धनबाद। कभी झारखंड में प्रसार के लिहाज से मजबूत माने जाने वाले दैनिक जागरण के धनबाद यूनिट में इन दिनों कथित गुटबाजी और अंदरूनी खींचतान का असर अखबार के कामकाज पर दिखाई देने की चर्चाएं तेज हैं। यूनिट से जुड़े सूत्रों का दावा है कि संपादकीय स्तर पर निगरानी कमजोर हुई है और इसका सीधा असर खबरों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक धनबाद संस्करण के स्थानीय पन्नों से लेकर फ्रंट पेज तक लगातार ऐसी गलतियां प्रकाशित हो रही हैं, जिन पर समय रहते ध्यान दिया जाना चाहिए था। सवाल यह है कि आखिर अखबार में प्रकाशित होने वाली सामग्री की अंतिम स्तर पर निगरानी और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी रह गई है।
धनबाद यूनिट में विज्ञापन और कथित पेड न्यूज का दबाव भी एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आ रहा है। अंदरूनी चर्चाओं के अनुसार संस्करण में विज्ञापन आधारित सामग्री की बढ़ती मौजूदगी और कथित पेड कंटेंट के कारण संपादकीय कंटेंट प्रभावित हो रहा है। इसके साथ ही यूनिट के प्रसार में लगातार गिरावट की बात भी कही जा रही है। हालांकि प्रसार संबंधी आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
सेवानिवृत्ति के बाद एक्सटेंशन को लेकर भी सवाल
यूनिट में अनुराग की सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें एक्सटेंशन दिए जाने को लेकर भी कर्मचारियों के एक वर्ग में असंतोष की चर्चा है। आरोप है कि इसके बाद यूनिट में एक खास वर्ग का प्रभाव बढ़ा है और प्रबंधन स्तर पर भी उसी वर्ग की पकड़ मजबूत हुई है।
हालांकि इन आरोपों पर संबंधित प्रबंधन या संबंधित व्यक्तियों का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। उनका पक्ष मिलने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
सूत्रों का कहना है कि कथित गुटबाजी का असर सिर्फ अंदरूनी माहौल तक सीमित नहीं है, बल्कि रिपोर्टिंग और डेस्क के कामकाज में भी इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है। स्थानीय रिपोर्टिंग से लेकर खबरों के संपादन और पेज बनाने तक मनमानी के आरोप लगाए जा रहे हैं।
6 अक्टूबर के फ्रंट पेज की सामग्री बनी ताजा मिसाल?
इन आरोपों के बीच 6 अक्टूबर 2026 के दैनिक जागरण धनबाद संस्करण के प्रथम पृष्ठ के बॉटम में प्रकाशित एक सामग्री को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि इस सामग्री में ऐसी संपादकीय खामियां थीं, जिन पर प्रकाशन से पहले ही ध्यान दिया जाना चाहिए था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि फ्रंट पेज पर प्रकाशित सामग्री में भी गंभीर स्तर की गलतियां रह जा रही हैं तो संपादकीय स्तर पर उसकी निगरानी कौन कर रहा है और गलती के लिए जवाबदेही किसकी तय होती है?
यूनिट से जुड़े लोगों का आरोप है कि जिन जिम्मेदारियों में लगातार खामियां सामने आने की शिकायतें हैं, वहां भी संबंधित लोगों को संरक्षण और आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है। इतना ही नहीं, आरोप है कि संपादकीय नेतृत्व की ओर से भी ऐसे लोगों को आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं की जा रही है।
गुटबाजी भारी या अखबार की गुणवत्ता?
दैनिक अखबार की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता, खबरों की गुणवत्ता और पाठकों का भरोसा होती है। ऐसे में यदि किसी यूनिट में आंतरिक गुटबाजी, विज्ञापन का दबाव, कथित पेड न्यूज और संपादकीय लापरवाही की शिकायतें लगातार सामने आ रही हों तो प्रबंधन के लिए इन सवालों की गंभीरता से जांच करना जरूरी हो जाता है।
धनबाद यूनिट से जुड़े लोगों का सवाल सीधा है—अगर अखबार के फ्रंट पेज तक में गलतियां पहुंच रही हैं और स्थानीय खबरों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं, तो आखिर जवाबदेही तय करने की जिम्मेदारी किसकी है?
अब देखना यह है कि दैनिक जागरण प्रबंधन धनबाद यूनिट में उठ रहे इन सवालों को गंभीरता से लेता है या फिर गुटबाजी और अंदरूनी समीकरणों के बीच अखबार की संपादकीय गुणवत्ता और प्रसार से जुड़े सवाल यूं ही बने रहते हैं।

