दया शंकर शुक्ल सागर-
मेरी समझ से ये आपरेशन सिंदूर तब तक जारी रहना चाहिए था जब तक भारत सरकार चुन-चुन कर एक-एक आतंकी को मारने का अपना वादा पूरा नहीं करती। इसमें एक साल लगे या पचास साल। पाकिस्तान या तो अपने सभी आतंकियों को भारत के हवाले करे या हर साल, हर महीने, हर घंटे, हर लमहे भारत की फौज के हमले की आशंकाओं के आतंक के साए में अपना देश चलाए। उजड़ी हुई मांगों के लाल सिंदूर का बदला तभी पूरा होता। लेकिन क्रूर राजनीति की बंजर जमीन पर ऐसी भावुकता भरी बातें बेमानी हैं।
खैर आप माने न माने असल विश्वगुरू की भूमिका में तो डोनाल्ड ट्रंप हैं। कल सारी लंबी रात वे भारत और पाकिस्तान को मनाते रहे। हालांकि वे जानते थे कि दोनों उनकी बात मानने को तैयार बैठे हैं। और बेहद नाटकीय ढंग से युद्ध विराम का एलान भारत और पाकिस्तान से पहले ही अमेरिका ने कर दिया। सच पूछिए तो पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमले का ये सबसे सही व सटीक वक्त नहीं था।
लेकिन विपक्ष के सेंकेंड लाइन के नेताओं और भारतीय मीडिया ने देश में युद्धोन्माद का ऐसा वातावरण तैयार किया कि सरकार को भी लगा अब कुछ कर के दिखा देना चाहिए। युद्ध से जुड़ी तमाम किताबों में पलटवार के दो सटीक तरीके लिखे हैं। एक हमले के तुरंत बाद, त्वरित जवाबी हमला करना ताकि दुश्मन को कुछ सोचने समझने का मौका ही न मिले। दूसरा तरीका है बगुले की तरह पूरे धैर्य के साथ घात लगा कर बैठना और दुश्मन जब बिलकुल बेफिक्र हो, उस पर पूरी ताकत के साथ हमला कर उसे मिटा देना। सात मई के हमले में इन दोनों विकल्पों को अनदेखा किया गया।
नौ आतंकी ठिकाने के ढांचे जरूर तबाह हो गए लेकिन सारे आतंकी बच निकले क्योंकि उन्होंने वे ठिकाने बहुत पहले ही छोड़ दिए थे। मैंने सीएनएन न्यूज में मुरीदके का एक फुटेज देखा जिसमें हमले में घायल हाथ में प्लास्टर बांधे एक लड़का एक लोकल रिपोर्टर को बेहद मासूमियत से बाइट दे रहा था कि हम सबको मालूम था कि यहां हमला होगा। क्योंकि यहां जेहादी ट्रेनिंग होती है। इस मरकज यानी केन्द्र में पहले ही सबकी छुट्टी कर दी गई थी। सबको वहां से हटा दिया गया था। कुछ आतंकी, जो कुछ ज्यादा ही बेफिक्र व बेपरवाह थे, जिन्हें लगा भारत कुछ नहीं करेगा, वे गफ़लत में मारे गए।
मरने वालों में पांच कथित बड़े आतंकियों के नाम बड़े प्रयोजित ढंग से मीडिया के जरिए सामने लाए जा रहे हैं। इसमें सच्चाई कितनी है खुदा जाने। बाद में उनके ताबूतों को पूरे राजकीय सम्मान से जमीदोज किया गया। आज देश को इंदिरा गांधी की याद आ रही है जिसने अमेरिका को ठेंगा दिखा कर पाक को ऐसा सबक सिखाया कि वह आज तक नहीं भूल पाया।


