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बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अधिवक्ता विशाल कृष्णा की दमदार पैरवी से कोर्ट में दैनिक भास्कर चारों खाने चित, पढ़ें आदेश

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने श्रमिकों के अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को सुदृढ़ करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी पक्ष न्यायालय में प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों को अपनी सुविधा के अनुसार बदलकर या हटाकर अपने मामले को मजबूत करने का प्रयास नहीं कर सकता। यह निर्णय वरिष्ठ पत्रकार अनिल राही बनाम डी.बी. कॉर्पोरेशन लिमिटेड प्रकरण में न्यायमूर्ति मनीष पितले द्वारा दिया गया है, जिसे श्रम कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।

यह मामला वर्ष 2017 में वरिष्ठ पत्रकार अनिल राही की कथित अवैध सेवा समाप्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2023 में अपना पूरा साक्ष्य प्रस्तुत कर दिया था, लेकिन इसके बाद कंपनी की ओर से साक्ष्यों, दस्तावेजों और गवाहों को लेकर लगातार बदलती रणनीति अपनाए जाने के कारण मुकदमे में वर्षों तक अनावश्यक विलंब होता रहा।

हाईकोर्ट ने पूरे घटनाक्रम का विस्तार से परीक्षण करते हुए कहा कि प्रतिवादी कंपनी के पहले गवाह द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को पूरी तरह रिकॉर्ड से हटाना कानून के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पूर्व गवाह का साक्ष्य रिकॉर्ड पर बना रहेगा ताकि याचिकाकर्ता बाद में प्रस्तुत किए जाने वाले गवाह के बयान से उसकी तुलना कर सके, विरोधाभास उजागर कर सके तथा आवश्यक होने पर न्यायालय प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाल सके।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि जिन छह दस्तावेजों को पहले ही रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति अस्वीकार की जा चुकी है, उन्हें किसी नए गवाह के माध्यम से दोबारा प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। साथ ही यदि अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं तो श्रम न्यायालय को प्रत्येक दस्तावेज पर याचिकाकर्ता की आपत्तियों को सुनकर कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। केवल औपचारिक रूप से दस्तावेजों को प्रदर्शित (Exhibit) करना न्यायसंगत प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।

यह फैसला केवल एक कर्मचारी के व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और निष्पक्षता को सुरक्षित रखने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि मुकदमे के दौरान बार-बार गवाह बदलकर अथवा नए हलफनामों के माध्यम से अपने मामले को सुधारने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसा करना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा।

इस पूरे मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता विशाल कृष्णा, उनके सहयोगी अधिवक्ता श्रेयश शिर्के के साथ, विशेष रूप से चर्चा के पात्र रहे। अधिवक्ता विशाल कृष्णा ने पूरे घटनाक्रम की क्रमबद्ध प्रस्तुति करते हुए न्यायालय के समक्ष यह प्रभावी ढंग से रखा कि यदि पहले गवाह के साक्ष्य को रिकॉर्ड से हटा दिया गया तो याचिकाकर्ता अपने कानूनी अधिकारों से वंचित हो जाएगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि न्यायालय द्वारा पहले दिए गए आदेशों की भावना को बनाए रखना आवश्यक है तथा किसी भी पक्ष को बार-बार अपनी कमियों को दूर करने का अवसर देना न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।

उनकी गहन तैयारी, विधिक प्रावधानों की सटीक व्याख्या और न्यायालय के समक्ष तथ्यों की प्रभावशाली प्रस्तुति ने इस मामले को नई दिशा दी। न्यायालय ने उनके तर्कों पर गंभीरता से विचार करते हुए पूर्व गवाह के साक्ष्य को रिकॉर्ड पर बनाए रखने का आदेश दिया, जिससे याचिकाकर्ता को भविष्य की जिरह में उसका उपयोग करने का अधिकार प्राप्त हुआ। यह अधिवक्ता विशाल कृष्णा की प्रभावशाली एवं उच्चस्तरीय कानूनी पैरवी का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा रहा है।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि यद्यपि श्रम न्यायालय में कुछ समय तक रिक्ति रहने के कारण भी देरी हुई, फिर भी मुकदमे के लंबा खिंचने का प्रमुख कारण प्रतिवादी कंपनी द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली रही। इसी कारण न्यायालय ने कंपनी पर 15,000 रुपये का लागत (Costs) भी लगाया तथा निर्देश दिया कि श्रम न्यायालय छह माह के भीतर इस प्रकरण का अंतिम निर्णय देने का प्रयास करे।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में श्रम न्यायालयों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायालय किसी भी पक्ष को प्रक्रिया का दुरुपयोग कर मुकदमे को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने अथवा अपने साक्ष्यों में मनचाहा परिवर्तन करने की अनुमति नहीं देगा।

यह निर्णय केवल अनिल राही की आंशिक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि देशभर के उन हजारों कर्मचारियों के लिए भी आशा का संदेश है जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। साथ ही यह फैसला यह भी सिद्ध करता है कि जब न्यायालय की निष्पक्षता और एक सक्षम अधिवक्ता की सशक्त पैरवी साथ आती है, तब न्याय की राह चाहे लंबी हो, लेकिन अंततः कानून की विजय सुनिश्चित होती है। इस मामले में अधिवक्ता विशाल कृष्णा की उत्कृष्ट कानूनी क्षमता, दृढ़ संकल्प और प्रभावशाली पैरवी निश्चित रूप से विशेष प्रशंसा की पात्र है।

अदालती आदेश की कॉपी…

Cover page of a Bombay High Court writ petition: Anil Rahi v. M/s. D. B. Corporation Limited and others, Writ Petition No. 15107 of 2025, CORAM: Manish Pitale, J., Date: August 06, 2026.
Page 2 of a legal document with dense paragraphs for sections 5–7, mentioning exhibits C-25 to C-38, and a footer '2/11'.
Photograph of a single page from a document, showing dense legal text in numbered sections 8–10, with a page indicator 3/11 at the bottom-right.
Page from a legal document showing an order section titled 'ORDER' with numbered clauses about evidence and parties' rights.
Page from a legal document showing sections 13 and 14 with dense paragraphs about court orders and case citations; includes Banganga Co-operative Housing Society Limited vs Vasanti Gajanan Nerurkar (supra), 2015 SCC OnLine Bom 3411; footer shows page 5/11.
Page 6 of 11 from a legal document, showing paragraphs 15–18 about affidavits and court matters.
Page from a court document showing sections 19–29, including the bold case title 'Banganga Co-operative Housing Society Limited Vs. Vasan­ti Gajanan Nerukar', and subsections (a)–(d) under section 28, plus section 29. Footer reads 7/11.
Document page with dense legal text; sections 30 and 21 visible, footer shows 8/11.
Page from a legal document showing sections 22 and 23 with dense paragraphs about court objections and orders; bottom-right shows page number 9/11.
Page showing clause 24 with subpoints (A–E) from a legal document, detailing procedures and cross-examination conditions in a Labour Court case.
Legal document page with sections 25–27 discussing costs and pending applications, signed by Manish Pitale, J., page 11/11.
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