प्रियंका दुबे-
इस मामले को छोड़ा भी जा सकता था और मैंने कई बार सोचा कि छोड़ दूँ. लेकिन यह सब इतना अन्यायूर्ण और हिपोक्रेसी से भरा है कि इस पर बोलना ज़रूरी है. अनिल कुमार यादव जी कि इस पोस्ट पर मेरी टिप्पणी यह है : क्या यह bullying नहीं ?
एक उपन्यासकार अपनी कृतियों में दुनिया और दुनिया में हो रही घटनाओं पर respond करता है. अलका सरावगी जी उपन्यासकार हैं और दुनिया के प्रति उनके response को जानने के लिए उनकी कृतियाँ पढ़ी जानी चाहिए. आप जो कह रहे हैं कि अलका जी को “सच्ची धार्मिक” होने का “सर्टिफिकेट” तब ही मिलेगा जब वे सड़क पर उतर कर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नारे लगाएँ- क्या यह बुलिंग नहीं? मैं यहाँ आपकी तरह “उसके” नहीं कह रही हूँ और नाम लेकर बात करती हूँ क्योंकि डरती नहीं.
अलका जी अपनी कृतियों में pro people और pro women रहीं हैं. वैसे तो यह तस्वीर यूँ भी उन्होंने अपनी वॉल से पोस्ट नहीं की थी. लेकिन आपका कहना है कि अगर वो अपने धर्म को प्रैक्टिस करती हैं तो आप उनकी डिजिटल लिंचिंग (सार्वजनिक अपमान) को यूँ ही फ़ैसिलिटेट करते रहेंगे और इसे सही मानेंगे ? आपके यहाँ कमेंट्स में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे प्रोफ़ेसर ने अलका जी के काम के लिए “हत्यारों का समर्थन” जैसी अत्यंत अतिरेक में जाते hyperbolic वाक्य का इस्तेमाल किया है.
क्या आप यह मानते हैं कि हिन्दू धर्म वर्तमान सरकार के कदमों में गिरवी है? एक स्त्री लेखक अपने पति के साथ यदि मंदिर में दर्शन कर लेती है तो क्या छुटभइये किस्म के लोगों को यह अधिकार देता है कि आपकी कमेंट थ्रेड में आकर उनका इस तरह अपमान करें? उन्होंने 8 उपन्यास लिखें हैं और हिंदी के लिए इतना काम किया है – उनका अपमान करने वालों के खाते में कितना काम है ? सिवाए इसके कि वे फेसबुक पर उनसे भिन्न तरह से प्रश्नों को बरतने वाले और उनसे डील करने वाले लेखकों का सार्वजनिक अपमान कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते हैं.
हिंदी का कोई लेखक तो मुझे कभी न सड़क पर उतरता नज़र आया और न कभी गिरफ़्तार ही हुआ. जो बेचारे पत्रकार गिरफ़्तार हो रहे हैं, उनके लिए भी कुछ नहीं कहा – किया. लेकिन हाँ, किसी बुजुर्ग और समर्थ उपन्यासकार को इस तरह लथेड कर समझते हैं कि हमने अपना काम कर लिया. अरे, अलका जी तो यूँ भी inclusive लेखक हैं – अपनी सोच और अपने विचार में समावेशी हैं. आपके पोस्ट के नीचे इस कमेंट थ्रेड पर इतना रायता फैलाने वाले लोग उनसें जाकर क्यों नहीं लड़ते जो वास्तव में संघी हैं. क्योंकि उतनी हिम्मत नहीं है इन लोगों में.
एक स्त्री पर – जिसकी सोच यूँ भी प्रो पीपल ही है, सिर्फ़ उस पर ही यूँ हमला कर सकते हैं यह लोग. वरना इतना बरस हुए , और तमाम प्रगतिशील संघ हैं आप लोगों के – एक भी बार bhi sustained effort नहीं देखा उस तथा-कथित प्रतिरोध का जो आप चाहते है कि हर लेखक आपके clone की तरह फॉलो करें. clone करने के लिए भी तो कोई ओरिजिनल उदाहरण होना चाहिए न. उदाहरण सिर्फ़ ऐसी ही ग़लत जगह मेहनत करने के मिलते हैं. जो लोग पहले से ही अपने विचार में inclusive है- उन पर हमला करके चार ट्रोल्स की वाह वाही लूटना और ख़ुद को दिलासा देना कि हमने भी कुछ किया है. This is petty behaviour, below the belt.
Anil Kumar Yadav-
प्रियंका दुबे, मैं हमेशा से अल्का जी का सम्मान करता आया हूँ। न तो उन्हें, न ही उनके पति और यतीश कुमार को ट्रोल किया जा रहा है और न ही डिजिटल रूप से लिंच किया जा रहा है। कृपया शब्दों का दुरुपयोग न करें। जिस बात का ज़िक्र इस मामले में था ही नहीं, उसे लेकर आप अनावश्यक रूप से विवाद खड़ा कर रही हैं, जिससे किसी को कोई लाभ नहीं होगा। फिलहाल मैं यात्रा में हूँ, कुछ देर बाद अपना पक्ष स्पष्ट करूंगा ताकि कोई गलतफहमी न रहे।
अमन त्रिपाठी-
सवाल पूछने पर सामने वाला इतना आहत हो जाता है मानो लिंच हो गया हो. बुलीइंग या लिंचिंग वगैरह इतने सस्ते टर्म्स नहीं हैं.
लेखक हैं और प्रगतिशील वगैरह का ठप्पा भी पाए हुए हैं, और बड़ी आसानी से कर्मकांडों का प्रदर्शन भी कर लेते हैं – उन्हीं प्रतीकों का सहारा लेकर सालों से नरसंहार चल रहे हैं. एक बुद्धिजीवी लेखक होने के नाते क्या आपसे पूछा भी नहीं जाएगा कि आपकी धर्म और कर्मकांड संबंधी समझ या स्टैंड क्या है? आपका धर्म उन्हीं तरीकों से क्यों पोषित होता है जिससे दूसरों के कत्ल के रसायन और औजार बनते हैं? उन प्रतीकों या तरीकों का इस्तेमाल तो उसी धर्म के बहुतेरे हिस्से नहीं करते? इतना सुविधापरक नहीं है एक बुद्धिजीवी के लिए सार्वजनिक रूप से कर्मकांडी होना. प्रियंका दूबे वगैरह तो, कहना नहीं चाहता, हास्यास्पद (बात कर रहे) हैं.
क्या लेखक आस्तिक, धार्मिक, कर्मकांडी वग़ैरह नहीं हो सकते? शौक़ से हो सकते हैं. न होने की अपेक्षा करना एक तरह की अनाधिकार चेष्टा है. किन्तु वे जिन धार्मिक प्रतीकों को मानते हैं, जिन कर्मकांडों का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं, उनके राजनीतिक निहितार्थों और प्रयोग के तरीकों से मुँह मोड़कर वे नितांत सुविधाजनक ढंग से प्रगतिशील-धार्मिक नहीं बने रह सकते. कम से कम आज पॉपुलर किस्म से कर्मकांडी वगैरह होना, एक पब्लिक फ़िगर वाले लेखक के लिए, इतना सीधा-सहज मामला नहीं है. उनसे पूछा जाएगा ही कि कर्मकांडों और धर्म के मामले में उनका अपना स्टैंड क्या है? उन्हें हजार-डेढ़हजार लोग पढ़ते-देखते हैं, उनके साहित्य और सार्वजनिक व्यवहार से जीवन के बारे में अपनी ख़ुद की राय बनाते हैं. जो लोग स्थापित कर चुके हैं कि धर्म और राजनीति का यह सहमेल उनके लिए सूटेबल है, वे इसका यथासंभव उपयोग करेंगे – उनसे अब कोई सवाल नहीं करता. जो बचे हैं वे भी क्यों बचे हैं, शामिलबाजे में क्यों नहीं शामिल हो जाते, कैसी शर्म?
लेखक और लेखन की फांक जितनी कम हो जाए उतना बेहतर है. साहित्य और जीवन के अंतर जैसा मामला कुछ होता नहीं है. यह शुद्ध बेईमानी है. आपको अपनी हर क्रिया की ज़िम्मेदारी लेनी होगी. अपनी जीवन-दृष्टि में सबको शामिल करना होगा. अगर ऐसा नहीं है, ख़ासकर आज के दौर में, तो आपका साहित्य, आपका लेखन झूठा और बेईमान है. जब लेखक बहुत मासूम बनने लगते हैं तो उनकी धूर्तता और ज़ाहिर हो जाती है.
