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साहित्य

अशोक कुमार पांडेय और शम्सुल इस्लाम के बीच ये “गोलवलकर पुस्तक” विवाद क्या है? पढ़ें

शम्सुल इस्लाम-

आदरणीय अशोक कुमार पांडे जी, चरण स्पर्श!

मैं आपका आभारी हूँ कि आपने इतनी कृपा की कि सिर्फ़ यह लिखा कि मैंने आपसे अपनी पुस्तक (Golwalkar’s We or Our Nationhood Defined: A Critique By Shamsul Islam) का अनुवाद करने और प्रकाशन करने का रिक्वेस्ट (request) किया था और यह नहीं बताया कि वास्तव में मैंने आपको उपरोक्त कार्य करने पर मजबूर करने के लिए आपका अपहरण किया था! मैं जीवन भर आपका ऋणी रहूँगा कि आपने प्रकाशक के रूप में मेरी पुस्तक प्रकाशित करके एक अज्ञात और निम्न लेखक को प्रायोजित किया।

इस पर भी कभी बात होनी चाहिये कि आपने मुझ से किस तरह संपर्क किया था और मैं भी आप से गर्मजोशी से मिला था क्योंकि आप तब इंसानियत और क्रांतिकारी जोश से भरपूर थे। आप की पत्नी एक ‘ट्रेड यूनियन’ नेता थीं, एक आदर्श राजनैतिक परिवार जिस का मैं सदा आदर करता था।

आपके झूठ हैरान कर देने वाले हैं: आपने ज्ञान दिया यह मेरी किताब नहीं है, बल्कि गोलवलकर की “वी ऑर आवर नेशनहुड” की कॉपी-पेस्ट है। इसके बावजूद आपने इसे प्रकाशित किया (कितने संस्करण, आपके अलावा कोई नहीं जानता!), और लेखक को आमंत्रित किए बिना ही इसे 2015 में मंगलेश डबराल भाई की उपस्थिति में सार्वजनिक रूप से जारी किया। मुझे सिर्फ़ यह पता है कि 13-03-2016 को आप ने आपके ‘दखल प्रकाशन’ के FB पर जानकारी दी कि 2 महीने के भीतर first संस्करण समाप्त हो गया है।

जनाब! आपने अपने ही प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के पिछले कवर पर मौजूद- मशहूर पत्रकार-इतिहासकार- खुशवंत सिंह जी द्वारा इस पुस्तक पर लिखी समीक्षा नहीं पढ़ी (मूल रूप से अंग्रेज़ी में, द टेलीग्राफ, कोलकाता, 24-02-2007 में प्रकाशित), जिसमें उन्होंने लिखा था- “गोलवलकर पर सावरकर के विचारों की गहरी छाप थी, दोनों जातिवाद के समर्थक थे और हिटलर द्वारा लाखों-लाख यहूदियों के नरसंहार को जायज़ ठहराते थे। वे यहूदीवादी राज्य इस्राइल के इसलिए समर्थक थे क्योंकि इसने (इज़राइल ने) अपने पड़ोसी मुसलमान देशों से लगातार युद्ध छेड़ रखे थे। इस प्रकार इस्लाम से घृणा हिंदुत्व का एक अभिन्न अंग बनकर उभरा। गोलवलकर की पुस्तक ‘वी आर‌ अवर नेशनहुड डिफाइंड’ की मुझे जानकारी नहीं थीI अब इसे सम्पूर्ण रूप से शम्सुल इस्लाम की पुस्तक में आलोचना के साथ छापा गया है। मैंने जो कुछ कहा है इससे (इस किताब से) उसकी पुष्टि होती है।”

