राकेश कायस्थ-
अमृत काल का 22 हज़ार करोड़ रुपये वाला हेयरकट
दुनिया के सबसे बड़े शाहखर्च अपनी हजामत में ज्यादा से ज्याद कितना खर्च करते होंगे? अनुमान लगाकर थक गये हों अपने न्यू इंडिया की तरफ देखिये। आपको गर्व करना ही पड़ेगा। कॉरपोरेट इंडिया के दिग्गज ‘हेयर कट’ के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। ज़ी समूह के मालिक सुभाष चंद्र गोयल के हेयर कट का बिल आया, मात्र बाइस हज़ार और छह करोड़ रुपये।
खुशखबरी ये है कि इस बिल में बड़े दिल वाले गोयल साहब छह करोड़ रुपये का भुगतान अपनी जेब से करेंगे। बाकी के बाइस हज़ार करोड़ रुपये इस देश की महान जनता चुकाएगी। क्या अब भी आपको अपने भारतीय होने पर गर्व नहीं हो रहा है?
जो लोग चकरा रहे हैं, उनके लिए पूरी कहानी थोड़ी आसान भाषा में। ‘हेयर कट’ एक तरह लीगल टर्म है। जब कोई बड़ा उद्योगपति अरबों रुपये का कर्ज ले और दायें-बायें करके पूरे पैसे कहीं और उड़ा दे तो इस देश की महान न्याय व्यवस्था एक सुरक्षित छतरी देती है। इसे IBC यानी इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड कहते हैं। तकनीकी भाषा में IBC कोड की शरण में जाने वाले आदमी को दिवालिया कहते हैं लेकिन असल में ये ‘येड़ा बनकर पेड़ा खाने’ का सबसे सुंदर और सुरक्षित कानूनी रास्ता है।
इसके बाद मामला NCLT नाम की संस्था के पास जाता है, जहाँ विधि विधान से पूरी प्रक्रिया चलाने के बाद पंच परमेश्वर ने मान लेते हैं कि जो अरबों या खरबों का कर्ज अमुक उद्योगपति को दिया गया था वो अब लड्डू हो चुका है। उद्योगपति ने देशसेवा में खुद को होम कर दिया है, अब उसके पास लौटाने के लिए फूटी कौड़ी तक नहीं है। इसलिए भलाई इसी में है कि बैक और तमाम वित्तीय संस्थान ‘हेयर कट’ एक्सेप्ट कर लें। जो बाल सफाचट हो गये उसके बारे में ना सोचे जो दो-चार बच गये हैं, उसी से संतोष करें।
सुभाष चंद्रा मामले में 22 हज़ार और छह करोड़ में 22 हज़ार करोड़ रुपये सफाचट हो गये। अकेले LIC को हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और अब उसे मिलेंगे मात्र 87 लाख रुपये। एलआईसी का जो पैसा डूबा वो किसका था? उसी जनता का जो अपना पेट काट-काटकर हर साल इस उम्मीद में प्रीमियम भरती है कि उसके मूलधन में बोनस जोड़कर एक दिन LIC सारा पैसा लौटा देगा। जब देशहित में इतने हेयर कट लिये जाएंगे तो फिर जनता को लौटाने के लिए क्या बचेगा? LIC पर दबाव डालकर गौतम अडानी की कंपनियों में निवेश करवाने की खबरें तो आपने सुनी ही होंगी।
मान लीजिये जिस तरह की कारगुजारी सुभाष चंद्रा ने की उससे अगर कोई बैंक दिवालिया होने के कगार पर आ जाये तो किसका पैसा डूबेगा? ज़ाहिर जनता का। अगर डूबते हुए बैंक को संभालने के लिए सरकार उसके में अतिरिक्त फंड डालेगी तो वो पैसा किसका होगा, ज़ाहिर वो भी पब्लिक मनी होगी। अपनी माली हालत सुधारने के लिए बैंक तरह-तरह का ट्रांजैक्शन टैक्स लगाएंगे और जनता की हजामत एक बार फिर नये सिरे बनेगी। क्रोनी कैपिटल इंडिया में संस्थागत लूट का ये जो दुष्चक्र है, वो कभी खत्म नहीं हो सकता।
इरफान खान की फिल्म मदारी का एक डायलॉग है, जिसमें सिर पर मौत मंडराता देखकर एक भ्रष्ट राजनेता स्वीकार करता है “ये सच नहीं है कि सरकार में करप्शन है। सच तो ये है कि सरकार ही करप्शन के लिए है।“ सच ये है कि भारत क्रोनी कैपिटल्जिम का ग्लोबल हेडक्वार्टर बन चुका है। नेता, बिजनेस मैन, अदालत और अफसर ये चौकड़ी मिलकर रात-दिन दोनों हाथों से लूट रही है।
डूब चुकी कंपनियों के उद्धार के नाम पर बनाई गई संस्था NCLT असल में इस करप्शन का न्यूक्लियस है। NCLT क्रोनी कॉकस के लिए वही भूमिका निभा रही है, जो प्रवर्तन निदेशालय निभा रहा है। ज्यादा वक्त नहीं बीता जब एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय पर इल्जाम लगा था कि उन्होंने ICICI बैंक को ब्याज का नुकसान पहुंचाया है।
ये मामला पूरी तरह एनडीटीवी और आईसीआईसीआई नाम वाली तो प्राइवेट कंपनियों के बीच का था और समझौते के बाद प्रणव राय की कंपनी ने पूरी बकाया राशि चुका दी थी। इसके बावजूद सरकार ने कनपटी पर बंदूक रखकर प्रणय राय को बाध्य किया कि वो अपनी कंपनी गौतम अडानी को बेचें।
जेपी एसोएट्स के मामले में NCLT में सबसे बड़ी बिडर अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता थी लेकिन यहां भी सौदा गौतम अडानी के पक्ष में हुआ। इस प्रकरण में कोर्ट ने जो किया उसे देख लेना ही काफी है, अलग से टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है।
NCLT की कारगुजारियों पर लिखूंगा तो बात जरूरत से ज्यादा लंबी हो जाएगी। फिलहाल तो आप अमृत काल का जश्न मनाइये और अगले हेयर कट के लिए तैयार हो जाइये। आप चाहें तो अमेरिका से पूछ सकते हैं– हम लाखों करोड़ रुपये के हेयर कट बिल हँसते-हँसते भर देते हैं, तू हमारे सामने क्या है बे?
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