दीपिका सरला शर्मा-
मास्टर डिग्री ली और 2011 में पहली नौकरी लगी NBT अखबार में (ऐसा मुझे लगा था). खुशी का ठिकाना नहीं था, भोपाल से दिल्ली आ गई और 3 दिन के इंडक्श्न के बाद पता चला कि NBT नहीं, नौकरी तो सांध्य टाइम्स के लिए करनी है. दिमाग ठनका, लगा ये क्या धोखा हो गया. जॉइनिंग के टाइम तो बताय ही नहीं. अनमने मन से सांध्य टाइम्स में पहले दिन पहुंची और यकीन मानिए अनमने मन से लेकर मन लगने तक बस एक ही दिन लगा.
‘सांध्य टाइम्स’, टाइम्स ग्रुप का इवनिंगर अखबार है. इसके चाहने वाले आपको पुरानी दिल्ली की गलियों और बाजारों में मिल जाएंगे. जनपथ, या पालिका बाजार से लेकर बल्लीमारान से दरीबे तलक… दुकान के गल्ले पर बैठे हर सेठ या कर्मचारी के लिए सांन्ध्य टाइम्स शाम की चाय की तहर एक जरूरी आदत था. हां, था… क्योंकि सांध्यटाइम्स अब बंद हो गया.

आजतक में इंटरनशिप के दौरान दोस्त बने Shariqul Hoda ने मैसेज भेजा, जिसमें बस एक लिंक था और हेडलाइन थी ‘टाइम्स ग्रुप का ‘सांध्य टाइम्स’ अखबार आज शाम आखिरी बार छपा! हालांकि 2016 में मैंने टाइम्स ग्रपु को छोड़ दिया लेकिन सांध्य टाइम्स मेरी पहली वो नौकरी थी, जिसने मुझे आजादी के पंख दिए और आगे की मीडिया जर्नी के लिए तैयार किया. Amit Mishra Deeip Gambhir और Apoorva Agrawal जैसे शानदार दोस्त बने, जो आज भी अपने से हैं. Veerendra Verma सर Lalit Vats सर, सुषमा जगमोहन मैम और Lalit Sohan सर जैसे ऐसे मैंटोर मिले जिहोंने हम नए-नए लोगों को हर काम के लिए तैयार कर दिया. Lalit Sohan सर के साथ काम करना तो किसी मास्टर क्लास को जॉइन करने जैसा था. रिपोर्टिंग कर के आओ, अपनी खबर फाइल करो और फाइल होते ही तुरंत या तो पेज बनाने लग जाओ या प्रूफ रीडिंग में फटाफटा 12 बजे तक एडिशन छूट जाना चाहिए बस, चाहे कुछ भी हो.
सांध्य टाइम्स खास था. बहुत खास. 17 दिसंबर को सांध्य टाइम्स की वर्षगांठ होती है. मैं उसदिन ऑफिस में ही थी और हमारे क्राइम रिपोर्टर पुष्पेंद्र सर (Pushpinder Chauhan) ने सुबह की मीटिंग में खबर बताई, चलती बस में एक लड़की का रेप हुआ है. 17 तारीख की शाम तक, जब बाकी लोग इस खबर के पकने का इंतजार कर रहे थे, सांध्य टाइम्स ने सबसे पहले दोपहर 12 बजे ही इस खबर का सच लोगों तक पहुंचा दिया था.
निर्भया केस हो या फिर अन्ना हजारे का रामलीला मैदान का आंदोलन, दिल्ली की एकलौती MCD के इलेक्शन हों या फिर इलेक्शन के बाद उसके 3 हिस्सों में बंटने का एतिहासिक पल, सांध्य टाइम्स में रहते हुए मैंने सबकुछ कवर किया था. तुमने मुझे बहुत कुछ सिखाया और शायद तुम्हें अलविदा कहना इसलिए इतना आसान नहीं है. फिर भी रस्म अदाएगी तो करनी होगी.
अलविदा ‘सांध्यटाइम्स’ !


