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वेब-सिनेमा

यूट्यूब पर भयानक बाढ़ आई है, मानो एक कूड़े का पहाड़ बड़ा होता जा रहा है!

पंकज मिश्रा-

मेनस्ट्रीम मीडिया से उनकी पत्रकारिता के कारण जी उचटा तो youtube पर वहां से निकले पहली दूसरी पायदान के एंकर्स ने अपने चैनल खोले तो उधर शिफ्ट हुआ। लेकिन शुरूआत में यह आकर्षित करता भी था मगर कई सालों से इनसे भी जी उचट गया है।

इतनी monotony, इतनी समरूपता, एक ही खबर पर, लगभग वही चार छः दस चेहरे एक ही तरह की बाते करते …. कभी इस चैनल पे कभी उस चैनल पे, मगर वही कंटेंट…… x के चैनल पर y विशेषज्ञ तो y पे x… कुछेक हैं जिन्हें देख के लगता है कि ट्विटर पर दिन रात स्क्रॉल करते रहते हैं, इधर एक दो ट्वीट देखा नहीं कि उधर चैनल पर 7, 8 मिनट का वीडियो ठेल दिया, दिन में ऐसे बेशुमार वीडियो। अरे भाई व्यूज बटोरना है मगर उसके लिए क्या इतना अत्याचार करोगे।

एक भी चैनल ऐसा नहीं दिखता जो well researched सार गर्भित वीडियो लाये जिससे कुछ तो हासिल हो, भले हफ्ते में एक लाये, कोई तो पैनल ऐसा मिले जिसमें विषय अलग हो लोग नये हों, नजरिया नया हो.. भले महीने में ऐसी दो एक ही चर्चा करें, लेकिन नहीं… ढूंढते रह जाओगे…

गैर पॉलिटिकल कंटेंट तो आकाश कुसुम हो गए हैं, खेल पर बात करेंगे तो बस क्रिकेट….

Youtube पर भयानक बाढ़ आई है, एक कूड़े का पहाड़ बड़ा होता जा रहा है… इस जहन्नुम से दर ए निजात की कोई राह निकलती है क्या?


दिलीप खान-

यूट्यूब के ‘वैकल्पिक’ पत्रकारों की एक अपनी दुनिया है। सब एक-दूसरे की पीठ सहलाते फिरते हैं। एक यूट्यूबर दूसरे के यहां पैनलिस्ट बन जाता है और दूसरा पहले के यहां। आज Pankaj Mishra ने लिखा कि यूट्यूब के इस संसार से उनका मन उचट गया है।

वजह? वजह यह कि कहीं कोई इनसाइट पेश नहीं करता। किसी के पास गहराई नहीं है। कोई मेहनत नहीं करना चाहता। एक ही पैनलिस्ट दिन भर में 8 अलग-अलग मुद्दों पर एक्सपर्ट बन जाता है।

सुबह पश्चिम बंगाल पर बात करेगा, तो शाम इज़रायल पर। दोपहर किसी सरकारी रिपोर्ट पर बात करेगा, तो रात में अंतरिक्ष पर। कहां से तैयारी करेगा? कहां से इनसाइट लाएगा?

इनके पास सिर्फ़ अपडेट हैं। अपडेट भी फ़र्स्ट हैंड नहीं, बल्कि अलग-अलग पोर्टल, अख़बारों, और ट्विटर से निकले हुए अपडेट। उसी अपडेट में चार-दस लाइन आगे-पीछे जोड़कर पैनलिस्ट बन जाते हैं।

जिस विषय की समझ नहीं है, उस पर क्यों करना है शो? क्यों ये अपनी तरह ही मीडियॉकर ऑडियंस बनाना चाहते हैं?

एक हैं पुण्य प्रसून बाजपेयी। उनके चैनल पर दिन में छह बार मोदी का बोरिया-बिस्तर बंधता है। एक हैं अभय कुमार दुबे, वे हफ़्ते में बारह बार दुनिया भर की सरकार पलटवा देते हैं।

इन्हीं में 2-4 डिग्री ऊपर-नीचे कर दीजिए, तो 99% ‘वैकल्पिक’ यूट्यूबर की समझ फ़िट बैठेगी।

पैसा कमाना एक बात है, लेकिन जिस बुनियाद पर ये नंगा नाच करने वाले लेगेसी मीडिया को गरियाते हैं, क्या उस लेगेसी मीडिया की कमी सिर्फ़ मोदी की पक्षधरता ही है? क्या ख़बरों और विश्लेषण को पेश करने का पेशेवर तौर-तरीक़े उसमें शामिल नहीं है?

सरकार के ख़िलाफ़ दिखने वाले कंटेंट के अलावा किस मायने में अलग हैं ये?

एक उदाहरण लीजिए। डिफ़ेंस और जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रवीण साहनी को जब मैं इन चैनलों पर देखता हूं, तो सवाल सुनकर सिर पीट लेता हूं। उसी प्रवीण साहनी को जब मैं नीमा (डायलॉग वर्क्स) या ग्लेन डीज़न या मारियो नावफ़ल या ब्रेकिंग पॉइंट या लेना पेत्रोवा के चैनल पर देखता हूं, तो कुछ इनसाइट मिल पाता है।

इस उदाहण से आप समझ सकते हैं कि एक ही एक्सपर्ट की बात को किस तरह भारतीय यूट्यूबर अपनी काहिली, अपनी कमज़ोरी, और अपनी नासमझी की वजह से मीडियॉकर बना देते हैं और किस तरह अपने विषय की तैयारी करके बैठे दुनिया के बाक़ी यूट्यूबर कुछ ढंग का हासिल कर पाते हैं।

भारत के ज़्यादातर ‘स्टार’ यूट्यूबर दरअसल अधकचरी समझ वाले हैं।

प्रोफ़ेशनलिज़्म क्या होता है, एक कहानी सुनाता हूं। राज्यसभा टीवी के दौर में पहला बड़ा चुनाव 2014 की लोकसभा का था। सरकार यूपीए की थी। ज़ाहिर है ऊपरी मैनेजमेंट भी। चुनाव पर एक अलग बुलेटिन शुरू हुआ। नरेन्द्र मोदी धुआंधार रैली कर रहे थे। मुझे मेरे एक सीनियर से अपने सीनियर के हवाले से कहा कि मोदी के पैकेज में सिर्फ़ एक बाइट लगाओ।

मैं नहीं माना। यह अनप्रोफ़ेशनल था।

बात ऊपर पहुंचते-पहुंचते CEO गुरदीप सर (गुरदीप सिंह सप्पल) तक पहुंची और मुझसे बात यही हुई कि RSTV ने अब तक अपनी साख कमाई है और उस साख को एक चुनाव में मिटने नहीं दिया जाएगा।

उन्होंने मुझे कहा कि जितना वाज़िब लगता है, उतनी बाइट लगाओ। बात ख़तम!

भरोसेमंद संस्थान ऐसे बनता है। उसी RSTV को जब वेकैंया नायडू के दौर में सरकारी भोंपू में तब्दील किया गया, तो वह मर गया। बाद में उसे ख़त्म करना पड़ा।

सब जानते हैं कि गुरदीप तब भी कांग्रेस में थे और आज भी हैं, लेकिन उन्होंने बीजेपी की ख़बर रोकी नहीं और न ही टीवी स्क्रीन पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनवाया। जबकि वे चाहते थे कि कांग्रेस जीते, फिर भी!

इधर, ये यूट्यूबर हर रोज़ कांग्रेस की सरकार बनवाते फिरते हैं!

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