रांची: झारखंड की राजधानी रांची में पत्रकारों के सरकारी संस्थानों में प्रवेश को लेकर नई पाबंदियों ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है। मुख्य सचिवालय प्रोजेक्ट भवन में पत्रकारों के स्वतंत्र प्रवेश पर रोक लगाए जाने के बाद अब रिम्स और सदर अस्पताल जैसे सरकारी संस्थानों में भी बिना अनुमति मीडिया कर्मियों की एंट्री पर सख्ती बढ़ा दी गई है।
पत्रकार संगठनों का कहना है कि इन प्रतिबंधों से समाचार संकलन और रिपोर्टिंग के काम में व्यावहारिक दिक्कतें पैदा हो रही हैं। वहीं, भाजपा ने सरकार पर मीडिया की स्वतंत्रता को प्रभावित करने का आरोप लगाया है।
प्रोजेक्ट भवन में पहले अनुमति लेना जरूरी
जानकारी के मुताबिक, झारखंड सरकार के मुख्य सचिवालय प्रोजेक्ट भवन में पत्रकारों के प्रवेश के लिए नए नियम लागू किए गए हैं। अब किसी पत्रकार को भवन के भीतर जाने से पहले संबंधित अधिकारी या कर्मचारी से फोन पर अनुमति लेनी होगी।
पत्रकारों का कहना है कि पहले की तुलना में प्रवेश व्यवस्था अधिक सख्त हो गई है। इससे सरकारी विभागों से जुड़ी खबरों के लिए मौके पर पहुंचकर जानकारी जुटाने में परेशानी हो रही है।
झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन समेत पत्रकार संगठनों ने भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पत्रकारों के कामकाज के लिए सरकारी कार्यालयों तक उचित पहुंच जरूरी है।
रिम्स और सदर अस्पताल में भी बढ़ी सख्ती
प्रोजेक्ट भवन के बाद रांची के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में भी मीडिया की एंट्री को लेकर पाबंदियां बढ़ाई गई हैं। राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) और सदर अस्पताल में पत्रकारों के बिना अनुमति प्रवेश को लेकर सख्ती की बात सामने आई है।
इन संस्थानों में रिपोर्टिंग के लिए पहुंचने वाले पत्रकारों को अब पहले संबंधित अधिकारियों से अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। इस व्यवस्था को लेकर मीडिया संगठनों का कहना है कि अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से जुड़ी खबरों की स्वतंत्र रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
बाबूलाल मरांडी ने सरकार को घेरा
इस मुद्दे पर झारखंड भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल मरांडी ने सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने पत्रकारों के प्रवेश पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक बताया है।
मरांडी ने सवाल उठाया कि अगर सार्वजनिक संस्थानों में कैमरों और पत्रकारों की मौजूदगी से सरकार या प्रशासन असहज हो रहा है तो इसके पीछे की वास्तविक वजह क्या है।
उन्होंने कहा कि मीडिया की भूमिका सरकार और प्रशासन के कामकाज को जनता तक पहुंचाने की है और पत्रकारों के काम में अनावश्यक बाधाएं खड़ी करना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर बढ़ी बहस
रांची में एक के बाद एक सरकारी संस्थानों में पत्रकारों की एंट्री को लेकर सख्ती किए जाने के बाद मीडिया की स्वतंत्रता और सूचना तक पहुंच के अधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है।
पत्रकार संगठनों का कहना है कि सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर ऐसी पाबंदियां नहीं लगनी चाहिए, जिनसे पत्रकारों के सामान्य समाचार संकलन के काम पर असर पड़े।
अब इस पूरे मामले में सरकार और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पत्रकार संगठनों की आपत्तियों के बाद प्रवेश संबंधी व्यवस्था में कोई बदलाव किया जाता है या नहीं।
शशि सिंह-
रांची के प्रोजेक्ट भवन में पत्रकारों के प्रवेश को लेकर उठे सवाल को केवल सुरक्षा या प्रशासनिक व्यवस्था का मामला मान लेना आसान है। लेकिन बात उससे थोड़ी बड़ी है।
सवाल यह नहीं है कि पत्रकारों को सरकारी भवनों में कोई विशेषाधिकार मिलना चाहिए। बिल्कुल नहीं। सुरक्षा जरूरी है, संवेदनशील स्थानों के अपने नियम होने चाहिए और हर कमरे में पत्रकारों की आवाजाही उचित नहीं हो सकती।
लेकिन सवाल यह है कि जिस सरकार को पत्रकार रोज रिपोर्ट करता है, उसके मुख्यालय तक उसकी स्वतंत्र और सहज पहुंच कितनी होनी चाहिए?
एक समय सचिवालय पत्रकारिता की महत्वपूर्ण बीट हुआ करता था। आज भी है। पत्रकार रोज वहां जाते थे। अधिकारी उन्हें जानते थे, मंत्री उन्हें पहचानते थे। खबर केवल प्रेस रिलीज से नहीं बनती थी। किसी अधिकारी से हुई बातचीत, किसी मंत्री के कमरे के बाहर की हलचल, किसी बैठक में अचानक बढ़ी सक्रियता या गलियारे में मिली छोटी-सी सूचना कई बार बड़ी खबर का संकेत बन जाती थी।
यानी पत्रकार सरकार की केवल कही हुई बात नहीं सुनता था, वह सरकार को काम करते हुए देखता था। आज डिजिटल दौर है। सरकारी वेबसाइटें हैं, सोशल मीडिया है, प्रेस रिलीज मोबाइल पर आती है। लेकिन सरकारी सूचना और स्वतंत्र पत्रकारिता एक चीज नहीं हैं।
सरकार बताती है कि वह क्या कर रही है। पत्रकार को यह जानना होता है कि वास्तव में क्या हो रहा है। इसलिए प्रोजेक्ट भवन का मामला महत्वपूर्ण है।
अगर सुरक्षा के कारण प्रवेश व्यवस्था बदली गई है तो सरकार को साफ बताना चाहिए कि क्या बदला, क्यों बदला और नियम किस पर लागू हैं। यह बात ठीक कि मोबाइल हाथ में लिया हर इंसान पत्रकार नहीं हो सकता लेकिन सरकार जिन संस्थानों को विज्ञापन देती, जिनके रिपोर्टरों को पत्रकार मानती है, जिन स्वतन्त्र पत्रकारों को एक्रेडिशन दिया हुआ है, क्या उनके लिए कोई व्यवस्था है? क्या संवेदनशील हिस्सों को छोड़कर सामान्य रिपोर्टिंग के लिए रास्ता खुला है? क्या कोई लिखित आदेश है? पत्रकार संगठनों से, संस्थानों से इस बारे कोई विमर्श हुआ है? इस मामले में स्पष्टता ज़रूरी है।
सुरक्षा की जरूरत अपनी जगह है। लेकिन ऐसी व्यवस्था भी सवाल खड़े करेगी जिसमें सरकार को रिपोर्ट करने वाले पत्रकार की प्रवेश-व्यवस्था उसी सरकार के अधिकारियों की अनुमति पर निर्भर हो जाए।
पत्रकारों को सरकार के हर कमरे की चाबी नहीं चाहिए, उन्हें सरकार तक पहुंचने का एक स्पष्ट, निष्पक्ष और स्वतंत्र रास्ता जरूर चाहिए।
क्योंकि अंततः सवाल पत्रकार का नहीं है। सवाल यह है कि जनता अपनी सरकार को कितनी दूर से देख सकती है।


