संजय सिन्हा-
गिनते रह जाएंगे दिमागी नक्सलियों को
मैं नरेंद्र मोदी जी को मन ही मन धन्यवाद देता हूं। उन्होंने आखिर वह शब्द दे दिया, जिसे मैं पिछले पांच साल से ढूंढ रहा था। दिमागी नक्सली।
पिछले पांच साल से मैं सोच रहा था कि जिस आदमी के भीतर व्यवस्था के प्रति गुस्सा हो, जिसके साथ अन्याय हुआ हो, जो सत्ता और संस्थाओं से सवाल करता हो, लेकिन बंदूक न उठाए, सड़क पर हिंसा न करे और कानून का रास्ता न छोड़े, उसे आखिर किस श्रेणी में रखा जाए? अब प्रधानमंत्री जी ने वह श्रेणी बता दी है।
मेरी दीदी बचपन में फिल्म स्टार धर्मेंद्र से मन ही मन प्रेम करती थीं। मुझे लगता है कि ‘अनुपमा’ फिल्म देखकर उनका यह प्रेम जागा होगा। बहुत बाद में मैंने बड़े पिताजी के मुंह से किसी के लिए एक बड़ा सुंदर शब्द सुना था। उन्होंने कहा था कि लड़कियां ऐसे प्रेम में पड़ती हैं तो वह प्रेम नहीं, लगाव होता है। मुझे वह बात आज तक याद है। यानी दीदी को धर्मेंद्र से लव नहीं था, लगाव था। लगाव, लव से एक डिग्री नीचे होता है, इसलिए उसमें सामाजिक खतरा भी कम था। लव होता तो मामला गंभीर हो जाता, अपराध हो जाता, लगाव था तो मामला चुपचाप निकल गया।
मीरा के साथ ऐसा नहीं था। उन्हें कृष्ण से लगाव नहीं, लव था। तभी तो उन्होंने छिपकर नहीं कहा, खुल्मखुल्ला कह दिया, “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई।” अब कर लो जो करना है।
प्रेम में आदमी परवाह छोड़ देता है कि दुनिया क्या कहेगी, परिवार क्या करेगा, समाज क्या मानेगा, सत्ता क्या सोचेगी, सबको किनारे करके वह कह देता है कि मेरे तो यही हैं, दूसरा कोई नहीं।
संजय सिन्हा की दीदी कह नहीं पाईं, मीरा कह गईं। अब यही फर्क मुझे प्रधानमंत्री जी के ‘दिमागी नक्सली’ शब्द में दिखाई देता है।
हथियार लेकर जंगल में जाने वाला व्यक्ति कानून की नजर में नक्सली हो सकता है, हिंसा करने वाला अपराधी हो सकता है। हिंसा का समर्थन किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन वह आदमी क्या कहलाएगा जो बंदूक नहीं उठाता, किसी को मारता नहीं, कोई हिंसा नहीं करता। वो हक के लिए अदालत जाता है, सवाल पूछता है, सरकार की नीतियों से असहमत होता है, अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ लड़ता है और उसके भीतर व्यवस्था के प्रति गुस्सा बना रहता है? दिमागी नक्सली है।
मुझे लगता है कि देश में दिमागी नक्सलियों की संख्या इतनी है कि गिनते-गिनते सरकार के कैलकुलेटर जवाब दे जाएंगे।
इस देश में ऐसा कौन है जिसे कभी न कभी व्यवस्था ने परेशान नहीं किया? किसी की नौकरी गई, किसी की जमीन फंसी, किसी का कारोबार डूबा, किसी की शिकायत पर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, किसी को सरकारी दफ्तरों ने दौड़ाया, किसी को अदालत में सालों इंतजार करना पड़ा और किसी को लगा कि सत्ता के सामने उसकी कोई हैसियत ही नहीं है। करोड़ों लोगों के भीतर व्यवस्था को लेकर कोई न कोई शिकायत है। हताशा है। निराशा है।
किसी ने उस हताशा में बंदूक उठा ली तो वह नक्सली हो गया, लेकिन जिसने बंदूक नहीं उठाई, जिसने अपने गुस्से को भीतर दबाए रखा, लेकिन बोलकर, लिखकर, प्रदर्शन करके और अदालत जाकर अपना विरोध दर्ज कराया, उसका क्या करेंगे? उसे दिमागी नक्सली कह देंगे?
