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आज के अखबार : एकनाथ शिन्दे के पूरे पन्ने के विज्ञापन पर महेश जेठमलानी बोलेंगे? गोदी वाले खबर करेंगे?

Front page of The Indian Express celebrating 25 years, showing a large orange '25' and a man in a white kurta walking forward with the 'Seva Se Samarpan' headline.

विज्ञापनों और हेडलाइन मैनेजमेंट ने जब पूरी व्यवस्था चौपट कर दी है तो राहुल गांधी का नॉनवेज खाना मुद्दा बन जाता है। हमारा आज का यह समाज क्या किसी भी तरह की भलाई का हकदार है? मुझे लगता है, राहुल गांधी जिनकी लड़ाई लड़ रह हैं वे अपने आप में सक्षम हैं। जिन्हें जरूरत है उन्हें समझ ही नहीं है। 

संजय कुमार सिंह

चुनाव आयोग की पोल खोलने वाली दि इंडियन एक्सप्रेस की खबर के बाद अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने इंडियन एक्सप्रेस को विज्ञापन दिए थे। मोटा-मोटी मतलब यह कि इंडियन एक्सप्रेस ने खबर विज्ञापन के बदले की। वैसे तो ऐसा हुआ भी हो तो गलत नहीं है और विज्ञापनों को खबरों से जोड़ा जाए तो सरकारी विज्ञापनों के लिए मीडिया सरकार के खिलाफ खबरें नहीं छापता रहा हैं। 2014 से पहले यह स्थिति नहीं थी। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने विरोध रोकने के लिए जो सब उपाय किए उनमें हेडलाइन मैनेजमेंट तो है ही, मीडिया को डराकर और लालच देकर गुलाम बना लिया गया है। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस ने खबर की तो न सिर्फ अखबार को, इसकी रिपोर्टर को भी बदनाम किया गया जबकि उसने अपना काम किया था। अच्छी भली खबर को कमजोर और खराब कहा गया सो अलग।  

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में लाखों वोटर को मतदाता सूची से बाहर करने और बंगाल भाजपा को सौंप दिए जाने के बाद चुनाव आयोग की पोल खोलना पत्रकारिता का धर्म था। जब दोनों चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के फैसलों से सहमत नहीं थे तो मामला कम से कम तीन लोगों की जानकारी में था। कहा जाता है कि जो बात तीन लोगों को पता हो, गोपनीय नहीं रह सकती है। फिर भी यह खबर किसी और अखबार में नहीं छपी। जाहिर है, मीडिया वालों की मक्कारी या लालच या डर के कारण। फिर भी इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी तो अपना काम किया, देश सेवा की, लोकतंत्र के हित में वही किया जो इमरजेंसी में किया था। फिर भी महेश जेठमलानी और दूसरे सरकार समर्थकों ने न सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस को, पत्रकारिता को भी बदनाम किया। स्पष्ट तौर पर यह लोकतंत्र के खिलाफ है। उदाहरण है कि पूर्व में ऐसा काम करने वालों को सरकारी लाभ मिला है।

इस तरह यह सरकार किसी भी तरह समर्थन करने लायक नहीं रह गई है। लेकिन गुलाम मीडिया अभी भी कर रहा है। चुनाव आयोग के खिलाफ राहुल गांधी कल सड़क पर उतरे, धरना दिया, हिरासत में लिए गए, खान चाचा से मंगाकर रोल खाया और बाद में छोड़ दिए गए। बहुत सारे लोग, बहुत समय से कहते रहे हैं कि सरकार का विरोध सड़क पर उतर कर किया जाना चाहिए। ऐसे ज्यादातर लोग सरकार का विरोध नहीं करते थे। उन्हें राहुल गांधी से ही उम्मीद थी और हमेशा राहुल गांधी ही गलत होते थे। कल भी रोल खाने की गलती कर ही दी। लेकिन खबर यह होनी थी कि सरकार ने चुनाव आयोग के खिलाफ सांसदों का मार्च भी नहीं होने दिया। यह कानून व्यवस्था का मामला नहीं था कि सरकार परेशान होती। यह चुनाव आयोग का सांकेतिक विरोध था, चुने हुए सांसदों द्वारा। इसमें सरकार या पुलिस या सुरक्षा बलों को पड़ने या उनके उपयोग का कोई कारण नहीं है। फिर भी सब हुआ।         

अब आज के मेरे 10 अखबारों की लीड देखिए 

1) 100 अरब रुपए से बनेगा एसएमई कोष – (नवोदय टाइम्स)

आप जानते हैं कि कौशल विकास की जरूरत और उसके लिए योजना का कितना जोर-शोर से प्रचार हुआ था। उसके लिए भी लंबी चौड़ी योजना बनी थी लेकिन उसका कोई लाभ बताया नहीं गया। यह सरकार जिस ढंग से प्रचार करती है उसमें लाभ नहीं बताती ऐसा हो नहीं सकता था। लेकिन बताया नहीं गया क्योंकि कोई लाभ हुआ ही नहीं या घोटाला ज्यादा बड़ा था। यही हालत सरकार की दूसरी योजनाओं और घोषणाओं की है। कौशल विकास योजना की खासियत यह रही कि सीएजी ने उसमें भारी भ्रष्टाचार और अनियमितता का खुलासा किया था। उसपर न तो सरकार की कोई कायदे की प्रतिक्रिया आई ना ही किसी जांच-खुलासे या योजना से हुए लाभ की खबर है।

