Connect with us

Hi, what are you looking for?

उत्तर प्रदेश

विधान परिषद प्रमुख सचिव की भर्ती शुरू, राजेश सिंह की विदाई तय, प्रदीप दुबे कब जाएंगे?

Two men pose in front of the Uttar Pradesh Legislative Assembly building, with a domed facade, ornate arches, and the Indian flag overhead.

2023 में रिटायर होने वाले विधान परिषद प्रमुख सचिव पद की भर्ती शुरू तो 2019 में ही रिटायर हो जाने वाले प्रमुख सचिव विधानसभा की भर्ती का विज्ञापन कब जारी होगा? विधानसभा का पद सात साल से खाली; प्रदीप दुबे की नियुक्ति और सेवा विस्तार को दी गई है हाईकोर्ट में चुनौती…

Portrait of a man with short black hair and a mustache, wearing a white shirt and dark blazer, looking to the left.

सौरभ सिंह सोमवंशी-

उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की नियुक्ति एवं सेवा विस्तार को चुनौती देने वाली याचिका लखनऊ हाई कोर्ट में लंबित है इसी बीच विधान परिषद के प्रमुख सचिव के पद का विज्ञापन जारी हो गया है। यह उत्तर प्रदेश के विधान मंडल का दुर्भाग्य है कि विधानसभा और विधान परिषद दोनों के प्रमुख सचिव विवादित ही रहे हैं दोनों की नियुक्तियां एवं सेवा विस्तार कथित रूप से फर्जी बताये जा रहे हैं। प्रमुख सचिव विधानसभा के पद को तो लखनऊ हाईकोर्ट में बाकायदा अधिकार पृच्छा के तहत चुनौती तक दी गई है।

Form titled 'Format of Application form for the appointment on the post of Principal Secretary Legislative Council' with fields for applicant details (name, date of birth, education, address, category), declarations, and a box labeled 'Affix Self Attested Photograph' in the top-right.
Government job notification from Office Legislative Council, Uttar Pradesh (Lucknow) inviting Indian citizens for the post of Principal Secretary—includes pay, age, qualifications, and selection rules on the notice image.

30 अप्रैल 2019 से विधानसभा प्रमुख सचिव का पद रिक्त होने का आरटीआई अभिलेखों में उल्लेख किया गया है। वहीं विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह की नियुक्ति, पुनर्नियोजन और रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने के आरोपों पर काफी हो हल्ला हुआ था।।

उत्तर प्रदेश विधान परिषद सचिवालय द्वारा 6 अगस्त 2026 को प्रमुख सचिव के पद पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश के दोनों सदनों के सचिवालयों में प्रमुख सचिव पद से जुड़ी नियुक्तियों, सेवा विस्तार और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। उपलब्ध आरटीआई अभिलेखों, कार्यालय आदेशों और न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर विधानसभा के प्रमुख सचिव पद को लेकर जहां वर्ष 2019 से चयन प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह की नियुक्ति और उनके कार्यकाल के दौरान दिए गए कथित पुनर्नियोजन को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।

विधानसभा सचिवालय के 30 अप्रैल 2019 के कार्यालय आदेश के अनुसार तत्कालीन प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे उसी दिन अपराह्न से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद आरटीआई के तहत दायर प्रथम अपील पर विशेष सचिव एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी मोहम्मद मुशाहिद द्वारा पारित आदेश में उल्लेख किया गया कि 30 अप्रैल 2019 से प्रमुख सचिव का पद रिक्त है और इस पद पर चयन प्रक्रिया अपनाई जानी थी।

इसके बाद 26 अगस्त 2022 को आरटीआई के माध्यम से प्रमुख सचिव के रिक्त पद पर भर्ती के लिए जारी विज्ञापन की प्रति और उसकी स्थिति मांगी गई। 13 अक्टूबर 2022 को जनसूचना अधिकारी की ओर से दिए गए जवाब में बताया गया कि “प्रकरण में विज्ञापन का प्रसारण प्रक्रियाधीन है।”

इसके बाद 29 अगस्त 2024 को अद्यतन स्थिति मांगे जाने पर अपीलीय आदेश में यह दर्ज किए जाने का दावा है कि प्रमुख सचिव के पद पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन अभी तक जारी नहीं हुआ था।

ऐसे में सवाल यह है कि यदि विधानसभा सचिवालय में प्रमुख सचिव का पद 30 अप्रैल 2019 से रिक्त था, तो नियमित चयन प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से पूरा करने में इतना लंबा समय क्यों लगा?

