मनोज अभिज्ञान-
वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) में कल प्रकाशित एक सनसनीखेज रिपोर्ट के अनुसार, एशिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति गौतम अडानी एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अमेरिका के ब्रुकलिन स्थित अटॉर्नी ऑफिस ने अडानी समूह की उन गतिविधियों की जांच शुरू कर दी है जिनमें ईरानी पेट्रोकेमिकल उत्पाद—विशेषकर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG)—की भारत में संभावित अवैध खरीद-फरोख्त शामिल है।
यह जांच ऐसे समय में सामने आई है जब अडानी ट्रंप प्रशासन पर पहले से ही चल रहे विदेशी घूसकांड के आरोपों को रद्द करवाने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट में सैटेलाइट इमेजेज, जहाज़ों की AIS डेटा, और कस्टम रिकॉर्ड्स के माध्यम से उन जहाज़ों की गतिविधियों को उजागर किया गया है जो अडानी के मुंद्रा पोर्ट और पर्शियन गल्फ के बीच संदिग्ध ढंग से संचालित हो रहे थे।
अमेरिका के ब्रुकलिन स्थित अटॉर्नी ऑफिस ने अडानी समूह की उन गतिविधियों की जांच शुरू कर दी है जो सीधे-सीधे ईरान पर लगे प्रतिबंधों की अनदेखी का संकेत देती हैं। जांच का केंद्र है—मुंद्रा पोर्ट और वहाँ से आने-जाने वाले एलपीजी टैंकर। जहाजों की वह चालाकियां, जिनसे वे अपने रूट और माल के स्रोत छुपाते हैं, अब उपग्रह की नज़रों से नहीं बच पा रही हैं। AIS (Automatic Identification System) को धोखा देना, AIS पर एक जगह दिखना और असल में दूसरी जगह रहना, एक खास जहाज ‘SMS Bros’ द्वारा ईरानी टर्मिनल ‘टोनबुक’ से LPG उठाने के संकेत, फिर सोहार से दस्तावेज़ तैयार कर भारत पहुंचना—यह सब अमेरिका की हॉकिंग नजरों से छिप नहीं पाया।
और यहीं से कहानी में आता है भूचाल। जिस अडानी ने खुद को ‘बोनाफाइड इम्पोर्टर’ कहकर तीसरे पक्ष की शिपिंग कंपनी पर जिम्मेदारी डाल दी, वही अडानी अब यह साबित करने में जुटे हैं कि वे न ईरान से व्यापार करते हैं और न अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन। लेकिन सवाल तो उठते हैं—जहाज की असल लोकेशन, फर्जी दस्तावेज, और AIS में दर्ज फर्जी लोकेशन किसकी ओर इशारा करते हैं?
इस बीच, अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से भ्रष्टाचार के पुराने मामलों की भी नई परतें खुल रही हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने Foreign Corrupt Practices Act के तहत हो रही कार्रवाई पर ब्रेक लगाया, वहीं दूसरी तरफ ईरान से तेल और गैस खरीदने वालों पर सख्त सेकेंडरी सैंक्शन्स का एलान किया। ऐसे में अडानी की लॉबिंग और अमेरिकी रिपब्लिकन सांसदों द्वारा उनके पक्ष में की गई पैरवी भी अब संदेह के घेरे में है।
याद करें जनवरी 2023 की वो सर्द रातें, जब हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट ने अडानी साम्राज्य की नींव को हिला दिया था। शेयरों की कीमतों ने गोता लगाया था, लेकिन सरकारी संरक्षण और वित्तीय धैर्य ने वापसी दिलाई। फिर नवंबर में अमेरिकी अभियोग: 250 मिलियन डॉलर की रिश्वत से जुड़े सौर ऊर्जा सौदे। अब यह ताजा ईरानी टकराव अडानी के लिए और भी घातक हो सकता है।
और यह सिर्फ SMS Bros की बात नहीं है। कम से कम चार अन्य टैंकर हैं जो ईरानी बंदरगाहों और अडानी के मुंद्रा पोर्ट के बीच संदेहास्पद मार्गों पर चलते पाए गए। AIS डेटा और सैटेलाइट इमेजरी के बीच विरोधाभास, बांग्लादेशी रिकॉर्ड्स में ईरानी LPG की प्रविष्टि, और जहाजों का लोकेशन स्पूफिंग—यह सब उस अंतरराष्ट्रीय भूगोल और व्यापार के खेल को उजागर करता है जहाँ सीमाएं दिखती हैं लेकिन मानी नहीं जातीं।
अडानी समूह का कहना है कि उन्होंने अपनी ओर से सभी कानूनी ज़िम्मेदारियाँ निभाई हैं, और जहाजों की गतिविधियों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन क्या अरबों डॉलर के साम्राज्य चलाने वाले इतने मासूम हो सकते हैं कि उन्हें अपने टैंकरों की चालों का ज़रा भी इल्म न हो?
गौतम अडानी अमेरिका में ऊँचे दर्जे के वकीलों को काम पर रख चुके हैं, जिनकी लॉबिंग से उम्मीद है कि विदेशी भ्रष्टाचार के आरोप हट जाएं। लेकिन अब जब मामला ईरानी तेल और अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ चुका है, तब यह सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संघर्ष बन चुका है।
यह कहानी सिर्फ एक उद्योगपति की नहीं है। यह कहानी है—उस पूंजीवादी व्यवस्था की, जहाँ सत्ता, व्यापार, और नैतिकता के बीच की रेखाएं धुंधली होती जा रही हैं। जहाज एक बंदरगाह से दूसरे तक जाते हैं, AIS में कुछ और दिखाते हैं, उपग्रह कुछ और पकड़ते हैं—और दुनिया का सबसे अमीर भारतवंशी व्यक्ति कहता है: हम तो सिर्फ कारोबारी हैं!
लेकिन अब यह खेल व्यापार से आगे बढ़ चुका है। यह खेल है—सत्ता के गलियारों का, जहां मिलियन डॉलर्स की हवाएं बहती हैं, और सच्चाई कभी-कभी सिर्फ डेटा में दर्ज होती है।
एलआईसी द्वारा अडानी समूह में 5000 करोड़ रुपयों का निवेश करने का ये मामला भी तूल पकड़ रहा है। राहुल गांधी ने एडवांस में ही इस प्रकरण पर कटाक्ष कर दिया है….

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