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सेना की नौकरी छोड़ जिस अखबार में सिक्योरिटी ऑफिसर बने, उसी के संपादक बनकर रिटायर हुए कैप्टन सुंदर चंद ठाकुर!

कैप्टन सुंदर चंद ठाकुर की कहानी इसलिए उल्लेखनीय है कि उन्होंने सिर्फ नौकरी नहीं बदलीं, बल्कि एक ही संस्थान के भीतर अपनी भूमिका को लगातार बदला—सुरक्षा की जिम्मेदारी से लेकर खबरों की जिम्मेदारी तक और अंततः पूरे अखबार की संपादकीय जिम्मेदारी तक।

Celebration cake with yellow piped border saying 'Happy Farewell' to Captain Sahab, featuring a cartoon runner and floral decorations.
Man in a vest and glasses sits at a desk typing on a laptop in a colorful office.
Two men in an office: a seated doctor wearing a light shirt with a stethoscope, and a standing colleague in a dark vest smiling beside him.
संपादक की कुर्सी अब तुम्हारे हवाले ललित वर्मा और सुन्दर चंद ठाकुर

यशवन्त सिंह-

1997 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में शुरू की थी दूसरी पारी, 2003 में नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग में पहुंचे; 2010 से संभाली NBT मुंबई की कमान

मुंबई। किसी अखबार के संपादक बनने से पहले उसी मीडिया संस्थान में सुरक्षा अधिकारी के रूप में काम करना और फिर कुछ वर्षों बाद उसी संस्थान के अखबार की संपादकीय कमान संभालना अपने आप में असाधारण करियर यात्रा है। नवभारत टाइम्स, मुंबई के रेजिडेंट एडिटर कैप्टन सुंदर चंद ठाकुर की कहानी ऐसी ही है। भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में करीब पांच साल सेवा देने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ी, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में काम शुरू किया और छह साल बाद उसी समूह के नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग में पहुंच गए। आखिरकार वे उसी अखबार के रेजिडेंट एडिटर बने, जहां से 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त हुए।

कैप्टन सुंदर चंद ठाकुर की पहली पारी भारतीय सेना से शुरू हुई थी। वे 1992 में भारतीय सेना में कमीशंड ऑफिसर के रूप में शामिल हुए थे। साहित्य और पत्रकारिता की ओर उनका आकर्षण हालांकि सेना में जाने के बाद भी बना रहा। किशोरावस्था से ही उन्हें पत्रकार बनने का शौक था और करीब पांच साल बाद उन्होंने सेना छोड़कर लेखन की राह चुनी।

सेना छोड़ने का फैसला आसान नहीं था। ठाकुर ने स्वयं एक सोशल मीडिया पोस्ट में बताया है कि उन्होंने 30 अप्रैल 1997 को भारतीय सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उनके सामने कोई स्पष्ट करियर रोडमैप नहीं था, लेकिन लेखक और पत्रकार बनने की इच्छा इतनी मजबूत थी कि उन्होंने सेना की सुरक्षित नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया। इसके बाद 27 मई 1997 को उन्हें नई नौकरी मिल गई।

और यहीं से उनकी कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय शुरू होता है। सेना से निकलने के बाद ठाकुर ने टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में नौकरी शुरू की। उनके अपने हालिया बयान के अनुसार, वहां उन्होंने करीब छह साल काम किया। यानी जिस मीडिया समूह में बाद में उन्होंने पत्रकार और संपादक के रूप में पहचान बनाई, उसमें उनकी एंट्री संपादकीय विभाग से नहीं बल्कि सुरक्षा विभाग से हुई थी।

ठाकुर ने बताया है कि सेना से निकलने के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में उनकी नौकरी 27 मई 1997 से शुरू हुई थी। दिलचस्प बात यह भी है कि इस नौकरी में उन्हें सेना की नौकरी से करीब दो हजार रुपये अधिक वेतन मिल रहा था। लेकिन उनका लक्ष्य सिक्योरिटी की नौकरी में टिके रहना नहीं था। उनका सपना पत्रकार बनने का था।

करीब छह साल तक सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में काम करने के बाद 2003 में वह मौका आया जिसका उन्हें इंतजार था। ठाकुर का चयन नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग में जूनियर असिस्टेंट एडिटर के रूप में हुआ। इस तरह टाइम्स समूह में उनकी दूसरी पारी सुरक्षा अधिकारी के तौर पर शुरू हुई थी, लेकिन उसी समूह के नवभारत टाइम्स में उनकी पहचान पत्रकार के रूप में बनने लगी।