Sushila Puri-
Alka Saraogi ji , के प्रति इस तरह की पोस्ट बिल्कुल नही आनी चाहिए थी। धर्म का मामला आज भी पेचीदा है, तमाम प्रगतिशील संगठन यहीं तक सीमित होकर अपना झंडा लहराते रहते हैं। योगी आदित्यनाथ यदि किसी कार्यक्रम में मंच पर आ जाएं तो हंगामा करके किसी लेखक को अपमानित करना भी ये कट्टर सेकुलर नही भूलते और उस लेखक के खिलाफ बाकायदा सिग्नेचर लिस्ट जारी की जाती है। इन “सेक्यूलरों” की दिक्कत ये है कि इन्हें किसी लेखक या लेखिका ने क्या लिखा है जीवन में, उस पर बात नही करना, बल्कि उनके धार्मिक हो जाने का खतरा अधिक रहता है। यह अत्यंत दुखद है कि प्रिय अलका जी उनके जीवन संगी और प्रिय Yatish Kumar ji की इस तस्वीर के साथ ऐसी बातें की गई। Priyanka Dubey ! आपकी पोस्ट से सहमत हूं और इस इनसेंटिव के लिए प्रेम !
Om thanvi-
अलकाजी का लेखन देखना चाहिए। अपने आग्रहों-दुराग्रहों से बड़े लेखक की निजता का मज़ाक़ उड़ाने से कुछ फ़ौरी चर्चा भले मिल जाए, इससे ख़ुद तो बड़े नहीं हो जाएँगे। अनिल अच्छा लिखते हैं। पता नहीं इस कीचड़-उछाल में क्यों पड़ गए।
Chand Tiwari-
बहुत ही शर्मनाक बात है कि आज सभी लोग किसी को भी हर चीज का प्रमाण पत्र प्रदान करने के लिए मौके तलाशते रहते है। हर किसी की संवैधानिक स्वतन्त्र है और संविधान में तो नहीं लिखा न कि लेखक या बुद्धिजीवी को नास्तिक होना चाहिए, नहीं तो उसको तुरंत प्रमाण पत्र पकड़ा दिया जाएगा? प्रियंका जी से पूर्णतः सहमती है, समझ में नहीं आता कहां से आते हैं ऐसे लोग?
Umesh tiwari shubham-
इनमें और पाकिस्तान भेजने वाले सर्टिफिकेट जारीकर्ताओं में फर्क क्या है ऐसा कहते हुए भी मैं उन्हें अधिक सही ठहराऊंगा कम से कम वे अपनी बात पे कायम रहते हैं। ये तो वैयक्तिक स्वतंत्रता, उदारवाद जैसे आदर्शों का ढोल पीटने वाले सर्टिफिकेट बांटे तो ज्यादा निंदनीय है, जो लोग फासिज्म के खिलाफ लड़ने का दावा करें वे फासिस्टों जैसी हरकत करते हैं तो उनकी लानत मलालत ज्यादा होनी चाहिए।
अनिल जी कामनसेंस खो चुके हैं जो उन्हें इस बात की समझ नहीं रही कि धर्म का नाम लेकर कोई वोट ले रहा है तो उसके प्रैक्टिसिंग व्यक्ति कैसे दोषी है वे तिरंगे का भी राजनैतिक इस्तेमाल करते हैं तो क्या अनिल जी तिरंगा लगाने वालों को ऐसे ट्रोल करेंगे और जो वो भी करने लगेंगे तो कहाँ जाकर रुकेंगे इसकी कोई सीमा है।
ऐसी बौद्धिकता किसी अर्थ की नहीं जिसे अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने के लिए ‘bellow the belt’खेलना पड़ रहा है
Ajay Kumar-
