ले भाई राहुल गांधी… हिसाब बराबर न
मोदी ने लड़कों को जंतर मंतर में पेला…तुम्हारी सरकार ने रांची में यही काम कर दिया
झारखंड सरकार में कांग्रेस हिस्सेदार है और अभी तक कांग्रेस ने समर्थन वापस नहीं लिया है
राहुल में जिन सोभड़ीवालों को क्रांतिकारी दिखते हैं वो दरअसल कांग्रेस के पेड लेखक हैं
खासकर पुराने वामपंथिए राहुल को कपार पर चढ़ाये हैं।
राहुल और मोदी में ख़ास फ़र्क़ नहीं है
मोदी अपढ़ है राहुल पढ़ा लिखा
मोदी राइटिस्ट है राहुल ऑपोर्च्यूनिस्ट (सेंट्रिस्ट प्लस लेफ्टिस्ट) है
मोदी का विकल्प कभी राहुल नहीं हो सकता क्योंकि कांग्रेस जैसी महाभ्रष्ट पार्टी का नेता ईमानदार नहीं हो सकता
छत्तीसगढ़ राजस्थान में भी इनकी सरकार थी। देख लो! बघेल गहलोत के करप्शन किसी से छिपे हैं।
कांग्रेस को कुचल कर खत्म कर देना चाहिए था लेकिन भारतीय पूंजीपति को भ्रष्ट पार्टियां पसंद हैं।
ये यूँ ही नहीं है कि राहुल को आजकल जबरन विकल्प बनाया जा रहा है, हमें आपको उसे पसंद करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
नए भेड़िए से भी सावधान रहिएगा अन्यथा दुबारा रोयेंगे!
हम भेड़ें हैं जिन्हें एक सा सोचने के लिए मजबूर किया जाता है। जो पार्टी साठ साल तक करप्ट रही, वो कैसे ईमानदार हो जाएगी? बातें बना बना कर मोदी सत्ता में आया, यही काम अब राहुल कर रहा है। दोनों एक जैसे हैं।
हम दड़बे पिंजड़े में क़ैद लोग एक तरह का जीने खाने सोचने वाले ग़ुलाम हैं!
जै हिन्द!
-यशवंत सिंह, भड़ास एडिटर
शीतल पी सिंह-
और अब राँची में लाठीचार्ज… झारखंड में छात्रों का आंदोलन अब केवल JPSC-JSSC की कुछ परीक्षाओं का विवाद नहीं रह गया है। यह उस व्यवस्था के खिलाफ गुस्से में बदल रहा है जिसमें नौजवान वर्षों पढ़ता है, परीक्षा देता है, रिजल्ट का इंतजार करता है और फिर कभी पेपर लीक, कभी मूल्यांकन, कभी नियुक्ति और कभी पूरी चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
कल, 10 अगस्त को रांची में हजारों छात्र विधानसभा की ओर बढ़े। कई बैरिकेड तोड़े गए। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठियों का इस्तेमाल किया। कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबरें हैं। आंदोलन करीब दो सप्ताह से चल रहा है और इसकी प्रमुख मांगों में विवादित भर्तियों की CBI जांच शामिल है। सरकार ने 14वीं JPSC सहित तीन परीक्षाएं रद्द करने का फैसला किया है, लेकिन JSSC-CGL रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की, कहा कि मामला कोर्ट में है । सरकार ED जांच की सिफारिश और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की बात भी कर रही है। आज ही पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांगते को CID ने गिरफ्तार किया है। यानी यह मामला अब केवल सड़क पर लगाए जा रहे आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है।
