भारत में अखबार पढ़ने वालों की संख्या और प्रिंट की विश्वसनीयता को लेकर मीडिया इंडस्ट्री भले ही अब भी मजबूत दावे करती हो, लेकिन अखबार चलाने का कारोबार आसान नहीं रह गया है। भारतीय समाचारपत्र सोसाइटी यानी Indian Newspaper Society (INS) की ताजा वार्षिक रिपोर्ट और उसके हालिया बयानों से प्रिंट मीडिया की आर्थिक मुश्किलों की एक बड़ी तस्वीर सामने आती है।
INS की शिकायत दो स्तरों पर है। पहली—भारत में अखबार छापने के लिए इस्तेमाल होने वाले imported newsprint पर 5 प्रतिशत Customs Duty क्यों?
दूसरी—अखबारों द्वारा तैयार की गई मूल खबरों से डिजिटल दुनिया में पैदा होने वाले विज्ञापन मूल्य का बड़ा हिस्सा Google और Meta जैसे वैश्विक टेक प्लेटफॉर्म क्यों हासिल कर रहे हैं?
INS का तर्क है कि अखबार कंपनियां पत्रकार, रिपोर्टर, संपादक, फोटोग्राफर और पूरा न्यूज़रूम खड़ा करके मूल समाचार सामग्री तैयार करती हैं, लेकिन डिजिटल इकोसिस्टम में उस सामग्री से बनने वाले ट्रैफिक और विज्ञापन का आर्थिक लाभ काफी हद तक उन प्लेटफॉर्मों को मिलता है जो खुद समाचार रिपोर्टिंग पर वही लागत नहीं उठाते।
पहले समझिए Newsprint का पूरा मामला
अखबार के लिए newsprint कोई वैकल्पिक कच्चा माल नहीं है। अखबार छापना है तो newsprint चाहिए। INS लगातार सरकार से imported newsprint पर लगी 5 प्रतिशत Customs Duty हटाने की मांग कर रही है।
INS का ताजा तर्क यह है कि भारत में घरेलू newsprint उत्पादन देश की पूरी जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है। फरवरी 2026 में INS ने बताया था कि देश में सालाना newsprint consumption लगभग 12 लाख टन है, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 5 लाख टन के आसपास है—यानी लगभग 40 प्रतिशत जरूरत ही घरेलू उत्पादन से पूरी हो पा रही है। बाकी के लिए प्रकाशकों को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
यही वह बिंदु है जहां INS का 5 प्रतिशत Customs Duty हटाने का तर्क आता है।
INS का कहना है कि जब देश में पर्याप्त newsprint उपलब्ध ही नहीं है तो imported newsprint पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का सीधा असर अखबारों की लागत पर पड़ता है।
और मामला सिर्फ मात्रा का नहीं है।
INS के अनुसार घरेलू उत्पादन में गुणवत्ता की समस्या भी है। कुछ भारतीय मिलें newsprint की जगह packaging-grade paper की ओर जा रही हैं। कुछ विशेष किस्म के newsprint, खासकर Glazed Newsprint (GNP) और Light Weight Coated (LWC) paper below 70 GSM, की उपलब्धता भी सीमित है।
इसका मतलब यह हुआ कि “देश में paper बनता है, इसलिए imported newsprint पर duty लगनी चाहिए” वाला तर्क प्रकाशकों को स्वीकार्य नहीं है। उनका कहना है कि उपलब्ध घरेलू उत्पादन उनकी जरूरत और उनकी आवश्यक specifications दोनों पूरी नहीं करता।
INS ने यह मांग अचानक नहीं उठाई है। Society कई वर्षों से सरकार के सामने यह मामला उठा रही है। उसकी पुरानी वार्षिक रिपोर्टों में भी 5 प्रतिशत Customs Duty वापस लेने की मांग दर्ज है।
दूसरा और ज्यादा बड़ा संकट—Google और Meta
अब आते हैं उस लड़ाई पर जो भविष्य के मीडिया कारोबार के लिए शायद ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अखबारों का कारोबार कभी मुख्यतः तीन चीजों पर चलता था—circulation, advertising और government advertising।
लेकिन इंटरनेट ने पूरा समीकरण बदल दिया। पाठक अखबार की वेबसाइट पर खबर पढ़ सकता है, लेकिन खबर तक पहुंचने के लिए वह Google Search, Google News, Discover, Facebook या Instagram जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकता है।
नतीजा यह कि खबर बनाने की लागत अखबार की है, लेकिन पाठक तक पहुंच और डिजिटल विज्ञापन के रास्ते में टेक प्लेटफॉर्म की भूमिका बढ़ती गई।
INS का आरोप है कि इस डिजिटल अर्थव्यवस्था में Big Tech मूल समाचार सामग्री से पैदा होने वाले आर्थिक मूल्य का disproportionate हिस्सा हासिल कर रहा है। 87वीं वार्षिक रिपोर्ट में INS ने इसी समस्या को प्रमुख चुनौती के रूप में दर्ज किया है।
INS के निवर्तमान अध्यक्ष Vivek Gupta ने भी इस मुद्दे को जोर देकर उठाया। उनका तर्क था कि समाचार संस्थान मूल पत्रकारिता पर खर्च करते हैं, जबकि डिजिटल राजस्व का बड़ा हिस्सा ऐसे वैश्विक प्लेटफॉर्मों के पास जाता है जो स्वयं उस स्तर पर पत्रकारिता का खर्च नहीं उठाते।
यह सिर्फ INS की शिकायत नहीं, मामला CCI तक पहुंच चुका है
यहां कहानी और महत्वपूर्ण हो जाती है। Indian Newspaper Society ने Google के खिलाफ Competition Commission of India यानी CCI में मामला उठाया था।
CCI के रिकॉर्ड में INS बनाम Alphabet/Google का मामला Case No. 10/2022 के रूप में दर्ज है। CCI ने इसे Google से संबंधित पहले से चल रही एक जांच, Case No. 41/2021, के साथ क्लब कर दिया था।
मामला केवल यह नहीं था कि Google पर खबरें दिखाई जाती हैं। शिकायत में डिजिटल विज्ञापन के पूरे ecosystem को लेकर सवाल उठाए गए थे। CCI के रिकॉर्ड में publishers की ओर से यह आरोप दर्ज है कि Google search और digital advertising के विभिन्न स्तरों पर अपनी मजबूत स्थिति के कारण publishers के लिए terms और revenue arrangements पर उसका प्रभाव बहुत अधिक है।
यानी विवाद का मूल सवाल यह है:
जिस content को तैयार करने में करोड़ों रुपये खर्च करके हजारों पत्रकार काम करते हैं, उसके डिजिटल monetisation का नियंत्रण आखिर किसके हाथ में है?
