धन्यवाद मोदी सरकार! इस लड़की को आप अब आगे बढ़ने से नहीं रोक सकते। जो डरपोक कायर और घटिया लोग होते हैं वही स्त्री को इस तरह बेइज्जत करते हैं। देश देख रहा है। इसका लोकतांत्रिक बदला देश के लोग लेंगे। नेहा को मैं आज से जीवन भर के लिए एकतरफा समर्थन देने का ऐलान करता हूँ। कोई मुझे दिखा दे इस लड़की ने कभी कोई ग़लत बात कही हो, कभी कोई ग़लत हरकत की हो। पढ़ी लिखी बच्चियों को अपमानित करना, उन्हें स्याही फेंक कर काला करना, यह सब दुनिया के सबसे निकृष्टतम लोगों की ही हरकत हो सकती है। मोदी सरकार की यही उपलब्धि है कि उसने विवेक शून्य घटिया लोगों की फ़ौज खड़ी कर दी है! ये तस्वीर देख आज सच में दिल में कुछ टूटता हुआ सा महसूस हुआ है! लव यू नेहा.. हम सब तुम्हारे साथ हैं! इन ख़ौफ़नाक दिनों का अंत करीब है। तुम ही लोग ये अंधेरा ये कालिमा काटोगी!
-यशवंत, भड़ास एडिटर
सुशोभित-
झारखण्ड में नेहा पर स्याही फेंकी गई। स्याही फेंकने वालों ने इस वस्तु को कालिख या कलंक समझा होगा, जबकि वह वास्तव में एक गर्वित करने वाला द्रव्य है। स्याही क़लम की सहचरी है। स्याही से लिखा जाता है और लिखने से पहले सोचा जाता है। स्याही एक सोच का प्रतीक है। नेहा इससे कलंकित नहीं होंगी, उलटे ऊर्जा ही पाएँगी।

नेहा का आरोप है कि स्याही फेंकने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध था और उसने यह कृत्य करते समय दक्षिणपंथियों का प्रिय धार्मिक नारा (“जय श्री राम”) भी बुलंद किया। नेहा ने संकेत दिया कि झारखण्ड में छात्रों का आन्दोलन दक्षिणपंथी रंग वाला है और वो नहीं चाहते थे कि वामपंथी उससे किसी भी तरह का श्रेय पाएँ। सोशल-मीडियाजीवी दक्षिणपंथियों की दलीलें हैं कि नेहा छात्रों के आन्दोलन को ‘हाईजैक’ करना चाहती थीं। समझ नहीं आता कि अगर नेहा आन्दोलनकारी छात्रों की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाना चाहती थीं तो उन्हें इससे क्या ऐतराज़ हो सकता था?
पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से दक्षिण खेमे की ओर से बार-बार कहा जा रहा था कि राहुल गांधी झारखण्ड क्यों नहीं जा रहे हैं, उसी से कुछ संकेत तो मिला था। ‘वॉटअबाउटरी’ वर्तमान युग का ब्रह्मास्त्र है। सत्ता से किसी समस्या को लेकर प्रश्न पूछें तो सत्ता के समर्थक उसका जवाब देने के बजाय कोई दूसरी समस्या खोज लाते हैं (या क्रिएट कर देते हैं?) और फिर पूछते हैं कि तुम उस बारे में बात क्यों नहीं करते? मानो एक नई समस्या को सामने रखकर पहले वाली को न्यायोचित ठहराया जा रहा हो। वो समस्या का समाधान नहीं खोजना चाहते, प्रश्न पूछने वालों की नैतिक-निष्ठा को अवमानित करने में उनकी अधिक रुचि होती है।
