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सियासत

साबरमती का संत और किंग्सवे हॉल का डांस!

Man with white hair and glasses speaks into microphones at a podium.

हेमंत शर्मा-

देश ग़ुलाम था. और सोच ग़ुलाम थी. विद्रोह था लेकिन बिखरा हुआ. क्रांति की चिंगारियां थीं लेकिन अलग-अलग मोर्चों पर अकेले जूझती हुई. लोग ज़ोर से चीखना चाहते थे लेकिन उनके पास एक संगठित आवाज़ नहीं थी. लोग चलने को तैयार थे लेकिन उनके पास नायक नहीं था. लोग अंग्रेज़ों को उखाड़ फेंकना चाहते थे लेकिन वो कमज़ोर पड़ रहे थे और जीतने का कोई सशक्त हथियार उनके पास था नहीं. इसी ग़ुलाम समय में देश को मिले गांधी. मोहनदास करमचंद गांधी. गांधी से देश में उजाला फैला था. आत्मविश्वास पैदा हुआ था. पहली बार हम होंगे कामयाब के स्वर फूटे थे. शस्त्र को सत्य से पराजित किया जा सकता है यह भरोसा बना था क्योंकि गांधी ईश्वर को सत्य नहीं सत्य को ईश्वर मानते थे.

Stylized painting of a muscular bearded man with a staff, bending forward as a crowd watches from the right against a yellow-orange background.
चित्र मक़बूल फ़िदा हुसैन

महात्मा गांधी ने जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी चीज़ों को प्रतिरोध के बड़े प्रतीकों में बदल दिया जैसे लाठी, धोती, चश्मा, आदि. गांधी एक युग के सपनों, संघर्षों और आकांक्षाओं का नेतृत्व करते हैं. गांधी किसी क्षेत्र विशेष या वर्ग विशेष की सीमा में नहीं समाहित हैं. वे सर्वव्यापी हैं. सर्वहितकारी हैं. चंपारण और बारदोली के किसानों के आंदोलन से लेकर मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला के संघर्षों तक वह जगत व्यापी हैं. आज के दौर का विश्वव्यापी अहिंसक प्रदर्शन, धरना और हड़ताल उनके ही तरकश का तीर है. बाद में इसी हथियार से दुनिया में बड़ी-बड़ी क्रांति हुईं. आमरण अनशन के अहिंसक अस्त्र से जीती जाने वाली बड़ी बड़ी लड़ाइयां उनके ही दिखाए रास्ते का प्रतिफल है.

गॉंधी पर उनके मानने वालों में अक्सर वैमत्य हो जाता है. ऐसे लोगों के लिए डा लोहिया बहुत साफ तरीके से कहते थे. देश में तीन तरह से गांधीवादी हैं. एक सरकारी गांधीवादी, दूसरे मठी गांधीवादी और तीसरे कुजात गांधीवादी. डा लोहिया पहली श्रेणी में पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनकी सरकार के साथियों को रखते थे तो दूसरी श्रेणी में गांधीवादी संस्थाओं पर काबिज लोगों को रखते थे. और तीसरी श्रेणी में खुद और अपने जैसे लोगों को रखते थे. यह मामूली बात नहीं है कि निधन के 75 सालों बाद भी दुनिया के करोड़ों लोग अपनी-अपनी समस्याओं का हल गांधी में ही देखते हैं. यही उनकी ताक़त है. गांधी कल भी प्रासंगिक थे. आज भी हैं. कल भी रहेंगे. दुनिया में ऐसी कोई भी समस्या नहीं जिसका समाधान गांधी के पास न हो. ऐसा कोई संकट नहीं है जिसका हल उनके विचारों में न मिलता हो.

जब गांधी की हत्या हुई तो उनका वजन महज 45 किलो था. लेकिन उनका नैतिक वजन इतना था कि उससे धरती हिल गई थी. कई प्राणघातक हमले के बावजूद वे मृत्यु के भय से परे थे. उन्हें लगता था कि ईश्वर ने उन्हें जो काम सौंपा है उसे पूरा किए बिना वह उन्हें उठाएगा नहीं. गांधी रोजाना 18 किलोमीटर पैदल चलते थे. यानी वे प्रतिदिन 22,500 कदम चलते थे. 1913 से 1948 तक चालीस सालों के दौरान उन्होंने तकरीबन 79,000 किलोमीटर की दूसरी तय की. यह दूरी दो बार धरती का चक्कर काटने के बराबर है.

गांधी आज वैश्विक हैं. वे जिन सिद्धांतों पर अड़े, लड़े और खड़े हुए, दुनिया आज उन सिद्धान्तों की दुहाई दे रही है. गांधी जादूगर थे. अपने अनुभवों को करोड़ों लोगों से जोड़, वह उनके हक की लड़ाई लड़ते थे. जनता से उनका गजब का संवाद था. दक्षिण अफ्रीका में खुद को फर्स्ट क्लास के बाहर फेंके जाने की घटना को उन्होंने करोड़ों अश्वेतों की तकलीफों से जोड़कर जनआंदोलन खड़ा कर दिया. उनके हक के लिए वे उतनी ही निष्ठा से लड़े जितनी निष्ठा से अपनी मातृभूमि की आजादी की लड़ाई लड़ी. यही उनके महामानव होने की निशानी थी. गांधी का नाम आते ही आइन्स्टाइन याद आते है जिन्होंने सबसे पहले कहा था कि आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर था.

महात्मा गॉंधी की सैद्धांतिक विरासत का डंका समूची दुनिया में बज रहा है. वह पहले भारतीय थे जो भारत को वैश्विक नक़्शे पर ले गए. धरती पर जहॉं भी ग़ैर बराबरी और अन्याय की बात होती है गॉंधी याद आते हैं, प्रेरणा देते है. यह गॉंधी के विचारों की ही ताक़त है कि समूची दुनिया में जहॉं भी जाइए, महात्मा गाँधी की प्रतिमाएँ मिलेंगी. यहां तक उस दक्षिण अफ्रीका में भी, जहॉं उन्हें नस्ली भेदभाव के चलते ट्रेन से फेंका गया था. उस ब्रितानिया हुकूमत की संसद के ठीक सामने भी, जिसकी सत्ता को उन्होंने भारत से उखाड़ फेंका था.

गांधी को पढ़ना, उनको समझना, फिर उन तक पहुंचने की कोशिश, साधारण काम नहीं है. कल्पना कीजिए उस सादगी की, जहां देश को आजादी दिलाने वाला हाड़ मांस का आदमी चरखे पर सूत कातकर अपना कपड़ा पहनता था. जिसकी अगवानी करने के लिए वायसराय का जहाज हर वक्त तैयार रहता था. उस शख्स ने अपनी पूरी उम्र रेल के तीसरे दर्जे में सफर करते हुए काट दी. यह उस महात्मा का आत्मबल था कि हताशा और गुलामी से पथराए देश में उन्होंने स्वाधीनता संग्राम की प्राण वायु भर दी. यही प्राण वायु आंधी बन गई. अंग्रेजों की नौकरी करते हुए मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी को भी कहना पड़ा,

“बुद्धु मियां भी हजरते गांधी के साथ हैं
गो मुख्तखाक हैं मगर आंधी के साथ हैं.”

गांधी के कई आलोचक मिल जाएंगे. उनके लिए आज भी गांधी ज़िन्दा हैं. वे पीढ़ी दर पीढ़ी गांधी की विफलताएँ तलाशेंगे. उन्हें गालियाँ देंगे. उनकी बौद्धिक कंगाली यह है कि उनके पास अपना कोई प्रेरक प्रतीक पुरूष नहीं है, जो आज भी प्रासंगिक और प्रेरक हो. महात्मा गांधी की अपनी सीमाएँ थी. गांधी मनुष्य थे. संत नहीं. मनुष्य की कमज़ोरियाँ उनमें हो सकती हैं. पर वे ईमानदार थे. वे अपनी कमज़ोरियॉं खुद बतलाते थे. हम गांधी जी के कुछ प्रसंगों का ज़िक्र करते हैं जो उनकी महानता को आयाम देते हैं.

सेवाग्राम के दिनों की बात है. उस रोज़ गांधी जी का जन्मदिन था. कस्तूरबा ने शाम को आश्रम में घी का दीया जलाया. गांधी जी उस वक्त वहां नहीं थे. लौटने पर उन्होंने आश्रम में दीया जलते देख वहां बैठे आश्रमवासियों से पूछा कि यह दीया किसने जलाया है? कस्तूरबा बोलीं, ‘मैंने जलाया है.’ गांधी जी ने उदासी भरे स्वर में कहा, ‘मेरे जन्मदिन पर यह दीया जलाना बुरी बात हुई. कस्तूरबा विचार करने लगी कि इसमें इतनी बुरी बात क्या हो गई. आश्रमवासी भी चकित होकर सोचने लगे.

गांधी ने कहा, ’कस्तूरबा! तुम जानती हो कि गांव के लोग कितने निर्धन हैं. उन्हें रोटी पर चुपड़ने के लिए तेल नहीं मिलता और तुम मेरे जन्मदिन पर घी के दीये जला रही हो. इससे बड़ी फिजूलखर्ची क्या हो सकती है?’ कस्तूरबा इससे संतुष्ट नहीं हुईं. उन्होंने नम्रता से गांधी जी से पूछा, ‘आप ही ने तो कुछ दिन पहले एक प्रवचन में कहा था कि गलत और बुरी जगह खर्च करना फिजूलखर्ची है. मैंने तो पवित्र भावना से एक पवित्र काम से इस दीये को जलाया है.’

गांधी ने कस्तूरबा से कहा, ‘जो वस्तु निर्धन लोगों को नसीब नहीं होती, उसका उपयोग करने का हमें भी कोई अधिकार नहीं है. यह घी किसी किसान परिवार में बीमार व्यक्ति के भोजन की पौष्टिकता बढ़ा सकता था. तब यह सही खर्च कहा जाता. गलत जगह खर्च करना ही फिजूलखर्ची है.’ गांधी ने कहा, उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा जरूरतमंद व्यक्ति की प्राथमिकता के हिसाब से होना चाहिए.

बहुत कम लोग जानते होंगे कि महात्मा गांधी अपने जीवन में एक बार दाई भी बने थे. उस समय गांधी जी साउथ अफ्रीका के नटाल प्रांत में रहते थे. यह घटना नटाल की राजधानी पीटर मारित्जबर्ग की थी. गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा उस समय गर्भवती थीं. रात को अचानक कस्तूरबा को प्रसव पीड़ा होने लगी. महात्मा गांधी उस समय वहीं बैठे कुछ पढ़ रहे थे. जैसे ही गांधी जी को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने अपने बड़े बेटे हरिलाल को दाई को बुलाने भेजा, लेकिन इस बीच कस्तूरबा का दर्द असहनीय हो गया. बा का दर्द बढ़ता देख गांधी जी ने दाई का इंतज़ार न कर खुद प्रयास करना उचित समझा और अपने सबसे छोटे बेटे की डिलीवरी कराई. गांधी जी जाने-अंजाने दाई नहीं बने. वे दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आंदोलन और अपनी वकालत की व्यस्तता से समय निकालकर दो घंटे के लिए एक चैरिटेबल हॉस्पिटल में मुफ़्त अपनी सेवाएँ देते थे. इसके साथ वह समय निकालकर नर्सिंग और डिलीवरी कैसे कराएं, जैसे विषयों पर किताबें भी पढ़ते थे. इसी का नतीजा था कि उन्होंने बड़ी सरलता से अपने चौथे बेटे का प्रसव खुद कराया.