इसी बीच 6 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश विधान परिषद सचिवालय ने प्रमुख सचिव के रिक्त पद पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी कर आवेदन आमंत्रित किए हैं। इससे विधानसभा और विधान परिषद सचिवालयों में प्रमुख सचिव पदों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर तुलना भी शुरू हो गई है।

विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति को चुनौती देने वाली अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) याचिका संख्या 4560/2026 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में लंबित है। ऐसे में दोनों सचिवालयों में प्रमुख सचिव पदों की नियुक्ति प्रक्रिया और उससे संबंधित अभिलेखों को लेकर उठ रहे हैं।

विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह की नियुक्ति और सेवा विस्तार पर सवाल

उपलब्ध जानकारी के अनुसार राजेश सिंह की जन्मतिथि वर्ष 1958 बताई जाती है और वर्ष 2018 में प्रमुख सचिव के पद पर नियुक्ति के समय उनकी आयु लगभग 60 वर्ष थी। जब कि 55 साल होनी चाहिए थी फिर भी सामान्य सेवानिवृत्ति आयु के आधार पर वर्ष 2023 में उनके सेवानिवृत्त होने की स्थिति बनती थी। हालांकि, इसके बाद भी उनके पद पर बने रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

बताया जाता है कि 15 जुलाई 2023 को उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति की ओर से राजेश सिंह को छह माह का कार्यकाल बढ़ाया गया। इसके बाद 15 जनवरी 2024 को पुनः छह माह का विस्तार दिए जाने की बात सामने आई है। इस संबंध में यह आरोप लगाया गया है कि आदेशों में ‘सेवा विस्तार’ के स्थान पर ‘पुनर्नियोजन’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।

क्या सभापति को पुनर्नियोजन का अधिकार था?

इन आदेशों की वैधानिकता को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल उत्तर प्रदेश विधान परिषद सचिवालय (भर्ती एवं सेवा की शर्तें) नियमावली, 1976 की व्याख्या से जुड़ा बताया जा रहा है। नियमावली के तहत सभापति को प्रमुख सचिव को सेवा विस्तार देने की शक्ति प्राप्त नहीं है और ऐसी शक्ति मुख्यमंत्री के पास निहित है। इसी आधार पर राजेश सिंह को दिए गए कथित सेवा विस्तार अथवा पुनर्नियोजन आदेशों की वैधता पर प्रश्न उठाए जा रहे थे।

विधान परिषद प्रमुख सचिव राजेश सिंह पर भर्ती में कथित अनियमितताओं का आरोप

राजेश सिंह का कार्यकाल इससे पहले भी विवादों में रहा है। विधान परिषद में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी की भर्ती में कथित अनियमितताओं से संबंधित मामला न्यायालय तक पहुंचने और जांच की कार्यवाही होने की बात सामने आई है। इसी क्रम में विधान परिषद सचिवालय की पूर्व भर्तियों में कथित अनियमितताओं को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इन मामलों में किस स्तर पर क्या कार्रवाई हुई, यह भी सार्वजनिक किए जाने की मांग की जा रही है।

राजेश सिंह के कार्यकाल को लेकर लगाए जा रहे आरोपों में उनके कथित निकट संबंधियों को विधान परिषद सचिवालय में लाभ पहुंचाने का आरोप भी शामिल है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विक्रम सिंह को प्रतापगढ़ जिलाधिकारी कार्यालय से स्थानांतरित कराकर विधान परिषद में सहायक समीक्षा अधिकारी के पद पर तैनात कराया गया। वहीं, एक अन्य कथित निकट संबंधी गोपाल सिंह को विधान परिषद के लेखा विभाग में नियुक्त कराए जाने का आरोप लगाया गया है।

इन आरोपों को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत किए जाने की बात भी कही जा रही है।

दोनों सचिवालयों में ‘रिश्तेदारों के एडजस्टमेंट’ के आरोप भी चर्चा में

मामले का एक अन्य पहलू विधानसभा और विधान परिषद सचिवालय के कर्मचारियों के कथित पारस्परिक समायोजन से जुड़ा है। आरोप लगाया जा रहा है कि विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह के रिश्तेदारों और पारिवारिक सदस्यों को विधानसभा सचिवालय में तथा विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे के पारिवारिक सदस्यों को विधान परिषद सचिवालय में समायोजित किया गया। दोनों संवैधानिक संस्थाओं के सचिवालयों में नियुक्तियों और स्थानांतरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, योग्यता और नियमों का पालन किस प्रकार सुनिश्चित किया गया।

विधान परिषद में वर्ष 2026 में प्रमुख सचिव पद के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू होने और विधानसभा में वर्ष 2019 से पद रिक्त होने संबंधी आरटीआई अभिलेख सामने आने के बाद पूरे मामले में कई सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल यह भी है कि विधानसभा में प्रमुख सचिव पद की नियमित नियुक्ति प्रक्रिया में इतने वर्षों तक क्या स्थिति रही? विधान परिषद में राजेश सिंह को दिए गए कथित पुनर्नियोजन आदेश किस नियम और किस सक्षम प्राधिकारी की शक्ति के तहत जारी हुए?

फिलहाल विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति से जुड़ी याचिका न्यायालय में लंबित है और विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह के कार्यकाल तथा नियुक्ति पर छिड़ी बहस के दौरान उस पद का विज्ञापन जारी हो चुका है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब 2023 में रिटायर हो जाने वाले प्रमुख सचिव विधान परिषद के पद का विज्ञापन आ गया तो 2019 में ही रिटायर हो जाने वाले प्रमुख सचिव विधान सभा के पद का विज्ञापन अभी तक क्यों नहीं आया यह अपने आप में यक्ष प्रश्न है।

भड़ास में एक हफ्ते पहले छपी थी खबर…

यूपी विधानसभा प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे के बाद विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह की नियुक्ति और सेवा विस्तार पर सवाल!

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन