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वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा ने ‘स्वदेश’ के साथ अपनी दूसरी पारी भी समाप्त की!

कीर्ति राणा-

स्वदेश के साथ मेरा जुड़ाव 1978 में प्रूफ रीडर के रूप में तीन महीने का था। उज्जैन संपादक के रूप में 6 महीने का रहा।

आज से मैं उज्जैन स्वदेश के संपादक के दायित्व को छोड़ चुका हूं। इस्तीफा तो 26 सितंबर को इंदौर से उज्जैन बस से आने के दौरान ही सेंड कर दिया था, 30 सितंबर अंतिम दिन रहा। क्यों छोड़ दिया ? यदि यह जानने में आप की जिज्ञासा है तो यही कहना सही मानता हूं कि मैं प्रबंधन की उम्मीदों, अपेक्षाओं पर खरा साबित नहीं हो रहा था। स्वदेश के विचार, गरिमा अनुकूल काम फी नहीं कर पा रहा था। ऐसी स्थिति में मेरा जमीर नहीं कहता कि मैं प्रबंधन की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाऊं तो मुझे वेतन भी नहीं लेना चाहिए।

मुझे याद है जब करीब छह महीने विर्मश के बाद मार्च के द्वितीय सप्ताह में उज्जैन की जिम्मेदारी का निर्णय हुआ था, तब समूह संपादक अतुल तारे जी ने एक बात कही थी-कीर्ति जी हम गहन मंधन के बाद व्यक्ति को अपने साथ जोड़ते हैं फिर उसे छोड़ते (यानी निकालते) नहीं है। उनका यह वाक्य हर वक्त मेरे जेहन में रहने के साथ ही मन कचोटता रहता था कि जब मेरे परफार्मेंस से प्रबंधन संतुष्ट नहीं है तो मुझे महीनों को साल में बदलने की बेशर्मी भी नहीं दिखानी चाहिए।

तीन और छह महीने का उल्लेख इसलिये की 1978 में (स्व) कृष्ण कुमार अष्ठाना ने 125 रु वेतन पर प्रूफ रीडर के लिये मेरा चयन किया था। पहले ही दिन मामाजी (स्व) माणिकचंद वाजपेयी ने अपना लिखे संपादकीय की कॉपी और उसका गेली प्रूफ पढ़ने को दे दिया था-उनकी घिचिड़-पिचिड़ वाली लिखावट-वाला संपादकीय ठीक से पढ़ कर ओके करना ही मेरी परीक्षा थी।

कुछ ऐसा संयोग बना कि कवि-प्रोफेसर सरोज कुमार के एक सुझाव को स्वीकार कर मैंने बॉंबे (मुंबई) जाने की सहमति देने के साथ ही स्वदेश को टाटा-बाय बाय कर दिया था।

अब 6 महीने बाद वही हालात बन गए। स्वदेश के स्टेट ब्यूरो चीफ अनुराग उपाध्याय से चर्चा तो 2025 के अंत से चल रही थी। भाई पंकज मुकाती को इस ऑफर की जानकारी दी तो उन्होंने सुझाव दिया स्वदेश के लिये गुड़ी पड़वा से श्रेष्ठ दिन हो ही नहीं सकता। हिंदू नव वर्ष गुड़ी पड़वा 19 मार्च को ज्वाइन करवाने भी अनुराग भाई और इंदौर स्वदेश के मुख्य महाप्रबंधक आनंद खेडकर संपादक शक्ति सिंह परमार आए थे। उस दिन से अब तक मैं नाम का संपादक इसलिए कह सकता हूं कि प्रबंधन के लिए खुद को काम का संपादक साबित नहीं कर सका। मन कचोटता रहता था, मुझे लगा कि तनाव मुक्त होने का बेहतर विकल्प टाटा-बाय-बाय कहने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।

आगे क्या? कोई ऑफर, कहीं चर्चा, कुछ नहीं। मेरा शुरू से विश्वास रहा है जो हुआ, अच्छा हुआ, जो होगा अच्छा होगा। जब एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुलता भी है।

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