कॉक्रोच से निपटने के लिए दिल्ली में बिना नेमप्लेट वाले वर्दीधारियों की सहायता के लिए बिना वर्दी वाले लठैत भी थे। कलकत्ता में प्रदर्शन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का था,क्रॉक्रोच तलाशने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक करनी थी तो इतने लोगों के मुकाबले वर्दी वाला दो सिपाही – वह भी निहत्था।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में सरकारी प्रचार और जनता की समस्याएं दोनों हैं। शीर्षक की दो खबरों के अलावा सरकारी योजना का प्रचार भी हैं। आज मैं 10 अखबारों की कुछ चुनी हुई खबरों से बताउंगा कि सरकार की प्राथमिकताएं उसके काम और जनता की जरूरतें बिल्कुल अलग हैं। पहले सरकारी प्रचार को देखना-समझना जरूरी है। खासकर तब जब आदित्य ठाकरे ने पूछा है कि वंदे मातरम से जुड़ा विधेयक पास हुआ तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री संसद में क्यों नहीं थे? उन्होंने इसे ‘वंदे मातरम्’ का अपमान बताया और भाजपा से सवाल किया कि उसका इस नारे से वास्तव में क्या संबंध है। जवाब आना नहीं है या जब आएगा तो उसकी भी बात कर लेंगे।
अभी तो नवोदय टाइम्स की लीड उल्लेखनीय है। शीर्षक है, वंदे मातरम 2/6 पर घमासान। अमित शाह बोले – कांग्रेस का फैसला देश विरोधी। कहा, कानून का उल्लंघन कर वोट बैंक के लिए तुष्टिकरण है कांग्रेस का मकसद। मुझे लगता है कि यह एक तरफा खबर है, भाजपा की राजनीति की रिपोर्टिंग है और कांग्रेस के जवाब को नहीं के बराबर जगह दी गई है जबकि 1937 में जो मामला निपट गया था उसपर अब चर्चा का कोई मतलब नहीं है और अगर है भी तो 2014 से भाजपा क्या कर रही थी और इतने समय तक नहीं की तो 2037 का इंतजार क्यों नहीं उसी समय बात की जा सकती थी। लेकिन यहां स्थिति दूसरी है। फैसले और फरमान सुनाए जा रहे हैं।
अमर उजाला और दैनिक भास्कर की लीड दिल्ली के मास्टर प्लान से संबंधित खबर है और सरकार का प्रचार है। दैनिक भास्कर की सेंकड लीड मेघालय की खबर है। शीर्षक है, उपद्रव के बाद 12 हजार पर्यटक फंसे, बुकिंग रद्द। खबर के अनुसार पर्यटकों को पीटा गया और असम नंबर की टैक्सीयां तोड़ी गईं। अमर उजाला की सेकेंड लीड भी सरकारी प्रचार है, तुर्किये ने ऑपरेशन सिंदूर में तबाह नूर खान पर उतारे ड्रोन व हथियार। मक्का डील के बाद पाकिस्तान में उतरा सैन्य विमान, भारत सतर्क। एक खबर में चिन्ता का कारण बताया गया है – तुर्किये ने ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान पाकिस्तान को भेजे थे ड्रोन, भारत ने मार गिराए थे। हालांकि, अमर उजाला में एक निराश करने वाली खबर है, अमेरिकन ड्रीम वालों को एनआरआई की सलाह…. यहां मत आओ।
आप समझ सकते हैं कि भारत की हालत कैसी है और अगर लगता है कि बच्चे अमेरिका या विदेश चले जाएंगें तो वहां भी नहीं जाने की सलाह है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, इस्लामाबाद की कार्रवाई के मुकाबले भारत ने भी दिल्ली में पाकिस्तान दूतावास के बाहर से अवैध निर्माण गिरा दिया है। आपको यह खबर अच्छी लगे या बुरी, मामला टक्कर देने का है।
देशबन्धु की लीड का शीर्षक है – जंतर मंतर पर पुलिस एक्शन की जांच करेगी पांच सदस्यीय समिति। इसके बराबर में दूसरी खबर का शीर्षक है, हाईकोर्ट ने जेपीएससी नियुक्तियां रद्द करने के आदेश पर रोक लगाई। दोनों खबरें आज कई अखबारों में हैं और बताती हैं कि दिल्ली की पुलिसिया बर्बरता सुप्रीम कोर्ट की ‘जांच’ के आदेश से ठंडे बस्ते मेंल चली जाएगी तो रांची में गैर भाजपा सरकार के खिलाफ छात्रों को मिली ‘कामयाबी’ पर अदालती स्टे लग गया है। आज देशबन्धु का बॉटम है, लद्दाख में फिर आंदोलन का बिगुल बजाने की तैयारी। इसके साथ एक खबर है, लद्दाख में स्थापित होगी जम्मू व कश्मीर हाईकोर्ट की एक पीठ।