मैने भी अनिल जी की पोस्ट पढ़ी। उनकी पोस्ट और लेख पढ़ता रहता हूं क्योंकि मुझे वह मेरे व्यक्तिनिष्ठ नजर में बहुत ही इमानदार लेखक लगते हैं। इसलिए मैंने उनकी पोस्ट पर कमेंट भी किया। आपने जो उनके पोस्ट का पाठ किया मैं उससे सहमत नहीं हूं। अनिल जी की पोस्ट पढ़कर मुझे तो कहीं से भी यह नहीं लगता कि वह यह कहना चाह रहे हैं कि सच्चा धार्मिक और सच्चा लेखक वही है, जो सड़क पर उतरकर नारे लगाए। मेरी समझ में उनकी पोस्ट से ऐसा निष्कर्ष मैं दूर-दूर तक नहीं निकल पा रहा। वह शायद यह कहना चाह रहे हैं कि चिंतन मंथन में लगे लोगों को सतही प्रचार का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। उस जीवन व्यवहार को अपने से बचना चाहिए जिसका आधार एक तरह का भ्रमजाल है। जैसे बनारस के बारे में सतही प्रचार किया गया है कि जो माथे पर चंदन टीका लगा ले वह बनारसी हो गया। जो पान चबाकर बतियाये है वह बनारसी हो गया। Anil Kumar Yadav जी शायद सोचने समझने वाले लोगों से खीजते हुए दिखाई देते हैं कि सोचने समझने वाले लोग भी उसी जाल में फंस रहे हैं जिस जाल में मौजूदा वक्त की सत्ता उन्हें फंसाना चाहती है। अगर वही विविधता के प्रति संवेदनशील नहीं है और विविधता को अपने जीवन में नहीं उतर पाए हैं तो दूसरों से क्या उम्मीद किया जाए?
बाकी आपकी पोस्ट के एक केंद्रीय तर्क से बिल्कुल सहमत नहीं हूं। वह तर्क ऐसा है जैसे भाजपा वाले कहते हैं कि हम लगातार चुनाव जीत रहे हैं। हमने चुनाव पर चुनाव जीत कर दिखाया है। इसलिए आप हमारी आलोचना न कीजिए। ( तर्क – उन्होंने आठ उपन्यास लिखे हैं। उन्होंने बहुत काम किए हैं। उनपर कमेंट करने वालों का कितना काम है) अगर हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं तो भारत में सबके लिए वोटिंग का अधिकार खत्म कर उन्हें ही वोटिंग का अधिकार दिया जाए जो राजनीति और सामाजिक विज्ञान के महारथी हैं।
Pramod Shah-
मार्क्सवाद का सतही ज्ञान रखने वाले कथित सेकुलर लेखक अपनी रचना से नहीं बल्कि अपने निम्न विचारों से अच्छे रचनाकारों का अपमान करते हैं। लेखक कहीं भी जाए,उसका परीक्षण उसकी लेखनी से होता है।यह लेखक की रचनात्मकता है कि वह और अन्त में प्रार्थना भी लिखता है और कामरेड का कोट भी। लेकिन एक रचना उनको हुलसाती है और दूसरी उन्हें नागवार लगती है।
Nirjhra Sarita-
Who gave the right to Mr Yadav to talk this nonsense and ask questions? अंदर इतनी किलस खीज नफरत भरी है कि कोई अपनी खुशी के लिए कुछ करे उसे साहित्य के कीच अखाड़े की शुचिता में लेथेड देंगे! मूर्खता और खीज झलक रही इनकी इस टिप्पणी में! जाने कौन से वाद और प्रगतिशीलता में जीते है ये लोग… खुद के परिवार के भीतर भी सारे रूल्स चलाते है??
