भोपाल। IBC24 के MP Stringers ग्रुप में प्रोग्रामिंग से जुड़े प्रवीण दुबे के नाम से जारी एक संदेश ने चैनल के स्ट्रिंगर नेटवर्क में चर्चा छेड़ दी है। संदेश में मंदसौर, नीमच, देवास और सीहोर के साथियों से अलविदा लेने की बात कही गई है। कारण बताया गया लगातार काम को लेकर कैजुअल एप्रोच। लेकिन इस एक संदेश के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं।
चार जिलों के स्ट्रिंगर्स को एक साथ अलविदा
ग्रुप में भेजे गए संदेश में लिखा गया कि लगातार काम को लेकर कैजुअल एप्रोच रखने के कारण मंदसौर, नीमच, देवास और सीहोर के साथियों से अलविदा ले ली गई है। इसके साथ ही दूसरे स्ट्रिंगर्स को चेतावनी दी गई कि जिस भी साथी को चैनल का काम सेकेंडरी लगता है, वह संभल जाए। यानी चार जिलों के साथियों को हटाने की सूचना और बाकी स्ट्रिंगर्स के लिए चेतावनी एक ही संदेश में सामने आ गई।
आखिर कैजुअल एप्रोच का पैमाना क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसी स्ट्रिंगर के काम को कैजुअल मानने का पैमाना क्या है? क्या इन चारों जिलों के स्ट्रिंगर्स के काम की अलग-अलग समीक्षा की गई थी? क्या उनकी खबरों की संख्या, गुणवत्ता और कवरेज का रिकॉर्ड देखा गया? क्या उन्हें पहले सुधार का मौका दिया गया? या फिर एक सामान्य टिप्पणी के आधार पर ही चार जिलों के साथियों से नाता तोड़ लिया गया?
₹200 की खबर और लाखों की जिम्मेदारी?
स्ट्रिंगर नेटवर्क से जुड़े लोगों के अनुसार कई जगह एक खबर के लिए मिलने वाला भुगतान करीब ₹200 तक बताया जाता है। ऐसे में सवाल बेहद सीधा है—₹200 की एक खबर करने वाले स्थानीय स्ट्रिंगर से आखिर कितनी और कैसी पूर्णकालिक प्रतिबद्धता की उम्मीद की जा रही है? जिस प्रोग्रामिंग अधिकारी पर स्ट्रिंगर्स के काम की निगरानी और दिशा तय करने की जिम्मेदारी है, उसकी तुलना में जमीनी स्तर के स्ट्रिंगर की आर्थिक स्थिति और काम करने की परिस्थितियां बिल्कुल अलग होती हैं। तो क्या चैनल को स्ट्रिंगर्स से अपेक्षाएं तय करते समय उनके भुगतान और जमीनी खर्चों को भी ध्यान में नहीं रखना चाहिए?
सवालों के घेरे में आदेश
यहां एक और सवाल खड़ा होता है। अगर प्रबंधन स्तर पर जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों को हजारों या लाखों रुपये का वेतन मिलता है और दूसरी तरफ स्थानीय स्ट्रिंगर को एक खबर के लिए करीब ₹200 का भुगतान मिलता है, तो दोनों से एक जैसी कार्य-प्रतिबद्धता की अपेक्षा करना कितना व्यावहारिक है? सवाल प्रवीण दुबे की व्यक्तिगत कमाई का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें भुगतान और अपेक्षाओं के बीच इतना बड़ा अंतर दिखाई देता है।
क्या स्ट्रिंगर को अपना पक्ष रखने का मौका मिला?