ये किस्सा साल 1909 का है जब महात्मा गांधी अपनी चर्चित किताब ‘हिंद स्वराज’ लिख रहे थे. उस वक्त गांधी जी जिन-जिन शहरों मसलन पोरबंदर, राजकोट, मुंबई में रहे थे, वहां एक कहावत प्रचलित थी कि मियां और महादेव की नहीं बनती और बन भी नहीं सकती है. दोनों में बहुत फ़र्क है. महात्मा गांधी को ये बात बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी कि ये कहावत किस आधार पर बनी है और इस तरह से क्यों कही जाती है. उनका पूरा जीवन और बचपन के तमाम दोस्त ऐसे ही थे. इनमें शेख़ महताब भी थे, जिनके साथ वह खेलते थे. गांधी जी को गोश्त खाना इन्होंने ही सिखाया था. गांधी की पहली नौकरी लगी तो उन्हें नौकरी देने वाले दक्षिण अफ्रीका के दादा अब्दुल्ला थे. गॉंधी लौट कर भारत आए. उन्होंने तय किया कि अगर मार्च के दौरान उनकी गिरफ़्तारी हुई तो मार्च का नेतृत्व अब्बास तैयब जी करेंगे. इसीलिए गांधी को ये नहीं समझ आता था कि ये मुहावरा क्यों बना, कैसे बना और क्यों लोगों में प्रचलित है? जब उनसे किसी ने पूछा कि मुस्लिम लीग की ”टू नेशन थिअरी” (द्वि राष्ट्र सिद्धांत) पर आपका क्या कहना है? तो उनका कहना था कि ‘ये बिल्कुल गलत है. इस देश में ”टू नेशन थियरी” हो ही नहीं सकती है और अगर हो सकती है तो थ्री, फोर फाईव नेशन थियरी क्यों नहीं है? ईसाई कहां जाएंगे, जैन का क्या होगा, बौद्धों का क्या करेंगे आप? अगर धर्म ही आधार है तो इनका क्या होगा, इन धर्मों ने कौन सा गुनाह किया है? तो ये हो नहीं सकता, ये संभव नहीं है. उस समय भारत के वायसराय वॉवेल थे. गांधी की उनसे कलकत्ता में मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि ‘हम जिस हाल में हैं, हमें छोड़ दीजिए. हमें छोड़ कर चले जाइए. हम अपनी समस्याएं खुद हल कर लेंगे क्योंकि आप रहेंगे तो आग में घी डालने का काम करते रहेंगे.’ उन्होंने लगभग इन शब्दों में वॉवेल से कह दिया कि आपकी जरूरत नहीं है क्योंकि आपके रहते हिंदू मुसलमान एकता हो ही नहीं सकती है.

आज़ाद हिंद फ़ौज के तमाम लोग जब गिरफ़्तार हुए और उन पर मुकदमा चलने वाला था तो गांधी उनसे मिलने गए. यह सभी लाल किले में बंद थे. गांधी ने पाया कि उन्होंने कलकत्ता में वॉवेल से जो बात कही थी कि आपके रहते एकता नहीं हो सकती, वो कितनी सच थी. आज़ाद हिंद फ़ौज के लोगों ने गांधी को बताया कि यहां सुबह हांक लगती है कि हिंदू चाय तैयार है और मुसलमान चाय अभी आने वाली है. गांधी ने पूछा कि ‘आप क्या करते हैं अगर हिंदू चाय और मुसलमान चाय अलग अलग दी जाती है? उनका कहना था कि ‘हमने एक बड़ा सा बर्तन रखा है और उसमें हिंदू चाय और मुसलमान चाय मिला देते हैं और फिर बांट के पी लेते हैं.’ महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस के काम करने के ढंग ,हिंसा पर उनकी राय ,आज़ाद हिन्द फ़ौज के गठन और फ़ौज के ज़रिए आज़ादी हासिल करने की कोशिश की कई बार आलोचना की थी. लेकिन लाल क़िले से लौटने के बाद गांधी ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि ‘सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रवादी नेता हैं और उनका सबसे बड़ा योगदान एक पूरा संगठन खड़ा करना और उसमें हिंदू मुसलमान का भेद मिटा देना है और इसके लिए मैं उन्हें सलाम करता हूं.’

महात्मा गांधी की जिंदगी का एक पहलू उनका मज़ाकिया होना था. गांधी खुद अपने बारे में कहते थे कि अगर मुझमें “सेन्स ऑफ ह्यूमर” ना होता, मैं मजाक ना कर पाता तो मैंने आत्महत्या कर ली होती. जब मौका मिलता था, गांधी खुद भी ठहाका लगाकर हंसते थे. एक बार एक अंग्रेज़ रिपोर्टर ने उनसे पूछा, “आप तीसरे दर्जे में सफ़र क्यों करते हैं?” जवाब में उन्होंने कहा, “बहुत आसान है, इसलिए कि चौथा दर्जा नहीं होता.” दूसरा किस्सा लंदन के बकिंघम पैलेस में किंग जॉर्ज पंचम से उनकी मुलाक़ात का है. जब गांधी जी गोल मेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए लंदन गए थे, वह धोती पहनकर ही बकिंघम पैलेस चले गए. इस पर तमाम लोगों को ऐतराज़ था. उन्हें लगता था कि गांधी को ठीक-ठाक कपड़े पहन कर जाना चाहिए. इस पर गांधी ने कहा, “मुझे कपड़े पहनने की क्या ज़रूरत है, जितने कपड़े आपके राजा के बदन पर हैं वो हमारे हिस्से के ही तो हैं.” ये अंदाज था गांधी का. बातों बातों में सत्ता के अहंकार को लाजवाब कर देने का.