अब एसएमई का विकास वैसी ही जरूरत है। कौशल विकास का घोटाला पच जाने के बाद यह नई तैयारी लगती है। वैसे भी, काफी देर से शुरू की जा रही है और इसका मकसद देश का भला करना हो या नहीं, प्रचार करना जरूर है। ऐसी खबर को लीड बनाना पत्रकारिता नहीं सरकार का प्रचार है। नवोदय टाइम्स ने उसे सबसे ज्यादा महत्व दिया है। दो कॉलम की लीड के साथ राहुल गांधी की खबर फोटो के साथ टॉप पर चार कॉलम में है। शीर्षक भी रूटीन किस्म का है और खबर किसी औपचारिक या सामान्य धरने की तरह छपी है जो असल में नरेन्द्र मोदी की तानाशाही और चुनाव चोरी के खिलाफ बढ़ते विरोध का प्रतीक है। बेशक, मामला साधारण होता तो खबर 10 में से आठ अखबारों में लीड नहीं बनती। यह अलग बात है कि खेल लीड के शीर्षक में भी है। द टेलीग्राफ ने इसे बैनर बनाया है तो दि एशियन एज ने इसे सात कॉलम की लीड बनाया है। 

2) भाजपा ने चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है –  सीबीआई ने रिश्वत की जांच के सिलसिले में मान के कैम्प ऑफिस, उनके ओएसडी के घर में छापा मारा – टाइम्स ऑफ इंडिया। भारतीय जनता पार्टी की सरकार जिस ढंग से आम आदमी पार्टी का विरोध कर रही है, कई बार मुंह की खाने के बावजूद लगी हुई है उस लिहाज से यह लीड लायक खबर तो है। मुझे लगता है कि राहुल गांधी का विरोध प्रदर्शन, खबर के आज के कुछ शीर्षक के साथ न होती तो इसे लीड बनाना सही है। वैसे भी, सभी अखबार एक ही खबर को महत्व दें यह जरूरी नहीं है और यह हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण भी नहीं है। अखबार ने बताया है कि आम आदमी पार्टी के खिलाफ भाजपा और ईडी-सीबीआई की कोशिशों, उनकी नाकामियों और खुलासों के बावजूद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को राहत नहीं दी। पंजाब सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई। उसके कुछ ही घंटे के अंदर छापे की यह कार्रवाई हो गई।

वैसे भी, अब गैर भाजपाई मामलों में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के मामले कम होते हैं पर वह अलग मुद्दा है। खबर के साथ पंजाब के मुख्यमंत्री का यह बयान भी प्रमुखता से छपा है कि भाजपा ने चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा की घटिया राजनीति से देश की राजनीति चौपट हो चुकी है। वह ऐसा कर पा रही है क्योंकि चुनाव आयोग उसकी गिरफ्त में है और सुप्रीम कोर्ट के लिए यह मुद्दा ही नहीं है। अमूमन अंपायर बेईमान हो तो टीमें खेलने से मना कर दें लेकिन यहां इसका मतलब होगा चुनाव बायकाट और तब भाजपा के लिए सत्ता में बने रहना और आसान हो जाएगा। संभव है, भाजपा और उसके सहयोगी यही चाहते हों पर वह अलग मुद्दा है।

मेरा मुद्दा यह है कि माीडिया इनपर खबर नहीं करता है और करता है तो महेश जेठमलानी जैसे लोग सरकार या भाजपा या संघ के पक्ष में मोर्चा संभाल लेते हैं। उन्हें नहीं दिखता है या वे देखकर भी नजरअंदाज करते हैं कि सरकार के समर्थन में खबरें छापने के लिए कितने विज्ञापन दिए जा रहे हैं। आज एक नाथ शिन्दे ने इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू समेत कई अखबारों को पूरे पहले पन्ने का विज्ञापन दिया है। क्या यह राहुल गांधी की खबर को प्रमुखता नहीं देने के लिए है? क्या पंजाब सरकार के खिलाफ कल का छापा आज के हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए है? 2014 से पहले जब अघोषित इमरजेंसी नहीं थी तो ऐसी खबरें छपती थीं। अब नहीं छपती है तो क्या यह विज्ञापनों और हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण नहीं है। महेश जेठमलानी जैसे लोगों को इसपर सोचना चाहिए और जवाब देना चाहिए। 

3. सीईसी के इस्तीफे के लिए विपक्ष का प्रदर्शन, हिरासत के बाद सभी सांसद देर रात रिहा। 19 दलों का मार्च, राहुल का आठ घंटे का धरना, रात में पुलिस ने हटाया। (अमर उजाला)

4. सड़कों पर विपक्ष… राहुल को धक्का-मुक्की कर बस में बैठाया। सीईसी का विरोध – इंडिया ब्लॉक के मार्च में हाई वोल्टेज ड्रामा। राहुल गांधी का आठ घंटे धरना, 2 घंटे हिरासत; बोले – हिसाब होगा। (दैनिक भास्कर)

5. आठ घंटे धरने पर बैठे राहुल को हिरासत में लिया, छोड़ा। 300 से अधिक सांसदों ने वोट चोरी के खिलाफ मार्च निकाला। ससंद मार्ग पर दिन भर लगे वोट चोर-गद्दी छोड़ के नारे। (देशबन्धु)

6. सीईसी विरोधी प्रदर्शन के बीच इंडिया (गठबंधन) के नेता हिरासत में लिए गए। (हिन्दुस्तान टाइम्स)

7. सीईसी के खिलाफ विपक्ष सड़कों पर उतरा, इसके नेता हिरासत में लिए गए। दिन के ज्यादातर समय पार्लियामेंट स्ट्रीट बंद रहा। (दि इंडियन एक्सप्रेस)

8. राहुल ने SIR को ‘देशद्रोह’ बताया; ECI के खिलाफ INDIA एकजुट; सांसद हिरासत में। ECI मुख्यालय तक विरोध मार्च रोके जाने के बाद विपक्ष के नेता ने आकाशवाणी भवन में धरना दिया; उन्होंने कहा कि PM मोदी ने ‘देश पर कब्ज़ा करने के लिए वोट चुराए’; विपक्षी नेताओं ने CEC को हटाने, SIR को सस्पेंड करने और वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों को वापस जोड़ने की मांग की। (द हिन्दू)

9. राहुल ने SIR, CEC के खिलाफ विपक्ष की एकजुट रैली की। लोकसभा में विपक्ष के नेता ने प्रधानमंत्री, गृहमंत्री पर ‘देशद्रोह’ के आरोप लगाए। विपक्ष ने पुलिस की आलोचना की। (दि एशियन एज)

10. ज्ञानेश विरोधी प्रदर्शन से आकाशवाणी बाधित (द टेलीग्राफ)

मुझे लगता है और आप मानेंगे कि 300 से अधिक सांसदों ने वोट चोरी के खिलाफ मार्च निकाला यह अपने आप में बड़ी बात है। इन्हें रोक दिया गया और इसलिए धरना देना पड़ा वरना मार्च करके, नारे लगाकर वापस आ जाते। देशबन्धु में एक बुलेट प्वाइंट है, आकाशवाणी भवन पर आठ घंटे तक घरना दिया। दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा है कि 240 सांसदों से मिलने का प्रस्ताव असामान्य है। कहने की जरूरत नही्ं है कि यह असमान्य प्रस्ताव असामान्य कारगुजारियों के कारण है और इससे उसे खुद निपटना था। सरकारी मदद से फिर पोल खुल गई। मीडिया गुलाम नहीं होता तो यह भी खबर थी। खबर के अनुसार आयोग ने कहा कि शाम 4 बजे तक किसी दल ने मिलने का समय नहीं मांगा। फिर पुलिस ने बताया कि राहुल के नेतृत्व में सांसद ज्ञापन देना चाहते हैं। आयोग के अनुसार, संसद एनेक्सी में 240 सांसदों के साथ बैठक का प्रस्ताव था। ये असामान्य था। मौके पर वरिष्ठ अधिकारी को ज्ञापन देने का प्रस्ताव सांसदों ने नहीं माना।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा – सांसद प्रोटोकोल के खिलाफ पार्लियामेंट एनेक्सी में मिलना चाहते थे। एक्सप्रेस के अनुसार, भाजपा ने कहा है, रोज का ड्रामा बंद करें प्रधानमंत्री से लोगों का समर्थन पाना सीखें। दैनिक भास्कर में खबर के साथ भाजपा की प्रतिक्रिया उसके स्तर और मिजाज के अनुकूल है। वोट चोर कहने वाले राहुल खुद कामचोर हैं: भाजपा ने चार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष पर हमला बोला। पार्टी ने इसे विपक्ष की अराजकता फैलाने व राहुल को रौलॉन्च करने की कोशिश बताया। राहुल को कामचोर बताते हुए वही बोट चोर कहने के बजाय खुद काम करें। केंद्रीय मंत्री शिवराज चौहान ने कहा कि विपक्ष संस्थाओं की छवि बिगाड़ने को बेबुनियाद आरोप लगा रहा है। कल के धरने के बाद आकाशवाणी के लोगों ने सोशल मीडिया पर धरने से हुई परेशानी के बारे में लिखा है। जाहिर है वे धरने के बारे में नहीं लिख सकती थीं। पर वह भी अलग मुद्दा है। आपने ऊपर देखा होगा, द टेलीग्राफ का शीर्षक इसी पर है।  

Older man sits on a patio sofa at night on a rooftop garden, city skyline lit up in the background with string lights above.

कुछ दिनों से मैं बेटे के घर आया हुआ हूं इसलिए लिखना नहीं हो पाया। आज रहा नहीं गया तो पेश है यह भड़ास। 

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