लखनऊ | उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक के हजारों Desktop Computers की खरीद के लिए जारी GeM Tender No. GEM/2026/B/7638438 अब गंभीर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि टेंडर की तकनीकी शर्तें इस तरह तैयार की गईं कि भारत में निर्माण करने वाले बड़ी संख्या में OEMs प्रतियोगिता से बाहर हो गए, जबकि एक ऐसी विदेशी certification को अनिवार्य कर दिया गया जिसे पहले से हासिल करने वाले सीमित MNC OEMs ही प्रभावी रूप से qualify कर सकते हैं।
मामले का सबसे गंभीर पहलू Monitor के लिए TCO Certified 8.0 को mandatory करना है।
बैंक ने पहले 04 जुलाई 2026 के Corrigendum No.01 में मॉनिटर के लिए BIS / TCO Certified 8.0 or higher स्वीकार किया था। लेकिन मात्र 17 दिन बाद 21 जुलाई 2026 के Corrigendum No.02 में BIS certification को हटा दिया गया और TCO Certified 8.0 or higher को अनिवार्य कर दिया गया।
BIS मान्य था, फिर अचानक क्यों हटाया गया?
सवाल यह है कि जब BIS-certified monitor को कुछ दिन पहले तक बैंक ने तकनीकी रूप से स्वीकार्य माना था, तो अचानक BIS को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
इस बदलाव का कोई स्पष्ट और सार्वजनिक technical justification सामने नहीं आया है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि इस शर्त के कारण भारतीय OEMs, जो भारत में manufacturing करते हैं और भारतीय statutory requirements का पालन करते हैं, tender competition से बाहर हो गए, जबकि TCO certification रखने वाले कुछ चुनिंदा MNC OEMs को लाभ की स्थिति मिल गई।
Make in India पर सीधा सवाल
यह मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि RFP में स्वयं “Preference to Make in India Initiative” का प्रावधान शामिल है।
DPIIT की Public Procurement (Preference to Make in India) framework का उद्देश्य घरेलू manufacturing और local suppliers को बढ़ावा देना है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसी विदेशी certification को mandatory बनाना, जिसके कारण अधिकांश domestic manufacturers tender में participate ही न कर सकें, Make in India policy की भावना और procurement principles के अनुरूप है?
भारतीय OEMs के लिए certification barrier क्यों?
TCO certification के लिए स्वतंत्र verification और testing प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। शिकायतकर्ता का कहना है कि भारत में घरेलू OEMs के लिए इस certification की उपलब्धता और प्रक्रिया ऐसी नहीं है कि BIS-compliant भारतीय manufacturers के लिए इसे समान और सहज eligibility criterion माना जा सके।
इसलिए सवाल उठ रहा है कि क्या किसी statutory Indian certification को स्वीकार करने के बजाय ऐसी विदेशी certification को sole mandatory condition बनाया जाना उचित है?
अब जांच की मांग
मामले से जुड़े पक्ष ने बैंक से tender condition की समीक्षा करने, BIS-certified भारतीय OEMs को पुनः eligible बनाने तथा TCO को optional/additional certification के रूप में रखने की मांग की है।
साथ ही मामले को DPIIT, Competition Commission of India, Department of Financial Services और GeM सहित संबंधित सक्षम संस्थाओं के समक्ष उठाने की बात कही गई है।
सबसे बड़ा सवाल
यदि BIS certification पर्याप्त था तो उसे हटाकर TCO 8.0 को mandatory क्यों किया गया?
क्या इस शर्त का वास्तविक तकनीकी उद्देश्य था या इसका परिणाम भारतीय OEMs को tender से बाहर करना और सीमित MNC OEMs को लाभ पहुंचाना था?
(इस खबर से संबंधित समस्त दस्तावेज़ भड़ास के पास है)

