सुशोभित-
मेलोनी महोदया की कथित ‘अवमानना’ को लेकर चूँकि काफ़ी बातें कही जा रही हैं, इसलिए उनके बारे में कुछ तथ्यों को जानना ज़रूरी है। उनकी पोलिटिकल-पोजिशन धुर-दक्षिणपंथी (फ़ार-राइट) और कट्टर राष्ट्रवादी है। फ़ासिस्ट मुसोलिनी की पोती रैशेल के साथ वो बेखटके चुनाव-प्रचार करती हैं। हंगारी के तानाशाह विक्तोर ओर्बान से उनकी निकटता रही है। एबॉर्शन, सेम-सेक्स मैरिज आदि पर उनका रुख़ वही है, जो अमरीका में डॉनल्ड ट्रम्प का है। एंटी-जेंडर मूवमेंट की वो समर्थक हैं। इमिग्रैशन पर उनकी वही राइट-विंगरों वाली ज़ीरो-टॉलरेंस पॉलिसी है। अश्वेतों के बारे में उन्होंने नस्लवादी पूर्वग्रह के साथ टिप्पणियाँ की हैं। उनकी पार्टी का नाम भी बड़ा अजीबोग़रीब है : ब्रदर्स ऑफ़ इटली! दुनिया के दक्षिणपंथी नेताओं से उनके मेलजोल को तब “मिले कीच से कीच” की ही संज्ञा दी जा सकती है।
वो अनेक राष्ट्राध्यक्षों- जैसे इमैन्युएल मैक्रों से अंतरंगता से मिलती रही हैं और पश्चिमी लिबरल वैल्यूज़ के अनुसार इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है (कथित ‘भारतीय संस्कृति’ की बात अलबत्ता अलग है)। किन्तु किसी नेता के साथ अपने मेलजोल को लेकर यह कहना कि “हम इंटरनेट के सबसे चर्चित कपल हैं”, सॉफ़्ट-डिप्लोमेसी तक के दायरे में नहीं आता। यह घटिया फ़्लर्टिंग है और इसका तो मज़ाक़ बनेगा ही। ‘मेलोडी’ शब्द की ईजाद भी मेलोनी महोदया ने ही की थी, जब उन्होंने कुछ साल पूर्व अपनी एक सेल्फ़ी शेयर की थी। इसी का नतीजा ये रहा कि कालान्तर में उन्हें मेलोडी चॉकलेट भेंट की गई, और वो भी तब जब दुनिया युद्ध की आग में झुलस रही थी और लोगों से पेट्रोल का कम इस्तेमाल करने, यात्राएँ नहीं करने की अपीलें करने के बाद स्वयं विदेश यात्राएँ, रोड-शो किए जा रहे थे। प्री-वेडिंग शूट के अंदाज़ में तस्वीरें खिंचवाना, कोलोजियम की सैर करना आदि कौन-सी डिप्लोमेसी थी? एक नक़ली, फूहड़ रोमैंटिक स्टोरी क्रिएट करके क्या अर्जित किया जा रहा था? क्या यह अपने फ़ेमिनिन-चार्म का कूटनीति में बेज़ा इस्तेमाल करना नहीं था, ये जानते हुए कि सामने वाला चरित्रवान पुरुष तो फिसल ही पड़ेगा?
वैसे भी जिस भारतीय संस्कृति में परस्त्री को देवी, माँ, बहन, बेटी समझा जाता हो, जहाँ व्यभिचार और परस्त्रीगमन को पाप समझा जाता हो और ब्रह्मचर्य को बड़ा महत्त्व दिया जाता हो, जहाँ कथित चरित्रगत निष्ठा का प्रचार राजनैतिक गुण की तरह किया जाता हो, उसके प्रतिनिधि के साथ वैसा प्रेमालाप क्या संदेश देने वाला था? ऐसा तो होता नहीं है कि आप एक दिन साधु के वेश में हों, अगले दिन पुजारी के वेश में और तीसरे दिन छैला बाबू बन बैठें और स्वयं को फिल्मी हीरो समझने लगें? क्या इस कथित प्रेमालाप की लोकप्रियता के पीछे एक विदेशी स्त्री को भारतीय पुरुष द्वारा ‘जीत’ लेने का यौन-कुंठित भाव भी प्रदर्शित किया जा रहा था? और वो भी उन लोगों के द्वारा, जो पंडित नेहरू के एडविना आदि से सम्बंधों को लेकर जाने कितना विषवमन करते फिरते हैं और सोनिया गांधी को बार-बाला और उनके पुत्र को बार-डांसर का पुत्र कहते हैं, मानो बार-डांसर होना कोई अपराध हो गया? यह किस तरह का पाखण्ड है?
कल एक मंच से हँसी-ठिठोली में मेलोनी महोदया की जो अवमानना की गई, उसे इन तमाम वैचारिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों में देखा जाना चाहिए। वैसे भी राहुल गांधी ने वह बात नहीं कहीं थी, संदीप दीक्षित ने कहीं थी। संदीप स्वयं एक सशक्त स्त्री-नेत्री (शीला दीक्षित) के पुत्र हैं, एक असावधान-क्षण में उनके मुँह से वह बात निकल गई। नहीं कहना चाहिए था। कांग्रेस का एक स्तर है। संघियों के स्तर पर कांग्रेस नेताओं को नहीं जाना चाहिए, फिर चाहे बात मेलोनी की ही क्यों ना हो रही हो।


