राजू मिश्रा-
वरिष्ठ छायाकार राम बहादुर थापा का आज लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में निधन हो गया। विभिन्न समाचार पत्रों में उन्होंने अपनी दृष्टि का कमाल दिखाया।
अयोध्या में ढांचा ध्वंस की सबसे पहली तस्वीर उन्होंने ली थी, कारसेवकों से बचते-बचाते किसी तरह अपने अखबार के दफ्तर तक फोटो उन्होंने पहुंचाया। उनके गुरु संजीव प्रेमी ने भी दुस्साहसी फोटो खींचते जान गंवाई थी।
धुन के धनी अरबी थापा स्वभाव से बेहद मिलनसार और हर किसी की मदद को सदा तत्पर रहते थे। परमात्मा उन्हें अपने श्रीचरणों में सबसे करीब स्थान प्रदान करें। छोटा फ्रेम, बड़ी तस्वीर। शत-शत नमन।

दुःखद सूचना…वरिष्ठ छायाकर श्री आरबी थापा का निधन हो गया है। उन्होंने डॉ.राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अंतिम सांस ली। बहुत ही जुझारू फोटो जर्नलिस्ट थे थापा जी, वह अयोध्या के बाबरी विध्वन्स मामले के चश्मदीद भी रहे। अंतिम संस्कार आज शाम चार बजे भैंसाकुंड पर होगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि गोलोकवासी आत्मा को सद्गति एवं शोकाकुल परिजन को साहस प्रदान करें। विनम्र श्रद्धांजलि… ओम् शांति
-डॉ अतुल मोहन सिंह
राजीव तिवारी बाबा-
आर.बी. थापा: कैमरे में इतिहास दर्ज करने वाला फोटोग्राफर
लखनऊ की पत्रकारिता ने अपना एक ऐसा साथी खो दिया है, जिसने चार दशक से अधिक समय तक कैमरे के जरिए इतिहास को दर्ज किया। आर.बी. थापा का निधन केवल एक वरिष्ठ फोटो पत्रकार की विदाई नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि का जाना है, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी नजर, मेहनत और पेशेवर प्रतिबद्धता से अलग पहचान बनाई।
करीब 19 वर्ष की उम्र में वरिष्ठ छायाकार संजीव प्रेमी के सान्निध्य में फोटो पत्रकारिता का सफर शुरू करने वाले थापा भाई ने टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, स्वतंत्र भारत और कुबेर टाइम्स जैसे समाचार संस्थानों के साथ काम किया। मुझे याद है मैंने संवाद सूत्र के रूप में कुबेर टाइम्स में लिखना शुरू तो तब वह वहां स्थापित फोटोग्राफर थे। तब मैं मवैया में रहता था और वह पान दरीबा में। पड़ोसी मोहल्ले के होने के नाते उनका स्नेह मेरे साथ रहता था। बाद में महसूस हुआ कि नवांगतुक पत्रकारों का उत्साहवर्धन करना उनका स्वभाव ही था।
उत्तर प्रदेश की राजनीति, सत्ता के गलियारों और सामाजिक घटनाक्रमों को उन्होंने अपने कैमरे में समेटा। अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रम से जुड़ी उनकी फोटो पत्रकारिता भी उनके पेशेवर जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। थापा भाई की असली ताकत उनका फोटो सेंस था। वे केवल दृश्य दर्ज नहीं करते थे, बल्कि भीड़ और घटनाओं के बीच उस क्षण को पहचानते थे, जो खबर की असली तस्वीर बन सके। 1993 में भारत-इंग्लैंड क्रिकेट मैच के दौरान मैदान में आई पतंग और नवजोत सिंह सिद्धू से जुड़ा उनका चर्चित फोटो प्रसंग उनकी इसी विशेषता की याद दिलाता है।
भारी कैमरा बैग और पुराने स्कूटर के साथ वर्षों तक काम करने वाले थापा भाई ने फोटो पत्रकारिता के संघर्षपूर्ण दौर को जिया। उनके जीवन की कठिनाइयां यह भी याद दिलाती हैं कि समाज का दृश्य इतिहास रचने वाले पत्रकारों के अपने संघर्ष अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। आज कैमरे अत्याधुनिक हैं, लेकिन खबर को पहचानने वाली नजर तकनीक से नहीं खरीदी जा सकती। थापा की तस्वीरें और उनका पेशेवर अनुभव नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।
कैमरे के पीछे खड़ा यह शख्स चला गया, लेकिन उसकी नजर से दर्ज इतिहास बाकी है। विनम्र श्रद्धांजलि।