जाहिर है, यह अनुच्छेद 370 हटाने के बाद का मामला है। आप जानते हैं कि तभी जम्मू कश्मीर राज्य को बांट कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था। उसके बाद से ही राज्य का दर्जा देने की मांग चलती रही है। आंदोलन से कोई फायदा नहीं हुआ और अब फिर तैयारी है जबकि भाजपा सत्ता में नहीं थी तो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात करती थी। अब उपराज्यपाल के जरिए शासन कर रही है। यह हाल कश्मीर के दो हिस्सों का है। भाजपा ने 1937 में निपटा दिए गए वंदेमातरम के मामले को अब फिर से उभारा है।
आज द हिन्दू की लीड के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि नए कोड के तहत 1978 की ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा अमान्य होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड के तहत इसकी व्याख्या इसके ‘अपने टेक्स्ट और संदर्भ’ के आधार पर की जाएगी; 1978 के फैसले ने कर्मचारियों को नियोक्ताओं के अनुचित व्यवहार के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाने का अधिकार दिया था।
यही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज लिखा है, जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में, पेपर लीक को लेकर गुस्से के साथ-साथ चार साल के अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUP) से भी काफी निराशा थी। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (राष्ट्रीय शिक्षा नीति या एनईपी) के तहत बैचलर प्रोग्राम से इस साल ग्रेजुएट होने वाले देश के पहले और मुख्य रूप से दिल्ली यूनिवर्सिटी के बैच के पास निराश महसूस करने की कई वजहें हैं। उदाहरण के लिए, सेंट स्टीफंस कॉलेज में एडमिशन मिलने के बाद साक्षी राव अपने कॉलेज जीवन की इससे बेहतर शुरुआत की उम्मीद नहीं कर सकती थीं। चार साल बाद, उन्हें कॉलेज छोड़ने पर पछतावा और नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। उनका कहना है कि उन्हें पूरे चार साल के प्रोग्राम को चुनने का पछतावा है। नुकसान यह हो सकता है कि उनका एक साल बर्बाद हो जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि ग्रेजुएट होने वाला बैच असल में एक अनिश्चित स्थिति में जा रहा है। दरअसल आगे के लिए कोई योजना या उम्मीद नहीं है। कौशल विकास योजना का प्रचार था लेकिन उसमें भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायतों की सीएजी की रिपोर्ट के बाद कुछ नहीं होना चाहिए था।
जब तमाम आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, डेटा लीक होने या बेच या बांट दिए जाने की आशंका है, सुरक्षित नहीं रखे जाने के आरोप हैं तब इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जो डेटा के प्रति सरकार की चिन्ता बताती है। इस खबर के अनुसार, गेट वाली कुछ आवासीय सोसायटियों में सर्वे करने वाले कर्मचारियों को घुसने की इजाज़त न मिलने के कारण, सांख्यिकी मंत्रालय ‘डायरी-आधारित डेटा कलेक्शन’ की योजना बना रहा है। आरडब्ल्यूए के अड़ंगा लगाने पर, सरकार ज़्यादा आय वाले परिवारों को अपने खर्च का डेटा खुद तैयार करने की इजाज़त दे सकती है। दो साल पहले, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय और कुछ रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन के बीच टकराव हुआ था। आरडब्ल्यूए का मानना था कि सरकार के सर्वे में मुश्किल सवाल पूछे जाते हैं और निजी जानकारी मांगी जाती है। दूसरी ओर मंत्रालय को गेटेड सोसायटियों में रहने वाले ज़्यादा आय वाले परिवारों की तरफ से कोई जवाब न मिलने की चिंता थी।
आप जानते हैं कि सरकार (और सुप्रीम कोर्ट को भी) को लाखों लोगों के मताधिकार की चिन्ता नहीं है। जनगणना समय पर नहीं हो पाया तो अब चल रहा है। उसमें मणिपुर की मांग की चिन्ता (या उससे संबंधित खबर) नहीं है लेकिन सर्वेक्षण में इस विशेष वर्ग को शामिल करने की चिन्ता है। मुझे लगता है कि इनसे खर्च और कमाई के बेहतर आंकड़े मिलने की उम्मीद इसका कारण हो सकती है। इन आंकड़ों से और चाहे कुछ हो या नहीं, औसत बेहतर करने में मदद जरूर मिलेगी। शायद इसीलिए, अब, मंत्रालय इन परिवारों को अपना डेटा खुद तैयार करने की इजाज़त देने पर विचार कर रहा है। ‘घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण’ का अगला दौर 2027 के मध्य में शुरू होने और लगभग एक साल तक चलने की उम्मीद है। ऐसे में, मंत्रालय गेटेड सोसायटियों में रहने वाले ज़्यादा आय वाले परिवारों के लिए फील्ड अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर सर्वे करने के बजाय “डायरी-आधारित डेटा कलेक्शन” अपनाने पर विचार कर रहा है।
द हिन्दू की खबर के अनुसार, सरकार ने भी बीसीआई के मनन मिश्रा जैसी एक कार्रवाई की है। खबर है कि, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में डेटा सेंटर प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए प्रस्ताव मांगने वाली ईओआई (रुचि की अभिव्यक्ति) वापस ले ली गई है। इस प्रोजेक्ट के लिए लिटिल अंडमान और ग्रेट निकोबार द्वीप के आस-पास के समुद्री इलाकों की पहचान की गई थी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब ‘द हिंदू’ ने रिपोर्ट दी थी कि ग्रेट निकोबार द्वीप पर रहने वाले स्थानीय निकोबारी लोगों को द्वीप के आस-पास के समुद्री इलाकों में डेटा सेंटर बनाने की किसी भी योजना के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। वहां के निवासी पहले से ही 91,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं।
हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड के अनुसार, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में चेन्नई के पास मल्लापुरम में 31वीं दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक हुई। इस बैठक को संबोधित करते हुए, श्री शाह ने कहा कि अपने राज्य के हितों की रक्षा करना गलत नहीं है, लेकिन अगर इससे दूसरे राज्यों को सालों तक पानी से वंचित रहना पड़े, तो इससे कोई वास्तविक हित नहीं सधता। लेकिन मुद्दा दक्षिण भारत के राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक का है। इसका अपना महत्व है। इसमें परिसीमन पर भी बात हुई।
द टेलीग्राफ की आज की लीड का शीर्षक है, ‘कॉक्रोच’ की तलाश ‘जादवपुर’ विश्वविद्यालय में सर्जिकल स्ट्राइक से खत्म हुई। खबर के अनुसार, आरएसएस की छात्र शाखा एबीवीपी के समर्थकों ने कल दो बार जादवपुर विश्वविद्यालय में धावा बोला। कुछ घंटों के अंतराल पर की गई इस कार्रवाई कोकैम्पस को कॉक्रोच से छुटकारा दिलाने के लिए किए गए सर्जिकल स्ट्राइक का नाम दिया गया था। दि एशियन एज में मेघालय के आंदोलन की खबर है। इसके अनुसार, खासी छात्रों की रेली हिंसक हो गई और असम तक फैल गई। ऐसी हालत में अमित शाह ने कहा है कि कांग्रेस भारत के बंटवारे का आधार तैयार कर रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा की राजनीति अखबारों और सोशल मीडिया के बनाए नैरेटिव से ही चलती रही है और अब नैरेटिव एकतरफा नहीं बन रहा है। देखा जाए आगे क्या होता है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


