अनिल भास्कर-
साख का संकट अब हर तरफ है। मीडिया, राजनीति, न्यायपालिका तक। कार्यपालिका तो खैर पहले ही कपड़े उतार चुकी है। लेकिन समाज को आईना दिखाने, सही गलत का फर्क बताने का दम भरने वाले विद्वतजन भी हमाम में नंगे हो जाएंगे तो फिर सच और झूठ का भेद हमेशा के लिए जाता रहेगा। यह ज्यादा चिंताजनक स्थिति है।
अब देखिए न! जंतर-मंतर के बाद झारखंड के छात्रों ने रांची में जेपीएससी भर्ती घोटाले के खिलाफ मोर्चाबंदी कर दी। धरना, प्रदर्शन, अनशन। लगभग जंतर मंतर की तर्ज़ पर। अपनी मांगें न मांगे जाने या सरकार की तरफ से अपेक्षित तवज्जो न मिलने से उद्वेलित होकर कल विधानसभा घेरने चले तो पुलिस ने लाठियां निकाल लीं। जमकर भांजे। फिर वाटर कैनन से जलधार छोड़ी। और अंत में आंसू गैस के गोले दागे। कमोवेश वैसी ही अफरातफरी जैसी पिछले महीने जंतर मंतर से उठकर संसद घेरने जाते छात्रों को रोकने की पुलिसिया कोशिश के दौरान हुई थी।
विडंबना देखिए कि इसी समय दिल्ली में राहुल और खरगे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जंतर मंतर पर लाठीचार्ज के लिए प्रधानमंत्री से माफी और गृहमंत्री से संसद में जवाब मांग रहे थे। जब एक पत्रकार ने राहुल से इस बाबत सवाल पूछा तो उन्होंने सिर्फ यह कहते हुए माइक खरगे की तरफ सरका दिया कि हम छात्रों पर किसी भी तरह के बलप्रयोग के खिलाफ हैं।
क्या यही बात वह मुख्यमंत्री सोरेन से पहले ही नहीं कह सकते थे? क्या छात्रहित में सोरेन से बात कर मामले का त्वरित पटाक्षेप नहीं करा सकते थे? मगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। न ही विपक्षी गठबंधन के किसी और दल ने इस मामले में कोई सक्रियता दिखाई।
चलो, राजनीतिक दलों का दोहरापन तो समझ में आता है। अपनी या अपने सहयोगी दल की सरकार के खिलाफ कोई मोर्चा खोले भी तो कैसे? इसलिए वे तेरा छात्र मेरा छात्र, तेरी पुलिस मेरी पुलिस के दोहरे मानदंडों से खुद को बचा नहीं पाते। वैसे भी उनका लक्ष्य न्याय नहीं, सत्ता संधान की राजनीति होता है। अब तक यही रहा है। इसलिए जनता के बीच उनकी साख राख हो चुकी है और वह मौजूदा लोकतांत्रिक ढांचा ढोने को मजबूर है। लेकिन विद्वतजन? वे क्यों तेरा मेरा के फेर में अपने कपड़े उतारे जा रहे हैं?
यहां विरोध, वहां बचाव की बौद्धिक नग्नता पर उतर आए हैं? उनके लिए निष्पक्ष न्यायदृष्टि राजनीतिक झुकाव के सामने बेमानी क्यों हो गई है? वे किस सुखसंधान में रमे हैं? क्या वाकई हमाम में अब हम सब नंगे हो चुके हैं? अगर हां, तो फिर मान लेना चाहिए कि नग्नता अब निंदनीय नहीं रही।