गिनना शुरू कीजिए। गांव का वह आदमी, जो मुखिया से नाराज है, दिमागी नक्सली। पटवारी से परेशान किसान, दिमागी नक्सली। थानेदार से शिकायत लेकर लौट आया आदमी, दिमागी नक्सली। एसडीएम के चक्कर काटता नागरिक, दिमागी नक्सली। कलेक्टर से न्याय मांगता व्यक्ति, दिमागी नक्सली। ट्रायल कोर्ट की तारीखों असंतुष्ट आदमी, दिमागी नक्सली। हाई कोर्ट में अपील के लिए भटकता आदमी, दिमागी नक्सली। सुप्रीम कोर्ट तक न पहुंच सकने वाला, दिमागी नक्सली।
- जो सत्ता की किसी नीति से पीड़ित होकर सवाल पूछ रहा है, वह इस सूची में सबसे ऊपर होगा।
- वह बंदूक नहीं उठा रहा, लेकिन मन में आक्रोश जरूर उठा रहा है।
- कोई गांव के मुखिया को मन ही मन उड़ा रहा होगा, कोई पटवारी को, कोई थानेदार को, कोई एसडीएम को, कोई कलेक्टर को।
- कोई ट्रायल कोर्ट के जज से नाराज होगा, कोई हाई कोर्ट के जज से और कोई सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले से।
बाहर से सब शांत नागरिक हैं लेकिन पूछ लीजिए भीतर सभी अपनी-अपनी अदालत लगाए बैठे हैं। वहां किसी को दोषी ठहराया जा चुका है, किसी को बरी किया जा चुका है। किसी को मन की अदालत में न जाने कितनी बार गोली मारी जा चुकी है।
मैं पिछले पांच साल से जबलपुर में बैठा हूं। क्यों बैठा हूं? अपने साथ हुए धोखे की शिकायत को लेकर। पुलिस के थाने से लेकर ऊपर के अधिकारियों तक गया। अदालत का दरवाजा खटखटाया। एक जगह शिकायत नहीं सुनी गई, तो दूसरी जगह गया। तारीख मिली, फिर तारीख मिली, फिर एक और तारीख मिली।
मैं हर तारीख पर शरीफ आदमी की तरह अदालत पहुंचता रहा और शाम को घर लौटता रहा। मैंने किसी पर पत्थर नहीं फेंका, किसी को पीटा नहीं, कोई बंदूक नहीं उठाई, किसी कार्यालय में आग नहीं लगाई। लेकिन क्या मेरे भीतर गुस्सा नहीं था?
था। मैं मन ही मन कई जजों को कई बार गोली मार चुका हूं। यह मेरे मन की अदालत की गोली थी, बंदूक की नहीं। जिन फैसलों ने मुझे भीतर तक चोट पहुंचाई, उन पर मैंने मन ही मन न जाने कितनी बार फैसला सुनाया है। कभी पुलिस को ठोका है, कभी अधिकारियों को, कभी अदालत को और कभी उन लोगों को जिनके खिलाफ मैं लड़ रहा हूं। मन में गोली चली है, खूब चली है। लेकिन असली दुनिया में मैंने क्या किया?
कानून का रास्ता छोड़ा क्या? नहीं। मैंने कानून पढ़ना शुरू किया। हक की लड़ाई को समझना शुरू किया। पत्रकारिता पीछे छूट गई, दिल्ली पीछे छूट गई, मेरी पुरानी जिंदगी पीछे छूट गई। परिवार कहीं पीछे रह गया। मैं जितना आहत हुआ, उतना ही कानून में धंसता गया।
मैं आज भी खड़ा हूं। अड़ा हूं। मेरे हाथ में न बंदूक है, न कोई हथियार। मेरे पास कानून है और दिमाग है।
प्रधानमंत्री जी के शब्दकोश में व्यवस्था से पीड़ित, व्यवस्था से नाराज, सरकार की नीतियों से असहमत, अपने अधिकार के लिए लड़ने वाला और कानून के रास्ते पर चलने वाला आदमी दिमागी नक्सली है, तो इस देश में हर वह आदमी दिमागी रूप से नक्सली है जो व्यवस्था की नीति से पीड़ित है।
जिसे व्यवस्था ने धक्का दिया है लेकिन उसने बंदूक नहीं उठाई। वह लिख रहा हो सकता है, बोल रहा हो सकता है, प्रदर्शन कर रहा हो सकता है, अदालत जा रहा हो सकता है, भीतर सवालों से सुलग रहा हो सकता है, वह दिमागी नक्सली है। आप दिमागी नक्सलियों की संख्या गिनते रह जाएंगे।
आपने हथियार वाले नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई की बात की है। बिल्कुल कीजिए। हिंसा का समर्थन कौन करेगा? लेकिन एक बात समझिए, हर असहमति को नक्सलवाद का नाम दे देने से लोगों के भीतर की आग बुझती नहीं है। उलटे आदमी को लगता है कि उसकी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं है और उसकी आवाज को सवाल का जवाब देने के बजाय एक लेबल दे दिया गया है।
यही विडंबना है। दिमागी नक्सली को आप सजा भी नहीं दे सकते। मन के भीतर चली गोली पर कौन-सी धारा लगाएंगे?
जिनके पास दिमाग होता है, वे आखिर में कानून से ही लड़ते हैं। वे बंदूक उठाने के बजाय कानून की किताब उठाते हैं, जंगल जाने के बजाय अदालत जाते हैं और हिंसा करने के बजाय दलील करते हैं। उन्हें हराने के लिए पुलिस नहीं, जवाब चाहिए। उन्हें चुप कराने के लिए लाठी नहीं, तर्क चाहिए।
उन्हें खत्म करने के लिए बंदूक नहीं, न्याय चाहिए। औरों की क्या कहूं, मैंने बंदूक नहीं उठाई, उम्र के इस पड़ाव पर आकर कानून उठाया है। सब छोड़ कर लॉ की पढ़ाई की, सवाल पूछने के लिए।
अगर सवाल पूछना, असहमति रखना, अपनी पीड़ा बताना और अपने अधिकार के लिए कानून के रास्ते पर लड़ना ही दिमागी नक्सलवाद है, शुरू कीजिए गितनी। दिमागी नक्सलियों को गिनते-गिनते सिस्टम थक जाएगा, गिनती खत्म नहीं होगी।