किसी पत्रकार के काम में कमी है तो समीक्षा होना गलत नहीं है। लेकिन सवाल प्रक्रिया का है। क्या मंदसौर, नीमच, देवास और सीहोर के संबंधित स्ट्रिंगर्स को बताया गया कि उनके काम में क्या कमी है? क्या उन्हें चेतावनी दी गई? क्या सुधार के लिए समय दिया गया? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका मिला? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी हैं।
एक संदेश ने IBC24 की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए
स्क्रीनशॉट में प्रवीण दुबे के नाम से भेजे गए संदेश के साथ कुछ स्ट्रिंगर्स के नाम के आगे removed भी दिखाई दे रहा है। नीचे यह भी दिखाई देता है कि ग्रुप सदस्य अब संदेश नहीं भेज सकता क्योंकि वह ग्रुप का सदस्य नहीं रहा। इससे यह साफ है कि कार्रवाई केवल मौखिक चेतावनी तक सीमित नहीं थी, बल्कि संबंधित लोगों को ग्रुप से हटाया भी गया।
क्या ऐसे फरमान से IBC24 की साख प्रभावित नहीं होगी?
IBC24 जैसे बड़े न्यूज चैनल की पहचान सिर्फ स्टूडियो में बैठे एंकरों से नहीं बनती। उसकी असली ताकत जिलों और तहसीलों में काम करने वाले स्थानीय पत्रकार भी होते हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या चार जिलों के स्ट्रिंगर्स को एक साथ हटाने और बाकी साथियों को सार्वजनिक ग्रुप में चेतावनी देने का तरीका चैनल की साख को प्रभावित नहीं करता? अगर किसी स्ट्रिंगर का काम खराब है तो कार्रवाई का अधिकार प्रबंधन के पास है। लेकिन कार्रवाई की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और सम्मानजनक है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण सवाल है।
अब जवाब प्रवीण दुबे और IBC24 प्रबंधन को देना है
मामला किसी एक स्ट्रिंगर या चार जिलों तक सीमित नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जिसमें स्थानीय पत्रकार कम भुगतान में चैनल के लिए खबरें जुटाते हैं और बदले में उनसे लगातार काम की अपेक्षा की जाती है। प्रवीण दुबे के नाम से जारी संदेश ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या स्ट्रिंगर्स से अपेक्षाएं तय करने से पहले उनकी परिस्थितियों और मेहनत का मूल्यांकन भी किया जाता है? अब प्रवीण दुबे और IBC24 प्रबंधन की ओर से यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि चार जिलों के स्ट्रिंगर्स को हटाने का विस्तृत आधार क्या था, उनकी समीक्षा किस पैमाने पर हुई और क्या संबंधित पत्रकारों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था।
फरमान जारी करना आसान है, लेकिन जमीनी पत्रकार की मेहनत और उसके सम्मान की कीमत तय करना शायद उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।
स्ट्रिंगर्स का पक्ष-
सिहोर के स्ट्रिंगर कवि छोकर ने भड़ास4मीडिया से हुई बातचीत में कहा कि “प्रबंधन द्वारा इवेंट को लेकर प्रेशर बनाया जा रहा था। विधायकों से चार-पांच लाख रुपया लेकर यह आयोजन होना था, जो कि संभव नहीं था। वह पिछले 10 वर्षों से संस्थान के साथ कार्यरत थे। अब हर साल लाखों रुपया जुटाना मुश्किल हो रहा था। मेरे साथ करीब सात लोगों को हटाया गया है।“
देवास के स्ट्रिंगर मोहनिश वर्मा ने भड़ास को बताया कि, “वह पिछले आठ वर्षों से चैनल के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन जब से प्रवीण दुबे आए हैं रिपोर्टर और स्ट्रिंगर्स की हालत खराब है। मुझे लगता है कि जैसे प्रवीण जी प्रबंधन को मोटा रेवेन्यू जनरेट करने का वचन देकर आए हैं। हम लोगों पर इवेंट कराने के नाम पर लाखों रुपये वसूलने का दबाव लगातार बनाया जा रहा था। आप बताइये न्यूज चैनलों की क्रेडिबिलिटी आज के समय बची ही कितनी है। जो विधायक हैं नेता हैं वह लोग जरूर कभी कभार अपनी छवि चमकाने के लिए कुछ दे दिबाकर आयोजन करा लें, वह अलग बात है। इसी दबाव के चलते मैंने एक महीने पहले ही रिजाइन संबंधी लेटर भी दे रखा था। मैं प्रवीण दुबे के व्यवहार से संतुष्ट नहीं था।“