इस आंदोलन का एक राजनीतिक पहलू भी है। जंतर-मंतर के बड़े युवा आंदोलन के बाद अब झारखंड में सरकार घिरी है। उत्तर-मध्य भारत के बड़े भूगोल में झारखंड उन गिने-चुने राज्यों में है जहां केंद्र में विपक्ष में बैठे दल सत्ता में हैं। यहां JMM-कांग्रेस-RJD गठबंधन की सरकार है। इसलिए वही परीक्षा, रोजगार और भर्ती का सवाल, जिस पर विपक्ष दिल्ली में केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा था, अब उसके अपने दरवाजे पर खड़ा है।
आज के प्रदर्शन को लेकर एक वीडियो भी सामने आया है। वाहन में बैठे कुछ युवक बातचीत में पश्चिम बंगाल से आने की बात करते सुनाई देते हैं। इसे प्रसारित करने वाले X अकाउंट ने दावा किया है कि BJP ने बंगाल से गाड़ियों में बाहरी लोगों को भेजा। जब तक स्वतंत्र प्रमाण न मिले, इस हिस्से को आरोप ही कहा जाना चाहिए, तथ्य नहीं।
लेकिन इसका उलटा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अगर बंगाल, बिहार या किसी दूसरे राज्य से छात्र झारखंड के छात्रों के समर्थन में आते हैं तो केवल “बाहरी” होने से उनकी भागीदारी संदिग्ध नहीं हो जाती। जंतर-मंतर पर भी अलग-अलग राज्यों के नौजवान पहुंचे थे। राजनीतिक दल भी आंदोलनों में शामिल होते रहे हैं। बीजेपी आंदोलन में यदि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल है तो यह उसका अधिकार है । असली सवाल यह है कि आंदोलन पैदा क्यों हुआ?
और यहां झारखंड सरकार के लिए मामला असुविधाजनक हो जाता है।
जंतर-मंतर पर छात्रों को बैरिकेड, पुलिस, हिरासत और बल प्रयोग का सामना करना पड़ा तो विपक्ष ने बिल्कुल ठीक सवाल उठाया था कि लोकतंत्र में बेरोजगार और परेशान नौजवान अपनी बात कहने कहां जाएं? अब रांची में विधानसभा की तरफ बढ़ते छात्रों पर वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठियां चली हैं। सरकार ने बातचीत जरूर की, कुछ परीक्षाएं रद्द भी कीं और जांच संबंधी कदम भी उठाए; इस अर्थ में उसने आंदोलन से संवाद का रास्ता खुला रखा है लेकिन आखिर में पुलिस का डंडा रांची में भी वही है जो दिल्ली में था।
राजनीतिक सिद्धांत सत्ता बदलने के साथ नहीं बदल सकता। दिल्ली में छात्र लोकतांत्रिक आंदोलनकारी हैं तो रांची में अचानक “उपद्रवी” नहीं हो सकते। और यदि रांची में बैरिकेड तोड़ना कानून-व्यवस्था की समस्या है तो दिल्ली में भी उसी कसौटी से घटनाओं को देखना होगा।
लेकिन इस आंदोलन को समझने के लिए करीब डेढ़ दशक पीछे जाना और भी जरूरी है। इस कालक्रम को नोट कीजिए ।
30 दिसंबर 2009 – 1 जून 2010: शिबू सोरेन (JMM) मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार में BJP भी गठबंधन सहयोगी थी। मई 2010 में BJP-JMM के बीच सत्ता हस्तांतरण को लेकर बाकायदा समझौता भी हुआ था।
1 जून – 11 सितंबर 2010: राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा।
11 सितंबर 2010 – 18 जनवरी 2013: अर्जुन मुंडा (BJP) मुख्यमंत्री रहे। उनकी सरकार भी गठबंधन सरकार थी और JMM तथा AJSU उसके सहयोगी थे।
JPSC में गड़बड़ी के आरोप हेमंत सोरेन सरकार के दौरान पैदा नहीं हुए हैं । झारखंड में आयोग की शुरुआती परीक्षाओं से ही इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठने लगे थे। पहली और दूसरी Combined Civil Services Examination सहित Market Supervisor और Lecturer जैसी भर्तियों तक को लेकर आरोप लगे।
मामला इतना गंभीर हुआ कि झारखंड हाईकोर्ट के 14 जून 2012 के फैसले में दर्ज है कि तत्कालीन JPSC अध्यक्ष और सदस्यों के खिलाफ आरोपों में deliberate irregularities, malpractice, रिश्वत, प्रभाव और पक्षपात जैसी बातें शामिल थीं। आरोप यह भी था कि संवैधानिक पदों का दुरुपयोग रिश्तेदारों और करीबियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया। राज्य Vigilance की शुरुआती जांच में आरोप प्रथमदृष्टया सही पाए गए थे। (Indian Kanoon)
दूसरी Civil Services Examination में 172 चयनित अभ्यर्थियों का मामला था। Vigilance ने नमूने के तौर पर 37 उम्मीदवारों की answer sheets और interview documents की जांच की और उनमें 19 की उम्मीदवारी संदिग्ध पाई। Vigilance के DGP ने मई 2010 में बाकायदा सुझाव दिया था कि दूसरी Civil Services Examination तथा JPSC अध्यक्ष और सदस्यों की संपत्तियों की जांच CBI को दी जाए। लेकिन तत्कालीन मुख्य सचिव ने उस समय CBI जांच की आवश्यकता नहीं मानी और राज्य Vigilance से ही जांच जारी रखने की राय दी। (Indian Kanoon)
फिर मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने पाया कि वर्षों गुजर जाने के बावजूद State Vigilance Bureau की जांच की प्रगति संतोषजनक नहीं थी। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि आरोप प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं और मंत्रियों के करीबियों के चयन तक जा रहे थे और JPSC ने जरूरी रिकॉर्ड तक Vigilance को उपलब्ध नहीं कराए थे।
इसके बाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला किया—Vigilance के पास लंबित सभी संबंधित मामले CBI को सौंप दिए जाएं। और यहां एक ऐसा तथ्य है जिसे आज CBI जांच मांग रहे छात्रों और CBI जांच देने या न देने पर विचार कर रही सरकार—दोनों को जरूर याद रखना चाहिए।
हाईकोर्ट ने 2012 में उम्मीद जताई थी कि CBI जांच को यथासंभव जल्दी, preferably तीन महीने में पूरा करे। (Indian Kanoon)
तीन महीने! लेकिन इस कहानी का यही सबसे कड़वा हिस्सा है। जांच और उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया वर्षों नहीं, एक दशक से भी अधिक खिंचती चली गई। जिन युवाओं की उम्र और करियर का सवाल था, उनके लिए “CBI जांच” अपने-आप तत्काल न्याय में नहीं बदल गई।
यानी पिछली JPSC कहानी हमें दो बिल्कुल विपरीत सबक देती है।
पहला—छात्र जब स्वतंत्र जांच मांगते हैं तो उन्हें आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। पिछली बार स्वयं झारखंड हाईकोर्ट को राज्य Vigilance की जांच से असंतुष्ट होकर मामला CBI को देना पड़ा था। अदालत ने यहां तक कहा था कि JPSC जैसी संवैधानिक संस्था प्रथमदृष्टया चयन प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से चलाने में विफल रही और बड़े पैमाने पर fraud की आशंका दिखाई देती है।
लेकिन दूसरा सबक उतना ही महत्वपूर्ण है—सिर्फ तीन अक्षर CBI लिख देने से न्याय नहीं हो जाता। जांच वर्षों खिंच जाए, मुकदमे दशकों चलें और इस बीच उम्मीदवारों की उम्र निकल जाए तो एजेंसी बदलने से नौजवान को क्या मिला?
इसीलिए आज की मांग केवल “CBI जांच” तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मांग होनी चाहिए—स्वतंत्र जांच + समय सीमा + सार्वजनिक जवाबदेही + दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई + पारदर्शी परीक्षा प्रणाली + निश्चित भर्ती कैलेंडर।
यही वह बिंदु है जहां हेमंत सोरेन सरकार को दिल्ली की केंद्र सरकार से अलग उदाहरण प्रस्तुत करने का अवसर था—और अभी भी है।
छात्रों को बुलाइए। उनके दस्तावेज सार्वजनिक रूप से सुनिए। जिन परीक्षाओं पर गंभीर तथ्यात्मक संदेह है उनकी स्वतंत्र जांच कराइए। यदि CBI नहीं तो बताइए क्यों नहीं; और यदि CID/ED जांच पर्याप्त है तो उसकी समय सीमा और निगरानी व्यवस्था बताइए। लेकिन नौजवानों के सवाल का जवाब लाठी से मत दीजिए।
और BJP को भी जवाब देना चाहिए। अगर बंगाल से लोगों को संगठित रूप से गाड़ियों में वही ला रही है, जैसा वायरल पोस्ट आरोप लगा रहा है, तो उसे बताना चाहिए कि कौन लोग आए, किस संगठन के थे और यात्रा की व्यवस्था किसने की। लेकिन यह आरोप साबित हो भी जाए तो उससे JPSC-JSSC की गड़बड़ियों का प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता।
झारखंड का इतिहास ही इसका गवाह है।
यहां JPSC की परीक्षा पर आज पहली बार सवाल नहीं उठ रहे। पहले Vigilance बैठी, फिर हाईकोर्ट आया, फिर CBI आई। जिस CBI जांच से तीन महीने में नतीजे की उम्मीद थी, उसकी कहानी वर्षों और फिर दशक के पार चली गई।
इसलिए इस आंदोलन को केवल सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई समझना गलती होगी।
असली लड़ाई उस नौजवान की है जिसके जीवन के सबसे कीमती पांच-दस साल competitive examinations खा जाती हैं। वह फीस देता है, कोचिंग करता है, किराया देता है, परिवार से पैसे लेता है, उम्र गंवाता है और फिर उसे पता चलता है कि जिस दौड़ में वह पूरी ताकत से भाग रहा था, शायद उसकी starting line ही सबके लिए बराबर नहीं थी।
उसके लिए सवाल बहुत छोटा है— परीक्षा ईमानदारी से करवा सकते हैं या नहीं?
दिल्ली हो या रांची, BJP की सरकार हो या JMM-कांग्रेस की—इस सवाल का जवाब लाठी नहीं हो सकती।
झारखंड में छात्रों पर जो लाठीचार्ज हुआ है, वो एक अच्छा लाठीचार्ज है. इस लाठीचार्ज में दिल्ली लाठीचार्ज जैसी हिंसा नहीं थी. यह अहिंसक लाठीचार्ज था. रांची में लाठीचार्ज 30 डिग्री पर छात्रों को केवल पीटा गया, जबकि दिल्ली में 90 डिग्री पर लाठीचार्ज कर छात्रों को मारा गया था.
रांची लाठीचार्ज में छात्रों को लाठी मारते समय सुरक्षा बल केवल 25 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ा रहे थे, जबकि दिल्ली लाठीचार्ज में छात्रों को 85 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ाकर मारा भी गया, और पीटा भी गया. इसलिये रांची लाठीचार्ज एक अच्छा लाठीचार्ज है.
नीट परीक्षा का लीकेज ज्यादा था, जबकि झांसी वाले पेपर का लीकेज नाम मात्र का था. उसमें हम वामपंथियों को मंत्री का इस्तीफा ही चाहिये था, जबकि यहां हम मंत्री का इस्तीफा नहीं चाहते थे. छात्र रांची में गलत मांग कर रहे थे, इसलिये पुलिस का लाठीचार्ज करना एक उचित लाठीचार्ज था.
दिल्ली में सरकार दूसरी थी, इसलिये वहां का लाठीचार्ज इंसानियत और छात्रों के खिलाफ था. दिल्ली में लाठीचार्ज कर लोकतंत्र की गरिमा को ठेस पहुंचाया गया, जबकि रांची लाठीचार्ज करके लोकतंत्र बचाया गया था, इसलिये रांची लाठीचार्ज एक अच्छा लाठीचार्ज था.
-अनिल सिंह, वरिष्ठ पत्रकार


