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फिल्म ‘कवन कसूर’: बिना शोर-शराबे के गाजीपुर की मिट्टी में एक बार फिर भोजपुरी सिनेमा को मिला नया ताना-बाना

छोटे बजट की यह फिल्म याद दिलाती है कि भोजपुरी सिनेमा का असली स्टार उसकी कहानी है

Brand logo featuring stylized gold Hindi text on a red decorative badge.

भोजपुरी सिनेमा लंबे समय से एक विडंबना से गुजर रहा है। जिस सिनेमा ने कभी अपनी कहानियों, लोक संस्कृति और संगीत के बल पर देश भर में पहचान बनाई, उसका बड़ा हिस्सा धीरे धीरे अपनी जमीन से दूर होता गया। ऐसे दौर में ‘कवन कसूर’ बिना किसी बड़े सितारे, बिना भारी प्रचार और बिना बड़े बजट के आती है और चुपचाप यह साबित कर जाती है कि भोजपुरी सिनेमा में अपनी मिट्टी की खुशबू अभी बाकी है।

फिल्म की रिलीज बहुत बड़े स्तर पर नहीं हुई। निर्माताओं ने इसे सीमित स्तर पर सिनेमाघरों तक पहुँचाया। लेकिन गाजीपुर में जो दो सिनेमाघर हैं, दोनों ने इस फिल्म को प्रदर्शित किया। इनमें से एक मल्टीप्लेक्स है, और भोजपुरी फिल्म का मल्टीप्लेक्स के पर्दे तक पहुँचना अपने आप में खास है। जिस मिट्टी में यह फिल्म बनी, उसी मिट्टी ने उसे पूरे मन से अपनाया।

Movie poster featuring a couple embracing at sunset, with large orange Hindi title text above and credits at the bottom, logos in the top corners.
Portrait of a man with glasses and a mustache wearing a pink shirt, smiling outdoors among trees.
फ़िल्म निर्देशक राधेश्याम राय

दर्शकों ने इसे केवल मनोरंजन की तरह नहीं, भोजपुरी सिनेमा में एक नई शुरुआत की तरह देखा। लंबे समय बाद उन्हें ऐसी फिल्म मिली जिसमें भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, कहानी का स्वाभाविक हिस्सा है।

फिल्म दो परिवारों की कहानी है। उनके बीच गहरी दोस्ती है, जो रिश्तेदारी में बदलने वाली होती है। लेकिन परिस्थितियाँ करवट लेती हैं और विश्वास की जगह संदेह आ बैठता है। गलतफहमियाँ गहराती जाती हैं और कहानी उस मोड़ तक पहुँचती है जहाँ संदेह जानलेवा रूप ले लेता है।

फिर भी यह केवल अपराध, षड्यंत्र या बदले की फिल्म नहीं है। इसका केंद्र मनुष्य और उसके रिश्ते हैं। घटनाएँ यहाँ केवल घटनाएँ नहीं रहतीं, उनका असर पात्रों और उनके संबंधों पर दिखता है। सच्चाई सामने आते ही पूरी कहानी का अर्थ बदल जाता है और षड्यंत्र रचने वालों के पास पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं बचता।

यहीं फिल्म अपने मूल सवाल तक पहुँचती है। गलती किसकी थी? संदेह किसने पैदा किया? और उस संदेह ने कितने रिश्ते बदल दिए?

जयंत मीडिया और बनारस टॉकीज के बैनर तले फिल्म की पूरी शूटिंग गाजीपुर में हुई है, और यह केवल लोकेशन की बात नहीं है। गाँव यहाँ पेड़, खेत और गलियों का दृश्य भर नहीं, फिल्म की सामाजिक दुनिया है। छोटी छोटी रस्मों से लेकर पारिवारिक रिश्तों की भाषा तक, कई दृश्य दर्शक को किसी गढ़ी हुई दुनिया में नहीं, अपने आसपास के जीवन में ले जाते हैं। किसी भी ग्रामीण फिल्म की असली परीक्षा यही होती है, और ‘कवन कसूर’ इसमें खरी उतरती है।

राधेश्याम राय ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सिनेमा और साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर शोध किया है और मुंबई के प्रतिष्ठित निर्माताओं के लिए पटकथाएँ लिखी हैं। वर्तमान में वे भारत एक्सप्रेस न्यूज़ चैनल में निदेशक हैं। उनकी यह पृष्ठभूमि पटकथा में साफ झलकती है। कहानी जल्दबाजी में नहीं भागती, पात्रों को समय मिलता है और परिस्थितियाँ स्वाभाविक ढंग से विकसित होती हैं।

शिवराज देवल के साथ मिलकर किया गया निर्देशन अपने परिवेश के प्रति सजग है। कैमरा गाँव को सजाने की कोशिश नहीं करता, उसे उसके असली रूप में पकड़ता है।

भोजपुरी फिल्मों के गीत कभी फिल्म की पहचान हुआ करते थे। ‘कवन कसूर’ का संगीत उसी परंपरा की ओर लौटता है। गीत कहानी से अलग खड़े नहीं होते, पात्रों की भावनाओं के साथ चलते हैं। इनमें लोक की छाप है और भाषा की वह मिठास है जो भोजपुरी को भोजपुरी बनाती है। यह संगीत केवल सुनाई नहीं देता, कहानी के साथ महसूस होता है।

फिल्म का सबसे यादगार पल इसका अंत है। पर्दे पर ‘The End’ नहीं आता, बल्कि लिखा आता है : ‘कहनी गइल बन में, सोचऽ अपना मन में।’

यह पंक्ति फिल्म को दादी नानी की कहानियों की उस परंपरा से जोड़ देती है, जहाँ कहानी ऐसे मोड़ पर खत्म होती थी कि सुनने वाला अपने मन से उसका अर्थ निकाले। फिल्म दर्शक को उत्तर देकर विदा नहीं करती, एक सवाल के साथ छोड़ जाती है। इसीलिए पर्दा गिरने के बाद भी कहानी मन में चलती रहती है।

‘कवन कसूर’ उत्तर प्रदेश फिल्म बंधु की सब्सिडी के लिए पूरी तरह पात्र है, फिर भी निर्माताओं ने आवेदन नहीं किया। उद्देश्य था फिल्म की असली बाजार स्वीकार्यता को परखना। यह फैसला उस बड़े सवाल से जुड़ता है जो आज भोजपुरी सिनेमा के सामने है : क्या सीमित संसाधनों में बनी अच्छी फिल्म अपने दर्शक तक पहुँच सकती है, और क्या दर्शक स्टार के नाम पर नहीं, कहानी के भरोसे सिनेमाघर आएगा? गाजीपुर का अनुभव बताता है कि जवाब हाँ हो सकता है।

‘कवन कसूर’ भोजपुरी सिनेमा की सारी समस्याओं का हल होने का दावा नहीं करती। लेकिन यह याद जरूर दिलाती है कि हल की शुरुआत कहानी से होती है। एक अच्छी कहानी, विश्वसनीय परिवेश, अपनी भाषा का सम्मान और ऐसा संगीत जिसमें अपनी मिट्टी की आवाज हो, तो बड़े सितारे की जरूरत उतनी नहीं रह जाती।

परिवार के साथ देखने लायक यह फिल्म भोजपुरी सिनेमा के उस पुराने आत्मविश्वास की याद दिलाती है, जब फिल्म की पहचान उसके सितारे से पहले उसकी कहानी और संगीत से होती थी।

कहनी गइल बन में, सोचऽ अपना मन में। अब आगे की कहानी भोजपुरी सिनेमा को खुद लिखनी है।

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