ये बात साल 1910 की है. गॉंधी जी जोहन्सबर्ग में थे. वहां सरकारें हर रोज़ नए फरमान जारी करती थी. उसी दौरान एक फरमान आ गया कि जिनकी शादियां दक्षिण अफ्रीका में रजिस्टर्ड नहीं हैं उनको पति पत्नी नहीं माना जाएगा. यह बात बहुत गंभीर थी क्योंकि इससे कई लाख भारतीय मूल के लोग प्रभावित होने वाले थे. गांधी घर लौटे और उन्होंने बा से कहा, “तुम आज से मेरी रखैल हो गई.” बा ने कहा, “क्या बात हुई? मेरी शादी हुई है, आप इस तरह की बात कैसे कह रहे हैं?” गांधी ने कहा, “सरकार ने कानून बना दिया है, अब हमारी शादी मान्य नहीं है और अब अगर तुम मेरे साथ रहोगी तो मेरी रखैल रहोगी.” ये बात सिर्फ घर के अंदर नहीं रही, ये बात फैलने लगी. पूरे दक्षिण अफ्रीका में जो भारतीय समाज था उसके बीच ये बात फैल गई. बा ने वहां भारतीय लोगों को संगठित किया. पहली बार दक्षिण अफ़्रीका में आंदोलन के समय औरतें और बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर निकले. उन्होंने मीलों लंबा जुलूस निकाला और सरकार को कानून वापस लेना पड़ा. ये सिर्फ़ एक बात को कहने का ढंग ही था जो बताता है कि गांधी कैसे सोचते थे और कैसे चीज़ों को अपने हक में बदल देते थे.

महात्मा गांधी बेखौफ इंसान थे. उन्हें किसी चीज से डर नहीं लगता था. वे चाहते थे कि उनके आसपास के लोगों के दिल से भी डर नाम की चीज न रहे. लेकिन एक चीज थी जिससे गांधी खुद हमेशा डरते रहे थे. ये डर था कि कोई उन्हें ईश्वर न बना दे. भगवान बनाकर उनकी मूर्ति न स्थापित कर दे. उनकी पूजा न शुरु कर दे. उनको लगता था कि वह दुनिया को कोई मैसेज देने के काबिल नहीं हैं. वे कहते थे, “आई हैव नो मैसेज फॉर द वर्ल्ड. बट माई लाइफ इज माइ मैसेज.”

अमरीका से, इंग्लैंड से तमाम लोग उन्हें खत लिखते थे. ख़ासतौर पर माँए, जिनके बच्चे बीमार होते थे, उनसे अनुरोध करती थीं, प्रार्थना करती थीं कि अगर वो उनके बच्चे के लिए दुआ करेंगे तो वो ठीक हो जाएगा क्योंकि वे उनके अंदर ईश्वर का अंश देखती थी. गांधी ने एक-एक चिट्ठी का जवाब दिया और हर बार एक ही बात लिखी कि मैं कोई चमत्कार नहीं करता. मेरे अंदर ईश्वर का अंश है लेकिन ईश्वरत्व नहीं है. मुझे वो मत दीजिए जो मेरे पास नहीं है. मैं वो लेना ही नहीं चाहता. एक बार एक बहुत मज़ेदार किस्सा हुआ. गांधी अपने तमाम सत्याग्रहियों, सहयोगियों के साथ कहीं जा रहे थे. रास्ते में एक गांव पड़ा. एक बड़ा सा पेड़ था और उसके नीचे एक कुआं था. गांधी को लगा कि यहां थोड़ी देर आराम कर सकते हैं क्योंकि धूप निकल आई थी और पैदल चलना मुमकिन नहीं था. गांधी बैठ गए. लोग खाना पकाने के लिए पानी निकालने गए. तो पता लगा कि कुएं में पानी नहीं है. कुऑं सूखा हुआ है. अब लोगों ने आकर महात्मा से बहुत हिम्मत जुटाकर कहा कि बापू कुएं में पानी नहीं है. सूखा है. उन्होंने कहा कि जो भी है, अब मैं बैठ गया हूं. अब पानी का बंदोबस्त यहीं करिए. साथ के कार्यकर्ता दूसरे गांव जाकर पानी ले आए. उनके नहाने का इंतजाम किया. खाना बना. जब गांधी शाम को वहां से उठकर चले गए तो अचानक एक सोता फूटा और कुएं में पानी आ गया. गांव के लोग इतने खुश कि उनको लगा कि ये गांधी बाबा का चमत्कार है. गांव के लोगों ने चमत्कारी बाबा कहा. वो न आए होते तो हमारे सूखे कुएं में पानी न होता. हमें कई कई मील जाकर पानी लाना पड़ता. उन्होंने सोचा कि इसके लिए महात्मा को धन्यवाद देना चाहिए तो घर से लोटा, थाली, गिलास जिसके हाथ जो आया, बजाते हुए, भजन गाते हुए ये लोग अगले गांव पहुंचे जहां तब तक गांधी पहुंच गए थे. उन्हें वहीं रुकना था. शोर हुआ, बापू उठे. झोपड़ी से बाहर आए और उन्होंने कहा कि पहले तो ये शोर बंद करो और सुनो मैं क्या कह रहा हूं. उन्होंने कहा कि अगर कोई कौवा बरगद के पेड़ पर बैठ जाए और पेड़ गिर पड़े तो वो कौवे के वजन से नहीं गिरता. कौवे को ये मुगालता हो सकता है कि उसके वजन से पेड़ गिरा लेकिन मुझे ऐसा कोई मुगालता नहीं है. मुझे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं है. बेहतर होगा कि तुम लोग ये भजन कीर्तन बंद करो और अपने गांव वापस जाओ.

गांधी संगीत प्रेमी भी थे. गांधी का मानना था कि सत्याग्रह को संगीत से जोड़िए. इससे और लोग जुड़ेंगे. वो नरसी मेहता का ‘वैष्णवजन’ गाते थे. उनका प्रिय भजन था ‘रघुपति राघव राजा राम’. गांधी जी यरवदा जेल में थे. दलितों के पक्ष में आंदोलनरत गॉंधी जी आमरण अनशन पर बैठने जा रहे थे. अनशन पर बैठने से पहले उन्होंने सरदार पटेल और महादेव देसाई को बुलाया और “उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है’ यह गीत गाने लगे. बाद में सरदार पटेल और महादेव देसाई सबने गाना शुरू किया. फिर जेल में जितने और कैदी थे वे भी गाने लगे. पूरा माहौल बन गया. उनकी दिलचस्पी सिर्फ हिंदुस्तानी संगीत में नहीं थी. पाश्चात्य संगीत में भी उनकी रूचि थी. राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के लिए गांधी लंदन में थे. गांधी रोज शाम काम निपटाकर किंग्सले हॉल के सभागार में चले जाते. वहां कुछ स्थानीय लोग इकट्ठा हो भजन गाते. स्कॉटलैंड का एक लोकगीत था जिसको रॉबर्ट बर्न्स ने बाद में नए ढंग से लिखा- ‘आउड लैंग साइन’ यानी गए जमाने की बात. गॉंधी इसे भी गाते थे. एक दिन शनिवार को जब वो किंग्सले हॉल पहुंचे और गाना शुरू हुआ तो अचानक एक महिला ने हाथ उठाकर गांधी जी से कहा कि आप हमारे साथ नाचना चाहेंगे? गांधी ने देखा कि वहां जितने लोग थे वो या तो पति पत्नी थे या दोस्त थे एक लड़का, एक लड़की साथ में नाच रहा था. गांधी ने कहा “जरूर मैं नाचूंगा लेकिन एक शर्त पर कि मेरा जोड़ीदार मेरी छड़ी होगी“ और गांधी अपनी छड़ी के साथ किंग्सले हॉल के उस सभागार में नाचे.

उसी राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के बाद गांधी रोम्या रोला से मिलने फ्रांस गए. उन्हें पता था कि रोम्या रोला बहुत अच्छा पियानो बजाते हैं. रोला से उन्होंने कहा कि आप मुझे बिथोविन की पांचवीं सिंफनी सुना दीजिए. रोम्या रोला बीमार थे. बहुत मुश्किल से उन्हें बिस्तर से उठाकर पियानो पर बिठाया गया. उनकी उंगलियां पियानो पर रखी गईं और रोम्या रोला ने वो सिंफनी बजाकर गांधी को सुनाई. रोम्या रोला ने एक गीत अपनी तरफ से बजाया और गांधी ने उस गाने की अगली पंक्तियां दोहराईं.

गांधी जी छुआछूत के सख्त खिलाफ थे. सभी को एक ही ईश्वर ने बनाया है. इसलिए उनमें भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए. दक्षिण भारत के दौरे में जब गांधी मायावरम पहुंचे तब उनका एक नए शब्द पंचम से सामना हुआ. पंचम शब्द का प्रयोग दक्षिण भारत में दलितों के लिए किया जाता था. वहॉं यह मान्यता थी कि पंचम हिंदू धर्म में चार वर्णों की व्यवस्था से बाहर पांचवा दलित वर्ण हैं. मायावरम में पंचमों से मुलाकात के बाद महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका के अपने वो दिन याद आए जब वो दलितों को अपने घर खाने के लिए बुलाते थे और महसूस करते थे कि कोई उनका विरोध कर रहा है. यह एक तरह का दबा हुआ विरोध खुद कस्तूरबा गांधी की तरफ से होता था. कस्तूरबा को लगता था कि शायद भारत लौटकर यह समस्या और बड़ी और विकराल होगी. कस्तूरबा गांधी का यह अनुमान गलत नहीं था. जब गांधी चंपारण जाने वाले थे और बांकीपुर स्टेशन उतरे जो पटना का पुराना नाम था तो कुछ लोग उन्हें राजेंद्र प्रसाद के घर ले गए. उस समय राजेंद्र प्रसाद घर पर नहीं थे और वहां मौजूद नौकर गांधी को पहचानते नहीं थे. इसलिए उन्हें बाहर वाले कमरे में ठहरा दिया गया. उन्हें लगा कि यह शख्स पता नहीं किस जाति या धर्म से होगा. इस व्यवहार से गांधी बहुत ही खिन्न हुए.

बाद में गांधी ने जब अहमदाबाद के पास अपना आश्रम बनाया तब ठक्कर बापा का पत्र लेकर एक आदमी उनके पास आया. उस पत्र में ठक्कर बापा ने लिखा था, ”आप कहते हैं कि सभी लोग बराबर हैं और अगर आश्रम के नियमों का पालन करेंगे तो उन्हें आश्रम में रहने की जगह दी जाएगी. इसलिए मैं एक आदमी को आपके आश्रम में रहने के लिए भेज रहा हूं. वो एक दलित हैं और आपको उन्हें आश्रम में रखने पर विचार करना है.” गांधी ठक्कर बापा को मना नहीं कर सकते थे. जो व्यक्ति आश्रम में रहने आए थे उनका नाम दूदा भाई था. उनके साथ उनकी पत्नी दानी बेन और एक छोटी बच्ची थी. इन तीनों को गांधी ने आश्रम में जगह दी तो अहमदाबाद में हंगामा हो गया. जुलूस निकला और नारे लगे. जो सवर्ण आश्रम को चंदा देते थे उन्होंने चंदा देना बंद कर दिया. आश्रम बंद होने की नौबत आ गई. आसपास के लोगों ने गाली देना शुरू कर दिया और दूदा भाई का जीना हराम कर दिया. लेकिन गांधी अपने फ़ैसले से टस से मस नहीं हुए.

जब गांधी को यह पता चला कि कस्तूरबा जाने-अनजाने आश्रम के इस विरोध का केन्द्र बन गई हैं और दूदा भाई को आश्रम में रखने का विरोध कर रही हैं तो गॉंधी ने कहा कि यह नहीं होगा. गांधी ने बहुत ऊंची आवाज में कस्तूरबा से कहा कि वो अपना फ़ैसला नहीं बदलेंगे. उन्होंने कस्तूरबा से यहां तक कह दिया कि अगर वो चाहें तो अपना अलग रास्ता अपना सकती हैं. इसे झगड़ा नहीं माना जाएगा लेकिन अब वो दोनों एक साथ नहीं रह सकते. यह उनका तलाक होगा. बाद में कुछ नहीं हुआ. दूदा भाई आश्रम में रहे और उनकी पत्नी भी रहीं. सब कुछ ठीक ठाक हो गया.जो धन बंद हो गया था वो दूसरे स्रोत से आने लगा था. गांधी दलितों को मुख्यधारा में लाने के लिए जो कुछ भी कर सकते थे, उन्होंने किया. इस हद तक किया कि अगर इससे उनका परिवार प्रभावित हो जाए या उनका वैवाहिक जीवन छिन्न भिन्न हो जाए उन्हें फर्क नहीं पड़ता था.

गांधी जी क्रिकेट के न केवल खिलाड़ी थे, बल्कि यह खेल उनकी पसंद में पहले नंबर पर था. मशहूर लेखक कौशिक बंदोपाध्याय यदि Mahatma On the Pitch : Gandhi and Cricket in India नामक किताब नहीं लिखते तो दुनिया जान ही नहीं पाती कि कद-काठी में दुबला पतला यह इंसान क्रिकेट का भी बेपनाह शौक रखता था. सही मायने में उन्हें भी ठीक उसी तरह का क्रिकेट जुनून था, जैसा आज के युवाओं में होता है. रतीलाल गेलाभाई मेहता गांधी जी के करीबी दोस्त हुआ करते थे. दोनों हाईस्कूल तक साथ पढ़े थे. बचपन के सखा रतीलाल के मुताबिक भले ही मोहनदास करमचंद गांधी को स्कूली दिनों में व्यायाम में दिलचस्पी नहीं थी लेकिन क्रिकेट में वे अव्वल रहते थे.

स्वतंत्रता के आंदोलन के प्रमुख नेताओं में एक बिहार के डॉ. सैयद महमूद थे. एक बार वह सेवाग्राम में गांधी जी के आश्रम में उनसे मिलने गए. उस समय डॉ. महमूद बीमार थे. जब गांधी जी ने उनको बीमार देखा तो तबीयत ठीक होने तक आश्रम में रहने को कहा. लेकिन डॉ. महमूद ने इनकार कर दिया. जब गांधी जी ने जोर दिया तो उन्होंने अपनी मजबूरी बताई. दरअसल डॉक्टरों ने उनको ठीक करने के लिए ‘चिकन सूप’ लेने को कहा था. लेकिन आश्रम में मांसाहार खाने की अनुमति नहीं थी. गांधी जी ने कहा कि उनको आश्रम छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है. ‘क्या आश्रम के रहने वाले लोग इस बात को नहीं समझेंगे? मैं सुनिश्चित करूंगा कि आपको अच्छी तरह बना चिकन सूप मिले.’ गांधी जी के जवाब से डॉ. महमूद हैरान हो गए. वे आश्रम में रुके.

गांधी महामानव थे. उनके भीतर की अथाह मानवता ही उनके विचारों का प्राण तत्व थी. उनका एक एक विचार उनके कर्म की कसौटी पर खरा उतरता है. पर उपदेश कुशल बहुतेरे की इस दुनिया में गांधी एक अजूबे की तरह हैं. सत्य और अहिंसा को लेकर उनके प्रयोग समूची दुनिया के उद्धार का मोक्ष द्वार हैं. सविनय अवज्ञा के अमोघ अस्त्र से विश्व की सबसे शक्तिशाली ताकत को घुटने के बल झुका देने का उनका जज्बा अप्रतिम है, अतुलनीय है. विश्व मानवता की प्रेरणा का शाश्वत स्तंभ है. आज जब अन्याय, असत्य और अनाचार लोकतंत्र का मुखौटा ओढ़कर हमले कर रहा है, तो गांधी और भी प्रासंगिक हो उठे हैं. समाज के अंतिम व्यक्ति की आंख से आंसू पोछने का उनका दर्शन आज भी विश्व की आर्थिक खुशहाली का मूल मंत्र है. गांधी व्यक्ति नहीं हैं, विचार हैं. विचारों का विस्फोट हैं. जीवन जीने की कला हैं. उनका वाद मूल्यों की स्थापना का वाद है. वास्तविक रामराज्य का वाद है.

जन्मदिन है आज उनका और लालबहादुर शास्त्री जी का. दोनों महापुरुषों को प्रणाम.

जय जय

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