पत्रकारिता में आने के बाद ठाकुर ने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वह स्पेशल इन्वेस्टिगेशन डेस्क के इंचार्ज रहे और बाद में खेल पेज के संपादक की जिम्मेदारी भी संभाली। उनके करियर की एक उल्लेखनीय घटना तत्कालीन विदेश मंत्री के. नटवर सिंह के साथ पाकिस्तान यात्रा भी रही। वह चार दिनों की इस यात्रा में उनके साथ गए थे।

उनकी साहित्यिक पहचान भी पत्रकारिता के समानांतर बनी रही। सुंदर चंद ठाकुर विज्ञान में स्नातक हैं और कवि, लेखक तथा पत्रकार के रूप में भी सक्रिय रहे हैं। हिन्दवी के प्रोफाइल के मुताबिक उनका जन्म 11 अगस्त 1968 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में हुआ। सेना में सेवा के दौरान वे संयुक्त राष्ट्र की सोमालिया शांति सेना का हिस्सा भी रहे। साहित्य में उनका पहला कविता संग्रह ‘किसी रंग की छाया’ प्रकाशित हुआ।

पत्रकारिता में आगे बढ़ते हुए ठाकुर को 2010 में दिल्ली नवभारत टाइम्स से मुंबई नवभारत टाइम्स भेजा गया। उन्हें मुंबई संस्करण की स्थानीय संपादकीय जिम्मेदारी दी गई। बाद में वे रेजिडेंट एडिटर बने और करीब 16 वर्षों तक मुंबई में अखबार की संपादकीय कमान संभाली।

जनवरी 2011 में भड़ास4मीडिया ने भी रिपोर्ट किया था कि शचींद्र त्रिपाठी के सेवानिवृत्त होने के बाद सुंदर चंद ठाकुर को नवभारत टाइम्स मुंबई का संपादक बनाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले वह छह महीने से अधिक समय तक संपादकीय विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और ‘एडिटर इन वेटिंग’ की भूमिका में थे। संपादक बनने के बाद उन्होंने खबरों से लेकर लेआउट तक में बदलाव किए थे।

अब 31 अगस्त 2026 को उनकी NBT मुंबई की करीब 16 वर्ष लंबी पारी भी समाप्त हो गई। कैप्टन सुंदर चंद ठाकुर रेजिडेंट एडिटर के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और अब जीवन की चौथी पारी की तैयारी में हैं। उनके स्थान पर ललित वर्मा को मुंबई संस्करण की संपादकीय जिम्मेदारी सौंपी गई है।

ठाकुर ने अपनी विदाई के मौके पर अपने करियर को तीन पारियों में बांटकर बताया—पहली पारी भारतीय सेना में देश सेवा की, दूसरी टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में सिक्योरिटी ऑफिसर की और तीसरी नवभारत टाइम्स में पत्रकारिता तथा नेतृत्व की। अब वह चौथी पारी शुरू करने जा रहे हैं।

उनकी यात्रा का सबसे रोचक पहलू यही है कि जिस व्यक्ति ने 1997 में टाइम्स समूह के दरवाजे पर सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में दस्तक दी थी, उसी व्यक्ति ने कुछ वर्षों बाद उसी समूह के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स की संपादकीय कमान संभाली और करीब 16 वर्ष तक मुंबई संस्करण का नेतृत्व किया।

एक सैनिक से सिक्योरिटी ऑफिसर, सिक्योरिटी ऑफिसर से पत्रकार और पत्रकार से संपादक तक का यह सफर इस मायने में भी अलग है कि ठाकुर ने पत्रकारिता की कोई औपचारिक पढ़ाई नहीं की। उन्होंने अपने लेखन, साहित्यिक रुचि और संपादकीय काम के दम पर यह मुकाम हासिल किया। उनके अपने शब्दों में, सेना ने उन्हें अनुशासन दिया, पत्रकारिता ने दृष्टिकोण और लेखन ने उन्हें अभिव्यक्ति का रास्ता दिया।

अब जब वह नवभारत टाइम्स से विदा हो चुके हैं, उनकी कहानी का अगला अध्याय भी कम दिलचस्प नहीं होगा। उन्होंने संकेत दिया है कि आगे वह कंटेंट क्रिएशन, लेखन, कविता, कहानी और युवाओं के मानसिक-सामाजिक सशक्तीकरण जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहना चाहते हैं।

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