Connect with us

Hi, what are you looking for?

सुख-दुख

हरिद्वार में दूसरे दिन गोबर मक्खी और मनुष्यों पर भड़ासी यशवंत का चिंतन!

Three men sit around a wooden table outside, drinking from small cups; a water bottle and bags on the table with motorcycles and a dusty lot in the background.

यशवंत सिंह-

गंगा किनारे ध्यान लगाने बैठा तो महसूस हुआ मुझे गोबर की बदबू आ रही है। सांस से ध्यान हटकर गोबर पर चला गया। बदबू गोबर की ही है न, कन्फ़र्म करने के लिए बंद आँख ही दो चार बार तेज साँस खींचा छोड़ा। हाँ गोबर है। वैसे इसे बदबू क्यों मानें। ख़ुशबू मानें तो क्या दिक्कत। बचपन में गाय भैंस का गोबर उठाया फेंका हूँ। इन गोबर के खाद से उपजे मूली भिंडी टमाटर को चाव से खाया हूँ। गोबर तो विशाल जीवनदायिनी प्राकृतिक उपक्रम का एक पड़ाव है, कड़ी है। तो इसे ख़ुशबू मानते हैं।

धीरे-धीरे बदबूदार गंध से चिढ़ा मन शांत हो गया और इसे खुशबू मानते हुए खुशबू खींचने वाले अंदाज़ में ही खींचने लगा। बंद आँखों में ही दृश्य दौड़ गया। फ़िलिम चलने लगी। माँ गाय के गोबर से आँगन लीप रही हैं। कुछ पवित्र काम होना है। पूजा हवन। ये सोचते ही हवन और गोबर की मिलीजुली पवित्रता मन में समाहित हुई। यहाँ गंगा तट पर निर्बंध विचरण करते हुए गायें ही तो गोबर कर देती हैं। शुभ है जो गोबर के बीच में बैठा हूँ।

बदबू से ख़ुशबू में रूपांतरण पल भर में हो गया।

ग़ज़ब है जीवन का खेला। सब मानने पर ही तो है। मानो तो देव नहीं पत्थर!

तभी हवा का रुख़ बदला और गोबर युक्त हवा की जगह केवल हवा, जिसमें गंगा की सुगंध समाहित है, महसूस करने लगा।

ओह! ये क्या? तो मेरे सिर और देह पर मक्खियाँ बैठ उड़ भनभना रही हैं। ये पक्का मेरे यहाँ आने से पहले इन गोबरों पर बैठी होंगी। मन की सुई फिर एल्कलाइन से एसिडिक की तरफ़ मुड़ने लगी।

अच्छा तो ये मक्खियाँ हैं। रोगबाज़ मक्खियाँ। लेकिन इन्हें क्या पता ये रोगबाज़ हैं। ये हम हैं जो अपने फायदे नुक़सान के लिए सबका सुंदर असुंदर नाम धरे हैं। ये बेचारी भी तो हो सकती हैं। इनका एकमात्र काम गंध दुर्गंध सुगंध को यहाँ वहाँ बाँटना छींटना होता है।

लेकिन क्या मक्खियाँ सुगंध पर भी बैठती हैं? शायद हाँ शायद ना। पता करूँगा ऑनलाइन। लेकिन ज्यादातर तो ये दुर्गंध पर ही बैठती हैं। ये टेस्टेड है। अनुभवजन्य है।

तो इन मक्खियों को उड़ाऊं या बैठे रहने दूँ? लेकिन छोटी छोटी बातों पर ध्यान भंग कर हाथ पाँव चलाऊँगा तो हो गया ध्यान। अरे सोचो मक्खी जिस काम के लिए प्रकृति द्वारा डिज़ाइन है, वही काम कर रही है। मनुष्य जिस काम के लिए डिज़ाइन है, वही काम कर रहा है।

मनुष्य किस काम के लिए डिज़ाइन है? विध्वंस के लिए। हाँ हिंसा घृणा युद्ध के लिए। सृजन करुणा प्रेम शांति ये सब विध्वंस हिंसा घृणा युद्ध के साइड इफ़ेक्ट भर हैं। ओरिजिनल तो विध्वंस है। प्रकृति को कहीं जाना है। धरती को कहीं पहुँचना है। उसके काम में तेजी से मदद कर रहे हैं हम सब। ये प्रकृति की इच्छा है। हमारी औक़ात क्या ही है प्रकृति के सामने। जैसे मक्खी वैसे मानव। मैं मक्खी ही तो हूँ। मक्खी सही जगह बैठी है। अपना मान कर बैठी है। बैठने दो।

और फिर मन शांत होता गया। विचार रुकते गए। जैसे राह विलीन हो गया हो क्षितिज में। किसी दिन यूँ धम्म से गिरेंगे उस पार। जहाँ कोई द्वार नहीं था। कोई विचार नहीं, कोई आवाज़ नहीं। बस वही सफेदी, जो पास आने पर और दूर हो जाती है। पैर ज़मीन पर थे, पर ज़मीन धीरे-धीरे हल्की लगने लगी। जैसे बोझ कहीं और छोड़ आए हों… नाम, रिश्ते, हिसाब, अधूरे वाक्य। मन क्षितिज के ठीक ऊपर से निकला और मिट गया। न इधर, न उधर। मन गिर गया। कोई धमाका नहीं। बस एक ताले का खुल जाना, एक लकीर का मिट जाना। हवा रुकी नहीं थी। रास्ता भी रुका नहीं था। रुक गया था सिर्फ़ वह जो रास्ते को नाम देता था। और नाम के बिना रास्ता भी क्षितिज जैसा हो गया… दिखता हुआ, पर कभी न पहुँचने वाला।

हरिद्वार Day-2

तस्वीर : चाय की दुकान पर प्रफुल्ल ध्यानी भाई साहब और आदित्य जी संग सत्संग… ठोकर नंबर एक (सप्त सरोवर मार्ग)

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन