Connect with us

Hi, what are you looking for?

उत्तर प्रदेश

क्‍या राजनीति में भी झंडे गाड़ पायेंगी पूर्व IAS दिव्‍या मित्‍तल?

अनिल सिंह-

उत्‍तर प्रदेश कैडर की आईएएस अफसर रहीं दिव्‍या मित्‍तल इस्‍तीफा देने के बाद राजनीति में हाथ आजमाने का फैसला किया है। दिव्‍या मित्‍तल ना तो पहली प्रशासनिक अधिकारी हैं, और ना ही आखिरी होंगी, लेकिन उनके निर्णय के चलते उनकी सफलता को लेकर एक संदेह पैदा होने लगा है। क्‍या सचमुच में वह राजनीति में आकर सब कुछ बदल देंगी? क्‍या अस्‍सी सालों से चले आ रहे सिस्‍टम को वह एक झटके में बदल डालेंगी? सवाल बहुतेरे हैं, लेकिन जवाब स्‍पष्‍ट नहीं है। उन्‍होंने यह भी स्‍पष्‍ट किया है कि वह किसी पार्टी में शामिल नहीं होंगी, अकेले लड़ेगी!

उनके द्वारा जारी वीडियो में उनकी बातें सुनने में बहुत अच्‍छी लगीं। ऐसा लगा जैसे उनके राजनीति में उतरते ही जनता उन्‍हें हाथों हाथ लेकर सब कुछ बदल डालेगी! परंतु जब इन भावी बातों का वास्‍तविक राजनीति से सामना होगा, तब उन्‍हें अपने सपनों और हकीकत का असली सच समझ में आयेगा कि प्रशासनिक दुनिया और राजनीतिक दुनिया में कितना अंतर है? ऐसा नहीं है कि दिव्‍या मित्‍तल से पहले यूपीएससी पास करने वाले अधिकारी राजनीति में सफल नहीं हुये हैं, बल्कि कई अधिकारियों ने राजनीति में झंडे गाड़े हैं, लेकिन अकेले के दम पर नहीं। किसी स्‍थापित पार्टी में शामिल होकर।

एक उदाहरण दे रहा हूं। साल 2004 था। मैं बनारस में नौकरी करता था। चंदौली जिले के मूल निवासी डिप्‍टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने मुलायम सिंह यादव द्वारा माफिया मुख्‍तार अंसारी को बचाने का दबाव डालने पर इस्‍तीफा दे दिया था। वह ऐसा दौर था, जब माफियाओं की तूती बोलती थी, और मुलायम सिंह यादव द्वारा पोषित पल्‍लवित माफिया समानांतर सरकार चला रहे थे। उत्‍तर प्रदेश की राजनीति में अपराधियों को खुलकर सियासत में लाने का श्रेय काफी हद तक मुलायम सिंह यादव को जाता है। वह सत्‍ता हासिल करने के लिये किसी भी स्‍तर तक जाने का तैयार रहते थे।

तब इस्‍तीफा देने के बाद शैलेंद्र सिंह ने राजनीति में हाथ आजमाने का फैसला किया। 2004 के लोकसभा चुनाव चल रहे थे। शैलेंद्र को कांग्रेस और भाजपा दोनों अपने पार्टी में शामिल करके बनारस से टिकट देने को तैयार थे, लेकिन जनता में सहानुभूति एवं समर्थन देखकर शैलेंद्र ने निर्दल लड़ने का फैसला किया, लेकिन वह चुनाव हार गये। वह 28533 वोटों के साथ छठवें स्‍थान पर रह गये। कांग्रेस के राजेश मिश्रा 2 लाख 7 हजार के लगभग वोट पाकर जीते। उसके बाद क्रमश: भाजपा के शंकर प्रसाद जायसवाल, अपना दल के अतहर जमाल लारी, बसपा के अमीरचंद पटेल, सपा की अंजना प्रकाश तथा शैलेंद्र सिंह रहे।

निर्दल हारने के बाद सबक लेते हुए शैलेंद्र सिंह कांग्रेस से जुड़ गये। 2009 का लोकसभा चुनाव चंदौली से लड़े, लेकिन वहां से भी पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में भाजपा में भी शामिल हुए, लेकिन कुछ खास नहीं कर पाये। अब वह अपना व्‍यवसाय कर रहे हैं। दरअसल, शैलेंद्र सिंह ने जनता की सहानुभूति एवं समर्थन को अपना वोट बैंक समझ लिया, जबकि उनके पास ना तो कोई कैडर था और ना ही जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता। उन्‍होंने सहानुभूति और वोट को एक समझने की भूल की, और अंतत: उसका खामियाजा भुगतना पड़ा। 2004 में किसी पार्टी से लड़े होते तो निश्चित जीत जाते।