झारखण्ड में कांग्रेस गठबंधन-सहयोगी है। राहुल वहाँ की राजनैतिक परिस्थिति को सूँघकर वहाँ जाएँगे, नहीं जाएँगे, वह बाद की बात है, किन्तु नेहा गईं तो उन पर स्याही क्यों उछाली गई? देखता हूँ कि नेहा के स्याह चेहरे पर दक्षिणपंथी-वर्ग ख़ूब अट्टहास कर रहा है और मखौल उड़ा रहा है। उन्हें अंदाज़ा नहीं है कि वैसा करके वे अपने ही उस राजनैतिक-आख्यान को निर्मूल बना रहे हैं, जिसका पिछले कुछ दिनों से जयघोष कर रहे थे।
नेहा वामधारा की छात्र-नेता हैं। ग़ज़ब की जुझारू, ऊर्जावान, और थोड़ी उग्र भी हैं। उनमें जो ग़ुस्सा है, उसका आधार शायद इसमें है कि उनके अपने परिवार के लोग भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं, यानी उन्होंने सबसे पहले घर में विद्रोह किया था। इस विद्रोह से क्या क्लेशमयी परिप्रेक्ष्य उभरे होंगे, यह तो उनका अंतर्मन ही जानता है। लेकिन हमें पता है कि मार्क्सवादी विचार-प्रक्रिया में अराजकता और हिंसा के सौन्दर्यशास्त्र से परहेज़ नहीं है। वो विप्लव की भाषा में स्वप्न देखते हैं। 1850 में कम्युनिस्ट लीग की सेंट्रल कमेटी को सम्बोधित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने मज़दूरों से बाक़ायदा हथियारबंद होने की अपील की थी।
नेहा का झुकाव मार्क्स-लेनिन के साथ ही आम्बेडकर, फुळे, पेरियार की ओर भी है। गांधी-नेहरू पर उनके विचार अभी सामने आना बाक़ी हैं, अलबत्ता हम अनुमान लगा सकते हैं कि वो बहुत सहानुभूतिपूर्ण नहीं होंगे। भारत की कम्युनिस्ट पार्टियाँ ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस को बूर्ज्वा-दल बताकर कोसती रही हैं, अलबत्ता राहुल ने नेहा के साथ सहज होकर मंच साझा किया था। आईसा, सीपीआईएमएल की स्टूडेंट-विंग है और नेहा उसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। बिहार-झारखण्ड की राजनीति में सीपीआईएमएल का गहरा प्रभाव रहा है। नेहा राँची से पूर्व पटना भी गई थीं।
इन तमाम परिप्रेक्ष्यों से परिचित होने के बावजूद सच यही है कि वर्तमान में देश में जो भीषण वाम-दक्षिण गरल-मंथन चल रहा है, उसमें हर प्रबुद्ध, संवेदनशील व्यक्ति का झुकाव वामधारा की तरफ़ ही होगा। इन अर्थों में हम नेहा के साथ हैं। हम जानते हैं कि अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर उनके विचारों का विस्तार से प्राकट्य होना अभी शेष है और हम उनमें से सभी से सहमत नहीं हो सकेंगे, किन्तु वर्तमान में जिस व्यवस्था के विरुद्ध, जैसे जुझारूपन से वो ज़मीनी लड़ाई लड़ रही हैं, वह उन्हें हमारे सम्मान और स्नेह का पात्र बनाता है। मैंने तो आईसा की सदस्यता के लिए आवेदन भी कर दिया है। नेहा अपने सहयोगियों को ‘साथी’ कहकर सम्बोधित करती हैं। यह ‘कॉमरेड’ का भारतीय-स्थानापन्न है। यही सम्बोधन हमें नेहा के लिए भी उपयुक्त लगता है।
स्याही के दाग़ ‘साथी’ नेहा को मलिन नहीं कर सकेंगे, क्योंकि उन्होंने अनवरत संघर्ष को ही अपने स्त्रीत्व का अलंकार बनाया है और यह लड़ाई सड़कों और कैम्पस से पहले घर-आँगन में शुरू हुई थी- हर लड़ाई की तरह!
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