विज्ञापन का पैसा घट भी रहा है
INS के आंकड़े इस संकट को संख्याओं में भी दिखाते हैं। INS members द्वारा रिपोर्ट किया गया कुल advertising business 2024 में ₹15,316.39 करोड़ से घटकर 2025 में ₹14,773.74 करोड़ रह गया। यानी करीब 3.54 प्रतिशत की गिरावट।
दिलचस्प बात यह है कि इस गिरावट की पूरी कहानी एक जैसी नहीं है। English dailies को accredited advertising agencies से मिलने वाला विज्ञापन राजस्व 2025 में 3.83 प्रतिशत बढ़ा। दूसरी तरफ Indian-language dailies का revenue 3.68 प्रतिशत घटा।
यानी अखबार उद्योग के भीतर भी संकट का असर अलग-अलग भाषाओं और प्रकाशनों पर अलग-अलग पड़ रहा है।
Government advertising भी सवालों के घेरे में
INS ने सरकार द्वारा print advertising rates में बढ़ोतरी का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही यह मुद्दा उठाया है कि दर बढ़ने के बावजूद government advertising का कुल budget उसी अनुपात में नहीं बढ़ा।
अर्थात कागज महंगा हो, printing cost बढ़े, salaries और distribution की लागत बढ़े और विज्ञापन बजट उसी अनुपात में न बढ़े तो अखबार के business model पर दबाव स्वाभाविक है।
और इधर circulation भी बदल रहा है
प्रिंट मीडिया का संकट केवल विज्ञापन का नहीं है। Crisil Ratings के अगस्त 2026 के विश्लेषण के मुताबिक बड़े newspaper groups की circulation base 2019 के करीब 1.5 करोड़ से घटकर 2025 में करीब 1 करोड़ रह गई। इसी दौरान non-print businesses—digital, outdoor advertising और events आदि—का revenue share बढ़कर इस fiscal में लगभग एक चौथाई तक पहुंचने की उम्मीद है।
यानी बड़े अखबार समूह खुद भी यह समझ रहे हैं कि आने वाला मीडिया कारोबार केवल कागज पर छपने वाली खबर से नहीं चलेगा।
इसलिए INS की लड़ाई को दो हिस्सों में देखना होगा
एक तरफ वह सरकार से कह रही है— “Imported newsprint पर 5% Customs Duty हटाइए, क्योंकि देश में पर्याप्त घरेलू newsprint उपलब्ध नहीं है।”
दूसरी तरफ वह डिजिटल ecosystem में कह रही है—
“हम पत्रकारिता की मूल सामग्री तैयार करते हैं, लेकिन उसके डिजिटल आर्थिक मूल्य का बड़ा हिस्सा Big Tech के पास जा रहा है।”
इन दोनों मांगों के पीछे एक ही चिंता है—अखबार का आर्थिक मॉडल।
अगर newsprint महंगा होगा तो print edition की लागत बढ़ेगी। अगर circulation घटेगी तो reach प्रभावित होगी। अगर traditional advertising घटेगी तो revenue घटेगा। और अगर digital audience बढ़ने के बावजूद digital advertising का बड़ा हिस्सा publishers के पास नहीं आएगा तो digital growth भी उस अनुपात में कमाई में नहीं बदल पाएगी। यही भारतीय अखबार उद्योग की मौजूदा पहेली है।
नई टीम, नई लड़ाई
इसी माहौल में Indian Newspaper Society को नई टीम मिली है। Lokmat Media के Executive Director Karan Rajendra Darda को 2026-27 के लिए INS का अध्यक्ष चुना गया है। उन्होंने Sanmarg के Vivek Gupta का स्थान लिया है। INS की आधिकारिक Executive Committee में Darda को President, Amar Ujala के Tanmay Maheshwari को Deputy President, Vanitha के Harsha Mathew को Vice President और Delhi Press के Anant Nath को Honorary Treasurer दर्ज किया गया है।
Darda के सामने ऐसे समय में INS की कमान आई है जब संस्था को एक साथ कई मोर्चों पर प्रकाशकों की तरफ से सरकार और नियामकों के सामने पैरवी करनी है—newsprint duty, digital advertising, government advertising, copyright, piracy और बदलते मीडिया business model जैसे मुद्दे इसमें शामिल हैं।
आंकड़ा सामने है। INS members का reported advertising business 2025 में ₹14,773.74 करोड़ रहा, जो 2024 के ₹15,316.39 करोड़ के मुकाबले 3.54 प्रतिशत कम है। इसलिए Karan Darda के नेतृत्व वाली नई INS टीम के सामने लड़ाई सिर्फ “5 प्रतिशत newsprint duty हटाओ” तक सीमित नहीं है।
असल लड़ाई यह है कि भारत में अखबारों की पत्रकारिता आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे रहे—कागज पर भी और स्क्रीन पर भी।
और शायद यही वजह है कि आने वाले समय में INS की सबसे बड़ी बहस यह नहीं होगी कि प्रिंट बचेगा या नहीं, बल्कि यह होगी कि प्रिंट और डिजिटल पत्रकारिता से पैदा होने वाला पैसा आखिर किसके पास जाएगा।


