD किया और इस समय एम्स रायपुर में बाल रोग शाखा से DM की पढ़ाई कर रहे हैं. दो का नाम मैं भूल गया!

अभी कल मेरे बचपन के मिमित्र देवेंद्र भट्ट आये थे. इंटर कॉलेज मे लेक्चरर हैं. बताने लगे कि इंटर यानी बारहवीं में बच्चों का इनरोलमेंट बहुत मामूली हो रहा है. हम लोगों के दौर मे एमजी इंटर कॉलेज, डी ए वी इंटर कॉलेज मे एडमिशन के लिए मारामारी रहती थी. इंटर के कम से कम 6 सेक्शन चलते थे. मेरे टाइम तो एमजी A से G तक 7 सेक्शन चलते थे और सब में 80 से ऊपर बच्चे. कभी सारे बच्चे आ जाएं तो 3 की बेंच पर 5 बच्चे बैठते थे. मेरे मार्क कम थे, मैथ्स मे एडमिशन नहीं हो रहा था तो मेरे नाना जी ने महंत अवैद्यनाथ जी से मैनेजर पी एन श्रीवास्तव से कहलवाकर मैथ्स मे एडमिशन कराया था. अब हालत यह है कि डी ए वी इंटर कॉलेज में 3 टीचरों को पढ़ाने के लिए केवल 40 बच्चों ने एडमिशन लिया है.

मैंने भट्ट जी से कहा कि अब CBSE और private की तरफ आकर्षण बढ़ा है लोगों का? तो उन्होंने बताया कि यूपी बोर्ड में संकट ज्यादा है लेकिन डेटा उठाकर देखिए तो CBSE में भी हाई स्कूल और इंटर में इनरोलमेंट कम हुआ है.

इसकी मुख्य वजह है कि गरीबों के सपने मार दिया गया है. गरीबों के बच्चों को पकौडा बेचने से लेकर ई रिक्शा चलाने के लिए प्रधानमन्त्री से लेकर शिक्षा मन्त्री तक विभिन्न मंचों से प्रोत्साहित कर रहे हैं और आप इस समय देख भी रहे होंगे कि नाबालिग बच्चे ई रिक्शा चलाते हैं और आये दिन लोगों के हाथ पांव टूट रहे हैं.

अब कोई कमजोर तबके का बच्चा डॉक्टर बनने का सपना नहीं देखता. मेडिकल कॉलेज की 65 प्रतिशत से ज्यादा सीट प्राइवेट है जहाँ 90 लाख से लेकर 2 करोड़ रुपये MBBS की फीस लगती है. बची खुची सरकारी सीटों मे पेपर लीक और तरह तरह की समस्या है. पाठ्यक्रम ऐसा बन गया है कि महंगे कोचिंग में पढ़े बच्चे के सलेक्ट होने के 90% चांस होते हैं. सेल्फ स्तडी की जगह बच्चे होम वर्क क्लास वर्क में फंसाए जा चुके है.

खुशी की बात है कि डॉ भानु प्रताप सिंह ने गोरखपुर में डाक्टरी करने का मन बना लिया है. लखनऊ में जब पिछली बार मिले थे तो 5 वरिष्ठ डॉक्टरों को बिठाकर उनको कनविंस करने की कोशिश की कि लखनऊ मे प्रैक्टिश करिये. गोरखपुर में न पैसा है न सकून है. चिरकुट टाइप गरीब मरीजों से पाला पड़ेगा जो फीस देने में भी रोयेंगे.

डॉ भानु मुझे बगैर बताये लोहिया मेडिकल कॉलेज की प्रोफ़ेसरी छोड़कर भाग आये. इस बार महक को लेकर गोरखपुर आये तो यहाँ धरे गए, मेरे साले साहब के इलाके में! मैंने फिर कहा कि गोरखपुर कचरा है तो उन्होंने कहा कि नही सर, अब यहीं करेंगे!
मैंने सोचा कि यह लड़का अगर दस करोड़ रुपये खर्च करके डिग्री बटोरा होता तो क्या हालत होती इसकी? दस करोड़ रुपये कर्ज की मन्थली किस्त जुटाने के लिए तो किडनी बेच देनी पड़ती! गोरखपुर आने के बारे में तो सोचना भी मुश्किल होता!

बहुत अजीब लगता है कि अब समाज किस तरफ जा रहा है! हम लोग खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं. यह आखिरी पीढी है, डॉ भानु जैसे डॉक्टरों की जो पीढी बची है, उसको पकड़कर रखिए. वरना कब आपकी किडनी बिक जाए, पता भी नहीं चलेगा.

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