Mahesh Kumar-
बहुत साहसिक टिप्पणी है आपकी Priyanka Dubey मैम। चंदन-टीका तक लगाने में आजकल प्रगतिशीलता खतरे में आ जा रही है। हिंदी के लेखक बहुत दुविधाग्रस्त हैं। यहाँ एक सिख-मुसलमान-पारसी और सब धर्म के लोग अपनी प्रतीकों के साथ प्रगतिशील बना रह सकता है। बस हिन्दू को प्रगतिशील होने के लिए अपने सब प्रतीक त्यागने के लिए बाध्य किया जाता है। प्रगतिशील लेखकों के इन्हीं फतवों के कारण सॉफ्ट हिंदुत्व और हिंदुत्व का बोलबाला है। यह इतनी बड़ी घटना नहीं थी कि अनिल जी इतना लंबा पोस्ट लिख मारे। यह अति है। ऐसे ही कुछ माह पहले पंकज चतुर्वेदी को भी ट्रोल किया गया था। अनिल जी बहुत अच्छे लेखक हैं।यहाँ उनसे घनघोर असहमति है। प्रतीक को ‘सांस्थानिक धर्म’ और ‘हिंदुत्व की राजनीति’ से अलग सांस्कृतिक अर्थ में भी देखना चाहिए।
Pallavi Pundir-
यह पढ़कर मात्र एक बात मन में घूम रही है, वो ये कि मैं अपने धर्म और उसके प्रतीकों के प्रति श्रद्धा रखती हूँ तो क्या मात्र इस कारण से मेरी राजनीतिक विचारधारा अथवा चरित्र का निर्धारण कर लिया जायेगा। क्या मेरा धर्म, मेरी आध्यात्मिकता किसी राजनीतिक पार्टी की निजी सम्पत्ति है?
Rahul Mukhuty-
बिल्कुल, यह अतिवाद ही बौद्धिक खेमे का मज़ाक बनाने को पर्याप्त है। इनको यह तक नहीं मालूम कि हर टोपी लगाने वाला मुसलमान या टीका/चोटी धारण किये हुए हिन्दू कट्टर नहीं होता।
Aryesh Mishra-
Social media radicalised our responses. I think the prime reason is here nothing works but extreme stands. Either this or that. The grey area is not social media things. Public intellectual or पढ़े लिखे लोगों को कितना बाएनरी बनाया है सोसल मिडिया ने ये आउट साइडर होकर ( मैं नहीं लिखता यहां) ही समझ आता है।
Vartika-
I kind of agree with you here, but at the same time, let me tell you this too, Mandeep Punia की गिरफ्तारी, जोकि किसान आंदोलन के वक्त हुई थी, उसके लिए एक प्रोटेस्ट मार्च हुआ था, अभिषेक श्रीवास्तव की अगुआई में, जिसमें अनिल यादव भी शामिल थे। बस इसलिए बता रही हूं कि दोनों ही हिंदी के लेखक हैं।
Priyanka Dubey-
मनदीप पत्रकार हैं, अभिषेक जी को भी पत्रकार और अनुवादक के तौर पर ही जाना जाता हैं . काम तो मुख्यतः अनिल जी का भी सारा nonfiction का ही है – हाँ, उन्होंने कहानियाँ लिखी हैं लेकिन उनको जाना आज भी वह भी कोई देस के लिए ही जाता है. ग्यारह साल से यह सरकार काम कर रही हैं. और जिस ऊँचे पायदान पर चढ़कर यह लोग अलका जी को लताड़ रहे हैं, वह ऊँचा पायदान अर्जित करने के लिए तो इनको और कमेंट्स वाले भाई लोगों को काफ़ी काम करना चाहिए था. आज तक हिंदी के लेखकों की एक भी बड़ी रैली नहीं देखी मैंने. हिम्मत नहीं है – मैं पत्रकार रही हूँ और मुझे मालूम है हिम्मत क्या होती है. यहाँ तो बस यही हिसाब है कि कोई मेहनत से उपन्यास लिख रहा है तो उसे पकड़ो और डिजिटली लिंच करो और हाथ झाड़ के बैठ जाओ. बाक़ी कमेंट्स वाले सारे भाई लोग आज पढ़ाने अपनी अपनी यूनिवर्सिटी को चले गए होंगे. असली संघियों से लड़ नहीं सकते तो चुप चाप उपन्यास लिख रहे लोगों से ही लड़ो. Anyways, thanks for sharing your thoughts.
मूल पोस्ट-




Vijay Vineet
March 11, 2025 at 10:00 pm
प्रियंका दुबे जी,
आपका कहना है कि हिंदी के किसी लेखक को कभी न सड़क पर उतरते देखा, न गिरफ़्तार होते। यह बयान न सिर्फ़ हिंदी लेखकों और पत्रकारों का अपमान है, बल्कि आपकी संकीर्ण सोच को भी दर्शाता है। क्या आपको सच में लगता है कि सिर्फ़ अंग्रेज़ी के पत्रकार ही संघर्ष करते हैं? क्या आपको उन हिंदी पत्रकारों का बलिदान नहीं दिखता, जिन्होंने सत्ता के दबावों के बावजूद सच को उजागर किया?
सच तो यह है कि हिंदी पत्रकारों और लेखकों ने अंग्रेज़ी पत्रकारिता से कहीं अधिक चुनौतियों का सामना किया है। हिंदी के पत्रकार न सिर्फ़ सत्ता, बल्कि अपने ही समाज की उपेक्षा और संसाधनों की कमी के बीच काम करते हैं। वे ज़मीन पर रिपोर्टिंग करते हुए, भीड़ के हमलों से लेकर पुलिसिया दमन तक झेलते हैं। लेकिन अफ़सोस, आपकी नज़र में संघर्ष सिर्फ़ वही है जो अंग्रेज़ी अख़बारों के पन्नों पर छपता है।
आपका यह तंज़ कि “हिंदी का कोई लेखक न सड़क पर उतरा, न गिरफ्तार हुआ,” एक खोखले अभिजात्य बोध से उपजी टिप्पणी है। क्या आपने उन हिंदी पत्रकारों के बारे में कभी लिखा जो रिपोर्टिंग के दौरान जेल में डाल दिए गए? उन लेखकों को याद किया जो भीड़तंत्र के शिकार हुए?
आपकी तरह अंग्रेज़ी के कुछ पत्रकारों को यह ग़लतफ़हमी हो गई है कि आंदोलन का ठेका सिर्फ़ उन्होंने ही ले रखा है। लेकिन इतिहास उठाकर देखिए, आपको असली प्रतिरोध हिंदी और भारतीय भाषाओं के पत्रकारों और लेखकों में ही मिलेगा। फर्क सिर्फ़ इतना है कि वे अंग्रेज़ी की चमक-दमक से दूर रहकर संघर्ष करते हैं, इसलिए आपके अभिजात्य विमर्श में जगह नहीं बना पाते।
अब बात अलका सरावगी जी पर आपके बयान की। क्या यह बुलिंग नहीं है?
एक उपन्यासकार अपनी कृतियों में दुनिया और उसमें हो रही घटनाओं पर प्रतिक्रिया देता है। अलका सरावगी जी उपन्यासकार हैं और उनके विचार जानने के लिए उनकी कृतियाँ पढ़नी चाहिए। आप जो कह रही हैं कि अलका जी को “सच्ची धार्मिक” होने का सर्टिफिकेट तब ही मिलेगा जब वे सड़क पर उतरकर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नारे लगाएँ—क्या यह भी एक किस्म की बुलिंग नहीं?
आपने इस पूरे प्रकरण में एक खास तरह की संकीर्णता दिखाई है। अलका सरावगी के मंदिर जाने पर इतनी आपत्ति क्यों? क्या एक लेखक को उसके निजी जीवन में भी आपकी विचारधारा के हिसाब से चलना चाहिए? अगर कोई महिला लेखक मंदिर चली जाती है तो क्या उसे ट्रोल करना जायज़ हो जाता है? क्या आपको यह अधिकार मिल जाता है कि उसके पूरे साहित्यिक योगदान को किनारे रखकर, उसे एक खास खांचे में फिट करने की कोशिश करें?
यह हिंदी का दुर्भाग्य है कि उसकी पत्रकारिता और साहित्य को उसके अपने ही लोग दोयम दर्जे का मानते हैं। जो लोग अंग्रेज़ी में लिखते हैं, वे ख़ुद को global intellectual समझते हैं और हिंदी में लिखने वालों को पिछड़ा। लेकिन यह मानसिक गुलामी हिंदी के लेखकों का नहीं, बल्कि आपकी जैसी सोच का दोष है।
अगर पत्रकारिता और साहित्य में वास्तविक न्याय की बात करनी है, तो पहले अपनी खुद की वैचारिक संकीर्णता से बाहर आइए। अन्यथा यह सारी नैतिकता सिर्फ़ सुविधा के हिसाब से किया गया चयनात्मक प्रलाप ही रहेगा।
विजय विनीत
बनारस
अफ़लातून
March 12, 2025 at 7:04 am
अनिल या अभिषेक के छापा-तिलक वाले फोटू छाप दिए जाएं तब भी अलकाजी जितनी उन पर चर्चा होने लायक वे अभी तक नहीं हैं।