स्पष्ट है इस किताब के बारे में ख़ुशवंत सिंह जी को भी सूचना नहीं थी उन्हें भी पहली बार मेरी किताब से ही इस किताब की जानकारी मिली कि गोलवलकर ने ऐसी भी कोई किताब लिखी थी। ये आप भी जानते हैं कि इस पुस्तक के कारण ही गोलवलकर की ये घृणित किताब देश के सामने आ सकी। और वहीं से गोलवलकर के हिटलर के नरसंहार के प्रेम, फासीवादी विचारों से देश अवगत हो सका। जिसे छुपाने के लिए इस पुस्तक को ख़ुद आरएसएस कभी प्रकाशित नहीं करता। वो वर्षों पुरानी छुपी हुई किताब पहली बार इस पुस्तक के माध्यम से सबके सामने आ सकी। ये अब भी जानते हैं कि हिन्दी में आपके द्वारा प्रकाशित किए जाने से काफ़ी पहले ही अंग्रेज़ी में आ चुकी थी। जिसे आपने हिन्दी में अनुवादित करके प्रकाशित किया। आपके कारण मुझे इस पल का साक्षी होने का गौरव प्राप्त हुआ है जब संभवतः दुनिया में पहली बार किसी प्रकाशक ने एक किताब, लेखक के नाम से छापी, लेखक को बताए बिना ही किताब की लॉंचिंग की, प्रोग्राम किया, मुनाफ़ा कमाया। और जब रॉयल्टी देने की बात आई तो कह दिया कि कि लेखक तो पुस्तक का लेखक ही नहीं है। मैं नेपोलियन के ह्रदय से भी बड़े उस ह्रदय को नमन करता हूँ जिसमें उतना साहस जन्म लिया कि कोर्ट में भी ये बात कही कि लेखक, किताब का लेखक नहीं है, उस किताब का जिसे आपने ख़ुद छापा।

जहाँ तक आपके अनुवाद का प्रश्न है, यह उन सभी लोगों के लिए एक उदाहरण होना चाहिए जो अच्छे अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवादक बनने की तैयारी कर रहे हैं कि क्या नहीं करना चाहिए। जो लोग इस विधा से परिचित हैं, वे समझेंगे कि खराब अनुवाद को ठीक करना एक भयानक सरदर्दी वाला काम है।

पंडित जी, आप हमें यह नहीं बताते कि मैं अदालत क्यों गया? किताब दिसंबर 2015 में प्रकाशित हुई थी, कृपया हमें बताएँ कि मेरी लगातार माँगों के कितने महीनों बाद मुझे किताब की प्रतियाँ उपलब्ध कराई गईं? मैंने समझौते के प्रारूप [author-publisher agreement] की एक प्रति माँगी थी, जो आपने नहीं दी, यहाँ तक कि बहुत अफ़सोस से कहना पड़ता है कि इस देरी के लिए भी आप अपनी पूज्य माताजी को बीच में ले आए। एक सामान्य प्रति बनाने के लिए एक प्रकाशक को कितना वक्त चाहिए था ये आप मुझे समझा दीजिए। जब कई सालों बाद बिना पते और बिना शर्तों पर सहमति के यह प्रारूप(एग्रीमेंट) आया, तो स्वाभाविक है मैंने इसे स्वीकार नहीं किया। आप चाहते थे कि मैं बिना लिखित समझौते के रॉयल्टी स्वीकार कर लूँ, जैसा कि आमतौर पर बेईमान प्रकाशक चाहते हैं।

सर, इस बारे में भी ज्ञान-वर्धन करें कि 2016 से लेकर 2019 (जब मैंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया) तक आपके और मेरे बीच में क्या ख़त-किताबत हुई? महोदय, आप कह रहे हैं कि एक लेखक होने के नाते मुझे वह रॉयल्टी नहीं मिली जिसका न्यायसंगत हिसाब मैंने आपको दिया था और मैं कम में ही मान गया। मेरे पास और क्या रास्ता था? सालों साल आपसे लड़ने के लिए वकीलों की फ़ीस कहाँ से लाता। एक छोटा और साधारण लेखक, प्रकाशकों की सबसे बड़ी खासियत-गुंडागर्दी से कब तक लड़ सकता था? यहाँ तो मेरा सामना एक ऐसे प्रकाशक से था जो जल्दी अमीर बनना चाहता था और एक पाखण्डी कम्युनिस्ट भी था। इतिहास के एक छात्र के रूप में, मैं ऐसे सैकड़ों उदाहरण जानता हूँ कि एक पतित कम्युनिस्ट का पतन एक गैर-कम्युनिस्ट पतित व्यक्ति से कहीं ज़्यादा भयावह होता है, क्योंकि उसे पता होता है कि उसके पापों का कोई स्वर्गीय दंड नहीं मिलने वाला।

पंडित जी, कृपया अपने चाहने वालों को बताएं कि आपने अपने ‘दखल प्रकाशन’ के बैनर तले प्रकाशित 47 पुस्तकों के लेखकों में से किस-किस को कितनी-कितनी रॉयल्टी दी!

