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उत्तर प्रदेश

पत्रकार/सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित कोर्ट से बरी, साजिश करने वालों पर मीडिया में चुप्पी?

बाँदा, 10 जुलाई 2025 — पत्रकार, पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक सरोकारों से जुड़े आशीष सागर दीक्षित को विशेष न्यायालय एससी/एसटी एक्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। लेकिन इस न्यायिक निर्णय पर बाँदा के स्थानीय मीडिया, खासकर प्रमुख दैनिक अमर उजाला, की चुप्पी अब कई सवाल खड़े कर रही है।

31 मई 2022 को एक एनजीओ से जुड़ी महिला ने आशीष सागर पर दुर्व्यवहार, छेड़छाड़ और एससी/एसटी एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगाकर रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसके बाद 2 जून 2022 को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। 26 दिन की जेल यात्रा और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद कोर्ट ने पाया कि आरोप निराधार और साजिशन थे, और उन्हें बरी कर दिया।

आशीष सागर ने पहले ही हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर स्थगन आदेश ले लिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें जेल भेजा गया। इस पूरे मामले में स्थानीय सामाजिक संगठनों, खासकर विद्याधाम समिति और कथित “चिंगारी गैंग”, पर साजिश रचने के आरोप लगे, मगर न तो पुलिस की कार्रवाई में और न ही मीडिया की रिपोर्टिंग में इन संगठनों का नाम सामने आया।

मीडिया की भूमिका को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी व्यक्ति पर आरोप लगते हैं, तो नाम और फोटो के साथ बड़ी सुर्खियां बनती हैं, लेकिन जब वही व्यक्ति निर्दोष साबित होता है, तो साजिशकर्ताओं के नामों को दबा लिया जाता है। अमर उजाला जैसे अखबार ने 3 जून 2022 को यह लिखा था कि “आशीष सागर ने हाईकोर्ट से गिरफ्तारी का स्थगन आदेश ले लिया”, लेकिन अब जब कोर्ट ने उन्हें पूरी तरह बरी कर दिया है, तो इस बात को प्रमुखता नहीं दी गई। इससे मीडिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बाँदा में पिछले डेढ़ दशक से कुछ चुनिंदा मीडिया संस्थान, सत्ता और संगठनों की मिलीभगत से जनता को भ्रमित कर रहे हैं। इन अखबारों ने राजाभैया यादव और उनसे जुड़े कथित माफिया नेटवर्क की असलियत कभी उजागर नहीं की, बल्कि उनके एजेंडे को ही समाज में फैलाया।

अब सवाल यह है कि क्या मीडिया सिर्फ आरोपों की खबर चलाकर किसी की छवि बिगाड़ने का माध्यम बन जाएगा? क्या कोर्ट से बरी होने के बाद भी न्याय सिर्फ न्यायालय की चारदीवारी में ही सिमट कर रह जाएगा?

यदि मीडिया निष्पक्ष है तो उसे न केवल आरोप लगाने वालों का, बल्कि झूठे आरोपों के पीछे खड़े चेहरों का भी पर्दाफाश करना चाहिए। नहीं तो यह लोकतंत्र में जनता की आंखों पर बंधी पट्टी को और मजबूत करने जैसा होगा।

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