- मुख्यमंत्री योगी की जीरो टॉलरेंस नीति को खुली चुनौती, Pwd Act को अफसरों ने आईना दिखाया
- मेज दर मेज भटक रही है दिव्यांग पत्रकार की मदद वाली फाइल, दो महीनों से घुमा रहे हैं अफसर
- सरोजनीनगर विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने विशिष्ट कृतिम अंग के लिए की थी विधायक निधि से संस्तुति
लखनऊ। देश में दिव्यांगों को सम्मान और उनके स्वास्थ्य व पुनर्वास की गारंटी देने के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ((PwD Act) जैसे सख्त कानून में लापरवाही बरतने वाले लोक सेवकों को 5 साल तक की जेल का प्रावधान है। लेकिन लखनऊ के DRDA यानि जिला ग्राम्य विकास अभिकरण का पूरा तंत्र इस सख्त कानून के बावजूद तकनीकी अंडंगा लगाकर एक दिव्यांग पत्रकार की फाइल के साथ भद्दा मजाक कर रहा है।
इस प्रकरण में सरोजनीनगर के लोकप्रिय और संवेदनशील विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने तारीफ करनी होगी। उनहोंने गंभीर बीमारी के कारण अपने दोनों पैरों से लाचार हो चुके क्षेत्र के एक वरिष्ठ पत्रकार की जीवन रक्षा के लिए बिना एक पल गंवाए पिछले महीने जून में ही अपनी विधायक निधि से ₹92,000 की धनराशि स्वीकृत कर दी थी। क्षेत्रीय विधायक की इस त्वरित और सराहनीय पहल से पीड़ित परिवार को एक नई उम्मीद जगी थी, लेकिन डीआरडीए के लापरवाह तंत्र ने इतने कड़े कानून और जनप्रतिनिधि की भलाई की धज्जियां उड़ाते हुए इस पर पानी फेर दिया है। सामने आए एक सरकारी पत्र से यह साफ हो गया है कि कैसे नियमों की आड़ लेकर सिस्टम की लालफीताशाही ने इस फाइल को जानबूझकर अटका रही है और दिव्यांग को दौड़ा रही है।
क्या है पूरा मामला?
लखनऊ के निवासी और कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके से वरिष्ठ पत्रकार पिछले कई महीनों से केजीएमयू के सीटीवीएस विभाग में डीवीटी (Deep Vein Thrombosis) यानि पैर की मुख्य नस में खून का थक्का जमना जैसी जानलेवा बीमारी का इलाज करा रहे हैं। इस खतरनाक बीमारी के कारण उनका बांया पंजा पहले ही काटना पड़ा था, और हाल ही दोबारा फिर डीवीटी का अटैक पड़ गया और जान बचाने और संक्रमण फैलने की वजह से दाएं पैर का मुख्य अंगूठा भी काटना पड़ा। वह इस समय दोनों पैरों से गंभीर रूप से दिव्यांग हो चुके हैं। मरीज के पैरों की नसों पर दबाव रोकने और दोबारा संक्रमण न फैले, इसके लिए उन्हें एक विशिष्ट कृत्रिम पैर की जरूरत है। चूंकि डीवीटी पूरी तरह नसों की ही बीमारी है, इसलिए मरीज को सामान्य या प्लास्टिक के बने कृत्रिम अंग नहीं पहनाए जा सकते।
ऐसे कृतिम अंगों से पैर की संवेदनशील नसों पर भारी दबाव पड़ सकता है और खून का दौरा फिर रुक सकता है। ऐसी परिस्थितियों में अगर दोबारा गैंगरीन फैला तो पूरा पैर भी काटना पड़ सकता है। इतना ही नहीं इस गंभीर बीमारी से जान को भी सीधा खतरा हो सकता है। इसके अलावा, दोनों पैरों से लाचार होने के कारण यदि उन्हें सही मेडिकल-ग्रेड संतुलन वाला कृतिम अंग नहीं मिला, तो उनकी रीढ़ की हड्डी (Spine) में भी गंभीर समस्या हो सकती है। अफसरों ने ऐसे खेला गया फाइल अटकाओ खेल कोई भी सरकारी एजेंसी मसलन एल्मिको, सीआरसी, केजीएमयू का लिम्ब सेन्टर या शकुन्तला देवी दिव्यांग पुर्नवास विश्वविद्यालय में सिर्फ साधारम कृतिम अंग ही बनते हैं जबकि प्रार्थी को विशिष्ट अंग( सिलिकॉन से बनने वाला कृतिम अंग) थोड़ा महंगा होता हैं। यही वजह है कि कोई भी सरकारी संस्था या सरकारी उपक्रम इनका निर्माण नहीं करता है। इस आपातकालीन स्थिति को देखते हुए विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने 10 जून 2026 को अपनी अनुशंसा (पत्रांक- 13501) के जरिए ₹ 92,000 की राशि स्वीकृत कर दी थी। पीड़ित पत्रकार ने इसके साथ यह अंग देने वाली पंजीकृत फर्म का वैध कोटेशन और उपकरणों का विवरण भी सौंप दिया था।
नियमतः यह राशि डीआरडीए द्वारा सीधे आरटीजीएस के जरिए फर्म को जानी चाहिए थी। लेकिन डीआरडीए के तंत्र ने इस पर पानी फेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । डीआरडीए के परियोजना निदेशक ने पूरे 19 दिन बाद 29 जून 2026 को एक पत्र (पत्रांक: 676/ जि. ग्रा. वि.अ./वि०नि०/2026-27) जारी कर इस फाइल को जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी, लखनऊ को जारी किया जिसमें उन्हें कार्यदायी एजेंसी नामित करते हुए उनसे बैंक खाता मांग लिया। परियोजना निदेशक जानते हैं कि जिले के अफसरो का सरकारी खाता नहीं होता है पर इसके बावजूद ऐसा कर दिया गया।
इतना ही नहीं डीआरडीए के परियोजना निदेशक और बाबुओं को अच्छी तरह पता था कि जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग की अपनी वित्तीय सीमा मात्र ₹ 15,000 है, जिसके तहत वे बेहद सामान्य कृत्रिम अंग ही बनवा सकते हैं। ₹ 92,400 का अत्याधुनिक सिलिकॉन अंग यह विभाग चाहकर भी नहीं बना सकता। इसके बावजूद जानबूझकर फाइल को वहां भेजा गया ताकि वहां से तकनीकी पेंच लग जाए। डीआरडीए का यर रवैया सीधे तौर पर एक दिव्यांग पत्रकार को परेशान करने और मामले को लटकाने की प्रशासनिक साजिश को दर्शाता है।
(PwD Act) एक्ट के बाद भी किया गया यह दुस्साहस: कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, यह मामला सिर्फ प्रशासनिक ढिलाई का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर कानून की अवहेलना काहै, क्योंकि इस एक्ट में साफ-साफ लिखा है कि स्वास्थ्य और प्राथमिकता का अधिकार (धारा 25 व 31) के तहत गंभीर बीमारी से पीड़ित किसी भी दिव्यांग को जीवन रक्षक उपकरण और पुनर्वास का लाभ प्राथमिकता के आधार पर तुरंत देना प्रशासन की कानूनी बाध्यता है।
भेदभाव और प्रताड़ना के खिलाफ अधिकार (धारा 3 व 6): कोई भी विभाग किसी दिव्यांग को इस तरह फाइलों के चक्कर में नहीं घुमा सकता जिससे उसे शारीरिक या मानसिक क्रूरता झेलनी पड़े।
सीधे जेल का प्रावधान (धारा 92): इस एक्ट के तहत यदि कोई सरकारी कर्मचारी किसी दिव्यांग व्यक्ति को जानबूझकर परेशान करता है या उसके कानूनी लाभ को अटकाता है, तो यह एक गंभीर अपराध है, जिसमें 6 महीने से लेकर 5 साल तक की जेल का प्रावधान है। इतने कड़े कानून के बाद भी बाबुओं ने जो किया, वह हैरान करने वाला है। विधायक कार्यालय की त्वरित पहल भी काम नहीं आयी बाबुओं की इस प्रशासनिक अड़ंगेबाजी से त्रस्त होकर पीड़ित जुलाई माह में यह प्रार्थना पत्र लेकर सरोजनीनगर विधायक कार्यालय पहुंचे, तो वहां उपस्थित विधायक जी के प्रतिनिधि डॉ. अखिलेश सिंह ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत एक्शन लिया। उन्होंने बिना समय गंवाए लखनऊ के मुख्य विकास अधिकारी प्रफुल्ल कुमार शर्मा को पूरे मामले से अवगत कराया और तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
विधायक प्रतिनिधि के कड़े रुख के बाद सीडीओ प्रफुल्ल कुमार शर्मा ने प्रार्थी को राहत देने का भरोसा जताया । इसी बीच जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी लखनऊ ने भी एक अदद विशिष्ठ कृतिम अंग के लिए भारी भरकम कमेटी बनाकर फाइल सीडीओ कार्यालय भेज दी। इस फाइल में एक कृतिम अंग खऱीद के लिए इतनी भारी भरकम कमेटी बना दी कि मानों विकलांग कैम्प के लिए दर्जनों विशिष्ट अंग खऱीदने हों। सीडीओ ने दोबारा फाइल जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी लखनऊ के पास भेजी।
दस दिनों तक कोई जवाब न आने पर विकलांग पत्रकार गुरुवार को मुख्य विकास अधिकारी पहुंचा तो बताया गया की फाइल अभी आयी ही नहीं है। सीडीओ कार्यालय से फोन जाने के बाद फाइल शाम तक भेजने का आश्वासन दिया गया था। शुक्रवार को जब फाइल की स्थिति जानने के लिए फोन किया गया तो सीडीओ कार्यालय के कर्मचारी इस बावत कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके।