साहब! आपके लिए कानूनी कार्यवाही कमज़ोर और असहाय लोगों को डराने के लिए है। मेरे जैसे लेखक के लिए न्याय पाने के लिए कानूनी लड़ाई ज़रूरी है। मुझे आरएसएस और असामाजिक तत्वों की ‘लीगल टीमों’ से निपटने की आदत है और मैं आपकी ‘लीगल टीम’ का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। कृपया मुझे बताएँ कि आपकी ‘लीगल टीम’ पुलिस के साथ मुझे गिरफ्तार करने कब आ रही है ताकि मैं अपनी लोकेशन बता सकूँ?

मैं हबीब जालिब साहब का एक शेर जो इस मामले में भी प्रासंगिक है साझा करना चाहता हूँ:

“तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था,
उसको भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था.”

महोदय, आपको भी सभी धनकुबेरों जैसी ही गलतफहमी है कि कोई भी आपको चुनौती देने की हिम्मत नहीं करता, सभी पराजित हो चुके हैं। सच तो यह है कि आपके कम्युनिस्ट समय के दोस्त दो वजहों से चुप रहते हैं- पहला, जैसा कि एक फ़ारसी कहावत है: नुक़सान-ए-माया/शामातात हमसाया (अपना नुकसान दूसरों के साथ साझा करके आप केवल पड़ोसियों का उपहास ही आमंत्रित करते हैं), उन्हें यह डर वाजिब है कि आपका पर्दाफ़ाश करने से कम्युनिस्ट विरोधियों को यह फैलाने का एक और अवसर मिल जाएगा कि सभी कम्युनिस्ट एक जैसे होते हैं। दूसरा- वे हमेशा, जीवित रहने और अपने परिवारों का वफ़ादारी से पालन-पोषण करने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। उनके पास अपना कोई निजी ‘कानूनी दल’, निजी नौकर या अमला नहीं होता है। असहाय लोगों की ख़मोशी को आप उन की कमज़ोरी न समझें, अगर ऐसा करेंगे तो मैं यह ज़रूर बताना चाहता हूँ की सिर्फ़ मायूसी ही आप के हाथ लगेगी। इतने वर्ष इस क़ानूनी लड़ाई और अपमान की पीड़ा को अपने ह्रदय में रखा और मैंने कभी इसका ज़िक्र अपने मित्रों में भी नहीं किया, सिर्फ़ इस भय में कि इससे सिवाय जगहसाई के और कुछ हासिल नहीं होगा। लेकिन अपने मित्रों की इसी अच्छाई का लाभ इतने वर्षों तक आप लेते रहे।

आख़िर में यह कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा कि आप निजी, सामाजिक और राजनैतिक जीवन में समग्र-रूप से पाखंडी और अहंकारी जीव हैं। आज दौलत की रेलपेल वाले जिस रास्ते पर आप निकल पड़े हैं वह केवल विनाश की ओर ले जाता है। आप जिस तरह की feudal, Corporate और शासकों की भाषा लिख रहे हैं और धमकियाँ दे रहे हैं, उससे साफ़ पता लग जाता है कि आप आज कल किन की संगत में हैं। आपकी लीगल टीम की प्रतीक्षा में,

शम्सुल इस्लाम

[Note: I did not know about the FB post of Sir Ashok Pande addressed to me. I do not think I was tagged for this. Few friends brought it to my notice on July 9. I am a bit late in responding as that day I was busy performing in support of the all India workers bandh.]


अशोक कुमार पांडेय-

प्रिय शम्सुल इस्लाम… मुझसे रिक्वेस्ट करके यह किताब आपने हिंदी अनुवाद करवाई थी और फिर उसे प्रकाशित करने के लिए कहा था। इसके कवर पर आपका ही नाम है, भीतर अनुवादक के रूप में मेरा नाम।

अंग्रेज़ी में इस किताब का बड़ा हिस्सा गोलवलकर की मूल किताब We or Our Nationhood Defined का कॉपी पेस्ट था जिस पर आपने दूसरे हिस्से में टिप्पणी लिखी है। मैंने दोनों का ही हिंदी अनुवाद किया था।

आप जानते हैं कि मैंने आपको 30500/ रॉयल्टी देने का प्रस्ताव किया था। यह आपने अपनी नोटिस में भी माना था। आप कोर्ट में गए, 1,25000 की रॉयल्टी का दावा किया। आपने जो नोटिस भेजी आपके पास भी होगी।

कोर्ट में आप मुक़दमा चलाने की जगह समझौते पर राज़ी हुए। समझौते में स्पष्ट लिखा है कि मैं आपके द्वारा लगाए सारे आरोपों को अस्वीकार करता हूँ। समझौते में आपने मेरे द्वारा प्रस्तावित रू 30,500 स्वीकार किये और हम दोनों ने कोर्ट के समक्ष रजिस्टर्ड दस्तावेज़ में इस पर सार्वजनिक रूप से कुछ न बोलने का वादा किया। मैं यह सवाल नहीं पूछूँगा कि आप उसी राशि पर क्यों राज़ी हो गए जो आपको देने का प्रस्ताव मैं नोटिस/मुक़दमें के काफ़ी पहले कर चुका था।

मेरे द्वारा किसी गाली गलौज या अभद्र व्यवहार का ज़िक्र तो आपके उस नोटिस में भी नहीं था। फिर आपने यह झूठ सार्वजनिक रूप से क्यों लिखा? आपने न केवल एक झूठ को समर्थन दिया बल्कि मुक़दमे की शर्त तोड़ी जो असल में Contempt of Court तथा Breach of Trust है।

आपने कोर्ट का ड्राफ्ट डॉक्यूमेंट सार्वजनिक करवाया, जबकि यह अंतिम नहीं है और इस पर हस्ताक्षर भी नहीं है। आख़िर समझौते का हस्ताक्षरित और रजिस्टर्ड अंतिम प्रपत्र क्यों सार्वजनिक नहीं किया? ज़ाहिर है यह मुझपर झूठा आरोप लगाने तथा बदनाम करने की साज़िश है। मेरे खिलाफ़ चले झूठे अभियान में आप इंस्ट्रूमेंट बने जो असल में अनैतिक और झूठा तो है ही, ग़ैर क़ानूनी भी है।


एक और झूठ। जब इतिहास की बहस में हारे तो झूठ का सहारा लेने लगे। कड़कड़दूमा कोर्ट में केस चला था। अंत में शमसुल-इस्लाम ने समझौता किया। Wajeeh Shafiq हमारे वकील थे।

एक और बात बता दूँ- किताब का अनुवाद मैंने किया था जिसमें 70% गोलवरकर की ओरिजिनल किताब ‘We or Our Nationhood Defined’ का सीधा अनुवाद मैंने किया था, उसे लिखने में शमसुल की कोई भूमिका नहीं थी। तीस प्रतिशत उनकी टिप्पणी थी। उसका अनुवाद भी मैंने किया था।

कोर्ट की पूरी कहानी किसी ने इन्हें झूठी बताई है और उसके सहारे उछल रहे हैं, हिन्दी वाली किताब कम से कम देख तो लेते भई! जो रॉयल्टी मै दे रहा था उससे शमसुल संतुष्ट नहीं थे तो कोर्ट गए, कोर्ट ने कहा समझौते को और फिर उसी रॉयल्टी पर समझौता किया।

कोर्ट में मेरी हार का दावा किया है न? तो हार का सबूत लाओ। कोर्ट ऑर्डर लेके आओ। फ़र्ज़ी कहानियाँ बनाने से क्या होगा? चाहो तो शम्सुल जी से मांग लो।

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1 Comment

1 Comment

  1. Padmasambhava Shrivastava

    July 11, 2025 at 8:01 am

    लेखकीय पक्ष का प्रतिरोध स्पष्ट है। प्रकाशकीय खाते में मात्र दावों की जानकारी दी गई है, जबकि लेखक की मौलिक रचनात्मक कार्य को अपहृत किए जाने की बौद्धिक तिकड़म को समझने में देर नहीं लगती है।

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