प्रकाश हिंदुस्तानी-
एलन मस्क की तो सुन ही लो मोदी जी ! मैं तो फ़ोकट ही टेंशन कर रहा था कि 2047 में भारत का भविष्य कैसा होगा; लेकिन एलोन मस्क की इस बात से दिल खुश है कि 2036 तक मनी (रूपये / डॉलर आदि) का कोई खास महत्व नहीं रह जाएगा, इंसान मनी का इस्तेमाल केवल इसलिए करता है ताकि वह भोजन, मकान, इलाज, परिवहन और मनोरंजन जैसी वस्तुएं एवं सेवाएं खरीद सके। दुनियाभर की अक्खी इकॉनमी इस पर टिकी है कि ज़रूरतें असीमित हैं और संसाधन सीमित हैं।
मस्क का तर्क है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स मिलकर उत्पादन को इतना बढ़ा देंगे कि ज़रूरत की चीज़ों की कोई कमी ही नहीं बचेगी। मस्क का तर्क मूलतः अर्थशास्त्र की पारंपरिक अवधारणा—’कमी’ यानी स्कार्सिटी के पूरी तरह समाप्त हो जाने पर आधारित है।
मस्क के अनुसार, इंसान मनी का इस्तेमाल केवल इसलिए करता है कि वह भोजन, मकान, इलाज, परिवहन और मनोरंजन जैसी वस्तुएं एवं सेवाएं खरीद सके। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स मिलकर उत्पादन को इतना बढ़ा देंगे कि ज़रूरत की चीज़ों की कोई कमी ही नहीं बचेगी। जब ये सभी चीज़ें बिना किसी इंसानी श्रम के लगभग शून्य लागत यानी जीरो मार्जिन कॉस्ट पर अत्यधिक मात्रा में तैयार होने लगेंगी, तो उनका मूल्य मापने या उनके लेन-देन के लिए पारंपरिक मुद्रा की आवश्यकता धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। इसे अर्थशास्त्र में ‘पोस्ट-स्कार्सिटी इकॉनमी’ कहा जाता है।
मस्क की दृष्टि में श्रम की लागत शून्य के करीब पहुँच जाएगी। कारखानों, खेतों, निर्माण कार्यों और सेवा क्षेत्र में इंसानों की जगह ह्यूमनॉइड रोबोट्स (जैसे टेस्ला का ऑप्टिमस) ले लेंगे। रोबोट्स को वेतन, छुट्टियां या पेंशन नहीं चाहिए; वे 24/7 काम करेंगे, जिससे सामान बनाने की लागत में भारी गिरावट आएगी।
कोडिंग, मेडिकल डायग्नोसिस, डिज़ाइनिंग, लीगल ड्राफ्टिंग और कस्टमर सर्विस जैसे स्क्रीन-आधारित सभी काम AI इंसानों से कहीं बेहतर और तेज़ गति से करेगा।
असीमित ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स की उपलब्धता होगी। सोलर, बैटरी स्टोरेज और संभावित परमाणु फ्यूजन के ज़रिये बिजली बेहद सस्ती हो जाएगी। ड्राइवरलेस वाहनों और इलेक्ट्रिक ट्रकों के कारण माल ढुलाई का खर्च नगण्य हो जाएगा।
हर चीज़ भरपूर मात्रा में हरेक को मिल सकेगी। मकान 3D प्रिंटिंग और रोबोट्स से कुछ ही दिनों में बन सकेंगे। खेती पूरी तरह ऑटोमेटेड हो जाएगी, जिससे खाद्यान्न संकट खत्म हो जाएगा।
इन्फ्लेशन की जगह डिफ्लेशन होने लगेगा। चीजों के दाम बेहद काम होते ही चले जायेंगे और लोगबाग केवल शौक से ही कोई भी काम करेंगे। सरकारें सभी को भरपूर संसाधन दे सकेगी मतलब लाड़ली बहन-भाई का कांसेप्ट खलास हो जायेगा। जब किसी को आजीविका के लिए काम करने की ज़रूरत नहीं होगी, तो समाज के लिए उद्देश्य और जीवन की सार्थकता खोजना एक बड़ा मनोवैज्ञानिक मुद्दा बन जाएगा।
ज़ोर से बोलो – एलोन मस्क ज़िंदाबाद !


