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समाजशास्त्री आदित्य निगम ने भाजपा के डिप्टी सीएम के हाथों पुरस्कार लेने से मना कर दिया

आदित्य निगम-

कल से एक पुरस्कार को लेकर कई दोस्तों ने बधाई दी और मैंने सहर्ष उन्हें स्वीकार किया। अब आयोजकों का पोस्टर देखकर पता चला कि मुख्य अतिथि बिहार के संघी उप मुख्यमंत्री हैं। लिहाज़ा अपने दोस्तों की जानकारी के लिए बता दूं कि मैं यह पुरस्कार लेने नहीं जाऊंगा। उद्घाटन सत्र का यह पोस्टर अभी थोड़ी देर पहले ही मुझे मिला है। उसके फ़ौरन बाद मैंने यह संदेशा आयोजकों को भेजा है।

“कुमार वरुण जी, नमस्कार! आपने ये जो उद्घाटन सत्र का पोस्टर भेजा है उसके बाद मेरा मन बदल गया है। मैं किसी भी सूरत में किसी संघी या भाजपाई से पुरस्कार नहीं लूंगा। बेहतर है कि आप मेरी टिकट वगैरह कैंसिल करा दें। मैं जानता हूं ये साहब उप मुख्यमंत्री हैं मगर अमित शाह या मोदी भी हैं। मेरे लिए यह कोई तर्क ही नहीं है।”


अभिषेक श्रीवास्तव-

अंग्रेजी में एक कहावत है- “missing the wood for the trees”, बोले तो दूर की नज़र कमजोर होना या जंगल देखने के बजाय एक-एक पेड़ गिनना। अपना समाज इस गुप्तरोग का क्रॉनिक बीमार है- विनोद कुमार शुक्ल या बद्री नारायण जैसे प्रसंगों में राजनीतिक शुचिता, प्रतिरोध, आदि बहसों के बहाने वह बार-बार इसे साबित करता है। आइए, इस तस्वीर को देखें और बौद्धिकता, राजनीति, प्रतिबद्धता आदि के हरे-भरे जंगल को समझें।

यह रामचन्द्र खान पुरस्कार के समारोह का कार्ड है। पुरस्कार सीएसडीएस के दो विद्वानों आदित्य निगम और हिलाल अहमद को इस शनिवार पटना में मिलना है। पुरस्कार बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपने हाथों से देंगे, जो फिलहाल 24 अप्रैल को मधुबनी में होने वाली नरेंद्र मोदी की रैली की तैयारियों में जुटे हुए हैं। पुरस्कार वितरण के बाद ”ज्ञान की राजनीति” पर सत्र है जिसकी अध्यक्षता भाजपा के नेता संजय पासवान करेंगे, जो वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन राज्यमंत्री रहते हुए तंत्र-मंत्र को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात कह चुके हैं और गले में सांप लपेटने से जिनकी सार्वजनिक ख्याति है।

नीचे आइए, विरोधाभासों की लड़ी सीधे द्वितीय सत्र पर जाकर टूटती है जहां “आज का भारत और गांधी” पर प्रोफेसर अरुण कुमार के साथ बद्री नारायण वक्ता हैं, जिन्हें दो चार-दिन से संघ के पक्ष में कुछ लिखने-बोलने को लेकर लानत भेजी जा रही है।

यह हरा-भरा बौद्धिक जंगल किसकी उपज है? लोक दर्शन न्यास के पदाधिकारी जो ‘जद-यू संधान’ के संपादक भी हैं; दिल्ली में सेकुलरवाद के मजबूत स्तंभों में एक राजद सांसद मनोज झा; और मणींद्र नाथ ठाकुर। और जद-यू क्या है? नरेंद्र मोदी की सरकार का एक बहुरूपिया स्तम्भ, जिसके अब-तब गिरने की उम्मीद सभी सदिच्छाधारी बौद्धिकों को पिछले जून से ही है- जैसे बनारसी साँड़ के नीचे लटकता पका हुआ एक फल होता है जो गुरुत्वाकर्षण बल का जबरदस्त मिथ्याभास देते हुए भी अपनी जगह से नहीं हटता, चाहे जितना भी हिल-डुल ले।

चलिए, एक और सूचना देता हूँ। पुरस्कार की अंतिम सूची में पाँच किताबें निर्णायक मण्डल से फाइनल हुई थीं। उनमें एक से चार तक सभी सेतु प्रकाशन की छापी हुई हैं। केवल पाँचवीं IIAS, शिमला की है। क्या अमिताभ राय की दुकान को सुरखाब के पर लगे हैं कि समाजविज्ञानी निर्णायक मण्डल को और कोई प्रकाशक नहीं दिखा किताबें चुनने के लिए? जवाब निर्णायक मण्डल में शामिल मणींद्र नाथ ठाकुर से मांगा जाना चाहिए, जिनकी ”ज्ञान की राजनीति” सेतु से छपी थी।

अब बताइए, जिन लोगों को विनोद कुमार शुक्ल या बद्री नारायण से कथित रूप से राजनीतिक दिक्कत है, वे लोग मनोज झा, आदित्य निगम, हिलाल अहमद, मणींद्र ठाकुर को एकाध आलोचना के आशीर्वाद देंगे क्या? इस छद्म बौद्धिक, सेकुलर, नेटवर्क पर कुछ बोलेंगे क्या? “ज्ञान की राजनीति” में वि-औपनिवेशीकरण की थ्योरी से आक्रांत आदित्य निगम, देशिक अनुसंधान में व्यस्त अभय दुबे, और संघप्रिय वचनों में लिप्त उनके खास मित्र बद्री नारायण लगायत CSDS, JDU, RJD, AN Sinha Institute और BJP को जोड़ने वाली बिहारी जड़ों पर प्रकाश डालेंगे क्या?

बिहार से निकले इस बौद्धिक जंगल की एक अहम शाखा दिल्ली के जवाहर भवन तक जाती है जो राजधानी के सेकुलर बौद्धिकों, एनजीओवादियों, कांग्रेसी लाभार्थियों, आदि के कार्यक्रम करने का आजकल इकलौता ठीहा बच रहा है- सौजन्य से कांग्रेसी संस्था राजीव गांधी फाउंडेशन, उसके मुखिया विजय महाजन और सर्वव्यापी प्रोफेसर अपूर्वानन्द। कोई इस पर भी प्रकाश डालेगा क्या?

अपनी-अपनी निजी खुजलियों से पार जाकर वैचारिक सुविधाओं, पुरस्कारों, प्रकाशनों, सम्मानों और पीठ खुजउवन के इस सामूहिक अनैतिक, व्यभिचारी उद्यम पर एक बार सोचिए, तो आप पाएंगे कि ज्ञान की समूची राजनीति दरअसल ज्ञान की तरफ पीठ कर के ही की जा रही है। ज्ञानपीठ जैसी निजी संस्थाएं तो महज एक लक्षण हैं। किसी एक आदमी का दोष नहीं, बीमारी बहुत गहरी है। और अनिवार्यतः सेकुलर है! इस देश में समस्या सांप्रदायिकता की उतनी नहीं है, जितनी सेक्युलरिज़म के नैतिक क्राइसिस की है।

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