कोई जरूरी नहीं कि जनता की सहानुभूति वोट में तब्‍दील हो जाये। सहानुभूति के वोट में तब्‍दील ना होने का एक और उदाहरण दे रहा हूं। मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला ने आफस्‍पा कानून के खिलाफ 4 नवंबर 2000 से शुरू हुए मानवाधिकार की लड़ाई को अनशन के जरिये 16 साल तक लड़ा। फिर उन्‍होंने 2017 में राजनीति में उतर कर बदलाव करने का सपना देखा। उनकी प्रजा पार्टी मणिपुर की 60 में से 3 सीटों पर लड़ी। इरोम खुद थोउबाल सीट से विधानसभा चुनाव में उतरीं, लेकिन जनता ने उन्‍हें केवल 90 वोट दिये। इससे आहत शर्मिला ने राजनीति से किनारा कर लिया।

दरअसल, केवल सहानुभूति के जरिये राजनीति में सफलता मिलती तो राजनीति करने वाले बेहद सज्‍जन और ईमानदार होते और राजनीति भी इतनी घटिया और गंदी नहीं होती। दिव्‍या मित्‍तल के बदलाव का सपना देखने से वर्षों पहले 2010 बैच के यूपीएससी टॉपर एवं आईजीएमयूटी कैडर के आईएएस शाह फैजल ने भी प्रशासनिक सेवा से इस्‍तीफा देकर जम्‍मू कश्‍मीर में सियासी बदलाव का सपना देखा। अपनी पार्टी बनाई और चुनाव लड़ा, लेकिन जल्‍द ही उन्‍हें सियासत की जमीनी समझ आ गई और वह राजनीति में असफल होकर, वापस प्रशासनिक सेवा में लौट आये।

शाह फैजल के अलावा उत्‍तर प्रदेश में जबरिया रिटायर किये गये आईपीएस अमितभा ठाकुर ने भी राजनीतिक पार्टी बनाई, लेकिन उन्‍हें भी कोई खास सफलता नहीं मिली। पूर्व आईएएस प्रवीण कुमार ने भी विधानसभा चुनाव लड़ा कोई सफलता नहीं मिली। उत्‍तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी एवं 1980 बैच के आईपीएस सुलखान सिंह ने भी अलग बुंदेलखंड राज्‍य की मांग को लेकर बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी की स्‍थापना की है, लेकिन अभी इस पार्टी की कुछ खास पहचान नहीं है। पार्टी ने अभी कोई चुनाव भी नहीं लड़ा है, लिहाजा अभी कोई आकलन नहीं किया जा सकता है।

ऐसा ही नहीं है कि पुलिस, प्रशासनिक या विदेश सेवा छोड़कर राजनीति करने वाले सब असफल ही रहे, सफल अधिकारियों की एक लंबी लिस्‍ट है, जिन्‍होंने अपनी छाप छोड़ी। परंतु इन लोगों में सबसे बड़ी बात यह रही कि इनमें से ज्‍यादातर ने स्‍थापित पार्टियों के बैनर तले चुनाव लड़कर ऊंचाई हासिल की। विदेश सेवा के मणिशंकर अय्यर, मीरा कुमार, नटवर सिंह, प्रशासनिक सेवा के अजीत जोगी कांग्रेस से जुड़कर खासे सफल रहे। अजीत जोगी तो कांग्रेस के बैनर तले छत्‍तीसगढ़ के पहले सीएम बने। पंजाब कैडर के आईएएस एवं चुनाव आयुक्‍त रहे एमएम गिल भी कांग्रेस में शामिल होकर मंत्री बने।

ऐसे ही, पूर्व आईएएस यशवंत सिन्‍हा ने जनता दल से अपना करियर शुरू किया तथा भाजपा होते हुए टीएमसी में शामिल हुए। यशवंत सिन्‍हा अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे। वर्तमान की मोदी सरकार में विदेश सेवा के हरदीप सिंह पुरी, एस जयशंकर तथा प्रशासनिक सेवा के अश्‍वनी वैष्‍णव केंद्रीय मंत्री हैं। उत्‍तर प्रदेश कैडर के आईपीएस रहे असीम अरुण भी इस्‍तीफा देकर भाजपा से किस्‍मत आजमाई और विधान सभा चुनाव जीत कर योगी सरकार में स्‍वतंत्र प्रभार राज्‍य मंत्री हैं। पूर्व आईएएस आरके सिंह भी आरा से सांसद बनने के बाद मोदी सरकार में मंत्री रहे।

पूर्व आईपीएस बृजलाल भी पुलिस सेवा से रिटायर होने के बाद भाजपा से राज्‍यसभा सांसद हैं। केरल के 1979 बैच के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अल्‍फोंस कन्‍ननथनम 2006 में केरल की कंजिरापल्‍ली विधानसभा सीट से 2006 में निर्दल विधायक बने। बाद में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्‍हें 2017 में पर्यटन राज्‍यमंत्री बनाया गया। बंबई के पुलिस कमिश्‍नर रहे सतपाल सिंह भी भाजपा में शामिल होकर बागपत से दो बार सांसद तथा केंद्र में मंत्री रहे। छत्‍तीसगढ़ कैडर के आईएएस ओपी चौधरी ने भाजपा ज्‍वाइन की तथा वर्तमान में कैबिनेट मंत्री हैं।

आईआरएस अधिकारी अरविंद केजरीवाल जरूर इन सभी अधिकारियों से अलग मुकाम हासिल किया। केजरीवाल ने अपनी खुद की पार्टी बनाई तथा दिल्‍ली और पंजाब में बड़ी सफलता हासिल की। खुद केजरीवाल तीन बार दिल्‍ली के सीएम भी बने। परंतु अरविंद केजरीवाल ने सीधे सीधे पार्टी नहीं बनाई, बल्कि अन्‍ना आंदोलन के जरिये जन लोकपाल को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा किया, जनता में अपनी पहचान बनाई। उसके बाद राजनीति में ना आने की कसम खाते हुए राजनीति में आये, और बहुत जल्‍द सफलता भी हासिल की।

ऐसा भी नहीं है कि जिस भी अधिकारी ने भाजपा या कांग्रेस ज्‍वाइन किया सफल ही रहे। तमिलनाडु कैडर के आईपीएस के अन्‍नामलाई ने नौकरी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए, लेकिन उन्‍हें अ‍पेक्षित सफलता नहीं मिली। वह दो बार चुनाव भी लड़े लेकिन हार का सामना करना पड़ा। अब वह अपनी पार्टी बनाकर राजनीति कर रहे हैं। तमिलनाडु कैडर की ही आईएएस रही वीएस चंद्रलेखा 1992 में सरकार के विरोध में नौकरी छोड़ने के बाद जनता पार्टी से अपनी राजनीति शुरू की, बाद में भाजपा में भी शामिल हुईं, लेकिन दो चुनाव लड़ने के बावजूद सफलता नहीं मिली।

तेलंगाना कैडर के पूर्व आईपीएस आरएस प्रवीण कुमार भी नौकरी छोड़ने के बाद राजनीति में सक्रिय हुए, लेकिन उन्‍हें भी सियासी सफलता नहीं मिली। उन्‍होंने पहले बहुजन समाज पार्टी के सदस्‍य बनकर राजनीति की, लेकिन सफल नहीं होने पर भारत राष्‍ट्र समिति में शामिल हो गये। तमिलनाडू कैडर के आईएएस एवं पूर्व चुनाव आयुक्‍त टीएन शेषन भी कांग्रेस में शामिल होकर राजनीति शुरू की। गांधीनगर से एलके आडवाणी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा, लेकिन उन्‍हें सफलता नहीं मिली। उन्‍होंने केआर नारायणन के खिलाफ राष्‍ट्रपति का चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गये। यूपी के पूर्व मुख्‍य सचिव आलोक रंजन भी सपा से लाइन में हैं।

दरअसल, दिव्‍या मित्‍तल ने जो फैसला लिया है, निश्चित ही वह सराहनीय कहा जा सकता है, लेकिन राजनीतिक तौर पर उनकी सफलता को लेकर अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। दिव्‍या अपनी एकेडिमिक लाइफ में बेहद ब्रिलिंयेंट एवं सफल रही है, लेकिन यह उनके खुद की मेहनत पर निर्भर था, लेकिन राजनीति वोटरों की मंशा पर निर्भर करता है। अतीत के उदाहरण को देखते हुए बिना किसी स्‍थापित पार्टी से जुड़कर राजनीति करना आसान नहीं होगा। अरविंद केजरीवाल को छोड़ दें तो अकेले राजनीति करने वाला कोई यूपीएससी पास सफल नहीं हुआ है।

#तिरछी_कटारी

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन