प्रियदर्शन-
‘माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रौंदे मोहे
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूंगी तोहे।’
दिल्ली के आंध्र एसोसिएशन के गोदावरी भवन के विशाल-ठंडे प्रेक्षागृह में कबीर का यह भजन गूंज रहा था और मुझे कुछ दिन पहले वरिष्ठ लेखिका मृदुला (गर्ग) जी से हुई मुलाकात याद आ रही थी। वे अपने जाने-पहचाने ठसक भरे तेवर में कह रही थीं- ‘प्रियदर्शन, मैंने दवाएं लेना और फ़िक्र करना इन दिनों बंद कर दिया है। 88 की होने जा रही हूं तो जो ज़िंदगी है, वह अब अपने ढंग से चलती रहेगी।’
मैंने उनसे वही वाक्य कहा और क़िस्सा दुहराया जो इन दिनों 85 पार के बुजुर्गों से साझा करता हूं कि अब बुढ़ापे की नई दहलीज़ 95 साल है।
लेकिन उनके प्रखर यथार्थ-बोध ने मेरी शुभाशंसा को जैसे झटक दिया- ‘नहीं प्रियदर्शन, बहुत मुश्किल होती है अब। मैं अठासी की, मेरे पति 93 के। कोई यहां मददगार नहीं, और क्यों किसी की मदद लें। सबका अपना जीवन है।
दो दिन पहले पता चला, उनके जीवन साथी आनंद प्रकाश गर्ग ने उन्हें अकेला छोड दिया है। हालांकि इस अकेलेपन से मृदुला जी ने अपने ऊपर किसी कातरता को हावी होने दिया होगा, यह अंदेशा मुझे नहीं था। मैंने उन्हें फोन नहीं किया, सोचा, सीधे प्रार्थना सभा में मिलूंगा।


आज गुरुवार को गोदावरी भवन में वही प्रार्थना सभा चल रही थी। मैं आनंद प्रकाश गर्ग जी को नहीं जानता था, इस बात ने कुछ मायूस किया। उन्हें जानने वाले याद कर रहे थे कि वे कितने उत्साही, मददगार और सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति थे। नहीं, यह अमूमन शोक सभाओं में दुहराई जाने वाली श्रद्धांजलियां नहीं थीं, यह अपनों की- बेटे, भतीजे, भांजे, बेटे के दोस्त, पोती सबकी आत्मीय और जीवंत यादें थीं जिनसे उनकी एक तस्वीर बन रही थी।
आनंद प्रकाश जी केमिकल इंजीनियर थे और उम्र के आख़िरी दिनों तक तरह-तरह की उद्यमशीलता पर विचार करते रहते थे। बेटे ने बताया कि वे इन्हीं दिनों अपने प्रयोगों के चक्कर में दो-दो माइक्रोवेव उड़ा चुके थे। बिल्कुल अंत तक बिस्तर पर पड़े-पड़े भी एक नए उद्मम के लिए एक गोदाम ले चुके थे, जीएसटी नंबर जुटा चुके थे और नई तैयारियों में लगे थे। उन्हें 88 की उम्र में कोविड था और डॉक्टरों को क़तई उम्मीद नहीं थी कि वे बच निकलेंगे। लेकिन वे स्वस्थ हो गए। यह तब था जब अपनी सेहत को लेकर वे ज़रा भी सचेत नहीं थे। बेटे के मुताबिक उनकी लंबी उम्र का राज़ यह था कि उन्होंने कभी एक्सरसाइज नहीं की और आलू-पराठे, मक्खन जम कर खाते रहे। बाद की गपशप में मृदुला जी ने बताया कि कोविड के दिनों में डॉक्टरों ने बिल्कुल उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन उन्होंने सबको ग़लत साबित किया।
निश्चय ही गर्ग साहब के व्यक्तित्व के और भी पहलू होंगे। मृदुला गर्ग जैसी दुर्धर्ष और तेजस्वी लेखिका का पति होना आसान नहीं।
बहरहाल, अब वे नहीं है, उनकी यादें हैं और उनको न जानने वालों के पास भी एक शाम की उनकी चर्चा की धवल स्मृति है। 93 की उम्र में देहावसान शोक का विषय नहीं होता, हालांकि शोक तो फिर मनुष्य का पीछा करता रहता है। मृदुला जी सहजता से मिलीं। एक भरे-पूरे परिवार की आश्वस्त संगति उनके साथ थी। हिंदी की दुनिया के भी कई लोग थे। मुझे अशोक वाजपेयी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुमन केशरी, अशोक माहेश्वरी, महेश भारद्वाज, अल्पना मिश्र, गीताश्री, आकांक्षा पारे, भरत तिवारी आदि दिखे। साहित्यिक बिरादरी से भरत तिवारी ने भी मंच से उन्हें श्रद्धांजलि दी। चलते हुए मृदुला जी ने कुछ कहा। उसका मान रखते हुए एक शाम की यह स्मृति दर्ज कर रहा हूं।
(तस्वीरें भरत तिवारी जी के सौजन्य से)


