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उत्तराखंड

रुखसत : कंधे पर पहाड़ लिए चले गए भवानी भाई

किसी भी व्यक्ति का दुनिया से रुखसत हो जाना उसके आत्मीय जनों के लिए तो दुखद एवं पीड़ादायक होता ही है लेकिन ऐसा व्यक्ति जो समाज की बेहतरी में योगदान दे सकते है, उसका जाना पूरे समाज की क्षति होता है. श्रीनगर (गढ़वाल) से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘रीजनल रिपोर्टर’ के सम्पादक भवानी शंकर थपलियाल समाज और आम जन की बेहतरी के लिए सोचने वाले ऐसे ही व्यक्ति थे. 17 फरवरी 2015 की सुबह उनका देहावसान उनके परिजनों के लिए ही नहीं, पूरे समाज और ख़ास तौर पर उत्तराखंड के प्रति चिंतनशील समुदाय के लिए एक बड़ा आघात रहा. उस आघात ने उसी दिन उनके पत्रकार पिता डा.उमाशंकर थपलियाल के प्राण भी ले लिए थे.

किसी भी व्यक्ति का दुनिया से रुखसत हो जाना उसके आत्मीय जनों के लिए तो दुखद एवं पीड़ादायक होता ही है लेकिन ऐसा व्यक्ति जो समाज की बेहतरी में योगदान दे सकते है, उसका जाना पूरे समाज की क्षति होता है. श्रीनगर (गढ़वाल) से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘रीजनल रिपोर्टर’ के सम्पादक भवानी शंकर थपलियाल समाज और आम जन की बेहतरी के लिए सोचने वाले ऐसे ही व्यक्ति थे. 17 फरवरी 2015 की सुबह उनका देहावसान उनके परिजनों के लिए ही नहीं, पूरे समाज और ख़ास तौर पर उत्तराखंड के प्रति चिंतनशील समुदाय के लिए एक बड़ा आघात रहा. उस आघात ने उसी दिन उनके पत्रकार पिता डा.उमाशंकर थपलियाल के प्राण भी ले लिए थे.

पिछले सात वर्षों से वे श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखंड से ‘रीजनल रिपोर्टर’ नामक मासिक पत्रिका निकाल रहे थे. हालांकि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में पत्र-पत्रिकाओं की जैसे बाढ़ ही गई है. इनमें से अधिकाँश का नाम भी आम लोग तो क्या पढ़ने-लिखने से वास्ता रखने वाले लोग भी शायद ही जानते हों. जो पत्र-पत्रिकाएं बाजार में दिख भी रही हैं, उनमें से भी एक अच्छा-खासा हिस्सा विज्ञापन पचाने और धंधेबाजी के लिए ही पत्र-पत्रिकाओं के कारोबार में है. खाने-कमाने के लिए पत्र-पत्रिका निकालना है भी सरल काम. लेकिन सरोकारों की पत्रकारिता करना किसी भी दौर में कठिन रहा है और इस बाजारवाद के समय में तो यह बेहद दुष्कर कार्य है. भवानी शंकर थपलियाल ने यह दुष्कर कार्य अपने कन्धों पर खुद ही लिया था. 

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बीते सात वर्षों में वे इसे निभाते भी रहे. रीजनल रिपोर्टर के हर अंक के एक-एक पृष्ठ को बनाने में वे स्वयं को झोंक कर लगा देते थे. किसी भी स्टोरी से जुड़े हुए दस्तावेज और तस्वीरों  का बड़ी कुशलता से वे इंतजाम कर लेते थे. भ्रष्टाचार या कानून के उल्लंघन से जुड़ी ख़बरें करने में ये खतरा रहता है कि वो सनसनीखेज हो जाए. लेकिन इस तरह की तमाम ख़बरें प्रकाशित करते हुए भी उनका हमेशा जोर रहा कि विषय की गंभीरता कायम रहनी चाहिए. उसमें सस्तापन या सनसनी नहीं होनी चाहिए. इस गंभीरता को कायम रखने के लिए ही दस्तावेजों और फोटोग्राफों की जरुरत होती है, जो उनके पास हर खबर के लिए होते थे. श्रीनगर जलविद्युत परियोजना की निर्माता कंपनी-जी.वी.के. द्वारा किस तरह भारत सरकार द्वारा काम पर लगाए गयी रोक की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, इसको उन्होंने रीजनल रिपोर्टर के अगस्त-सितम्बर 2012 के अंक में “कानून पर कालिख पोतती कंपनी” शीर्षक से कवर स्टोरी बनाया. मेरे  साथ शुरूआती आइडिया पर चर्चा करने के बाद उन्होंने इसे लिखने को कहा. इस स्टोरी के साथ जो फोटो उन्होंने लगाईं, वे उनके द्वारा घटनाओं पर पैनी निगाह बनाए रखने और उनका निरंतर दस्तावेजीकरण करने की मिसाल है. 

दरअसल उक्त रिपोर्ट में मैंने लिखा था कि परियोजना निर्माण कार्य पर रोक लगने के बाद जी.वी.के. कंपनी निर्माण कार्य जारी रखे हुए थी. भवानी भाई ने रिपोर्ट के साथ परियोजना के बैराज के निर्माण के फोटो लगाये जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त थे कि भारत सरकार की रोक से पहले बैराज का कोई अस्तित्व नहीं था और रोक के दौरान ही बैराज निर्माण हुआ था. जिस समय हमने स्टोरी प्लान की और जब फोटोग्राफ लिए गए, उसमें महीनों से लेकर एक साल तक का समयांतराल है. जाहिर सी बात है कि एक साल पहले फोटो किसी स्टोरी के लिए नहीं लिए गए थे. वे अपने आस-पास की घटनाओं पर निरंतर दृष्टि रखते और उनके दस्तावेजीकरण करते रहते थे, ये उसका उदाहरण है. ऐसे उदाहरण कई हैं.

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रीजनल रिपोर्टर भवानी भाई का मानस शिशु यानि ब्रेन चाईल्ड था. इसलिए उसके हर पहलु पर वे बारीकी से निगाह रखते थे. उसका हर अंक का उत्तराखंड के सरोकारों से सीधा जुड़ाव रहे, इसके लिए वे सतत चिंतित और विचारशील बने रहते थे. उसके एक-एक पेज को बेहतर बनाने के लिए वे 12 घंटे से 18 घंटे तक खपाते थे.

भवानी शंकर थपलियाल एक स्व निर्मित यानि सेल्फ मेड व्यक्ति थे. उनके व्यक्तित्व के निर्माण में औपचारिक शिक्षा से ज्यादा उनके स्वाध्याय का योगदान था. छात्र जीवन में राम मंदिर के उन्मादी दौर के बीच ए.बी.वी.पी. से उनका संपर्क हुआ था. सक्रियता पूर्वक वे ए.बी.वी.पी. और आर.एस.एस. के साथ रहे भी. लेकिन यह उनकी सीखने समझने की जिज्ञासु प्रकृति ही थी, जो उनको धुर दक्षिणपंथी राजनीति की सक्रियता से जनपक्षीय विचारधारा तक लेकर आई और वामपंथ से कई असहमतियों के बावजूद उनकी वामपंथ और वामपंथियों से मित्रता हुई. उनकी इसी अर्जित जनपक्षधरता का नतीजा था कि उत्तराखंड राज्य के जल, जंगल, जमीन, कृषि, रोजगार जैसे तमाम मुद्दे उनकी पत्रिका में स्थान पाते रहे. इन मुद्दों पर लिखने-बोलने वालों में वामपंथी नेता कार्यकर्ता बड़ी तादाद में हैं. इसलिए उनसे वे लिखवाते रहे. नतीजतन जिस आर.एस.एस. और उसके आनुषांगिक संगठन से उन्होंने सार्वजनिक जीवन की यात्रा शुरू की थी, वही निरंतर वामपंथी होने और वामपंथियों की पत्रिका निकालने का उलाहना गाहे-बगाहे देते रहे. उनके साथ निकटता और प्रगाढ़ता होने के नाते, मैं यह बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ कि वे वामपंथी नहीं थे. लेकिन एक बेहतर दुनिया और बेहतर समाज बनाने का ख्वाब उनका भी था और यही ख्वाब वामपंथियों के साथ उनका मिलन बिंदु भी था.

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विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोगों के साथ बहस-मुबाहिसे में जा कर और चिंतन-मनन करते हुए उन्होंने स्वयं को एक जनवादी व्यक्ति के स्तर तक उन्नत किया था. हर विषय पर उनके पास अपने कुछ विचार होते थे और सामने वाले से बात-बहस करके नए विचार तक वे पहुँचते रहते थे. बात-बहस की यह प्रक्रिया सामने वाले को भी कुछ सिखाती थी और उनके विचारों के तरकश को भी नए तीरों से लैस करती थी. चीजों, घटनाओं, व्यक्तियों, विचारों को निरंतर देखने-परखने की उनकी प्रवृत्ति का उनके व्यक्तित्व के विकास में बड़ा योगदान था. निरंतर सीखते हुए ही वे विविध विषयों पर सोचते रहते. सिर्फ पत्रिका निकालना ही उनका जुनून नहीं था. बल्कि हर विषय की समझ विकसित करते रहना भी उनका शौक और प्रतिबद्धता दोनों ही था. पहाड़ में कृषि का मजबूत मॉडल खड़ा हो, ये उनकी चिंता का विषय था तो जैव-विविधता भी उनके निरंतर सोचने-समझने की प्रक्रिया का अंग था. ऊर्जा के वैकल्पिक मॉडल विकसित हों, इस पर भी वे निरंतर सोचते रहते थे. दुनिया भर में चल रही वैज्ञानिक कोशिशों के हवाले से वे बताते रहते कि कैसे ऐसी कार बनाना मुमकिन है जो पेट्रोल-डीजल  के बजाय हवा से चले. 

श्रीनगर(गढ़वाल) जैसे दूरस्थ विकसित होते पहाड़ी नगर में रहते हुए विज्ञान और तकनीकी में दुनिया भर हो रही नयी खोजों और हलचलों की सबसे ताजा जानकारी उनके पास रहती थी.मेरे जैसे कई लोगों का इन्टरनेट से पहले-पहल परिचय करवाने वाले व्यक्ति भवानी भाई ही थे और इन्टरनेट से जुडी तमाम दिक्कतों का हल खोजने का सही ठिकाना भी वे ही थे. कंप्यूटर पर डिजायनिंग तो ऐसा पहलू जिसमें उनका कोई सानी नहीं था. परचा-पोस्टर से लेकर पत्रिका तक का डिजाईन वे बेइन्तहा डूब कर करते थे और इस प्रक्रिया में जो सामने उभर कर आता वो डिजाईन नहीं एक तरह का नया सृजन ही होता था. सत्ता के बरक्स जनता की मजबूती के वे बड़े पक्षधर थे और कहते कि संसाधनों और क्षमताओं से जनता को इतना मजबूत कर दिया जाए कि सरकार पर उसकी निर्भरता ख़त्म हो जाए और सरकार जनता के सामने झुकने पर मजबूर हो जाए. यह काल्पनिक किस्म का विचार है पर जनता की सुदृढ़ता की कामना,इस काल्पनिकता में निहित है. 

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जब भवानी भाई की इतनी तारीफ़ की जा रही है तो यह उनको कमियों और दोषों से मुक्त बताने की कोशिश कतई नहीं है.मनुष्य होता है तो जाहिर सी बात है कि उसमें कमियां भी होंगी.सब चीज को बेहद प्रबंधित तरीके से करने के बावजूद वे अनियमित जीवन शैली और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह थे और उसी का शिकार भी बने.रीजनल रिपोर्टर पर अपने तरह पूरा वक्त लगाने वालों की टीम वे न बना सके. रीजनल रिपोर्टर का टैग लाइन है -“सरोकारों से साक्षात्कार”, पीछे पलट कर देखने से ऐसा लगता है कि सरोकारों से साक्षत्कार करवाने का यह पूरा जिम्मा उन्होंने नितांत व्यक्तिगत बना लिया था,जिसमें बाकियों की सहभागिता एक सीमा तक ही थी.

भवानी भाई के गुणों और विशेषताओं का जो विवरण ऊपर दिया गया है, उसका मकसद भी उनको जन्मजात प्रतिभाशाली सिद्ध करना नहीं है. बल्कि इसके ठीक उलट, उनकी निरंतर सीखने की प्रवृत्ति ने उनके व्यक्तित्व को निखार कर जिस जगह पहुंचाया, उस जगह से पलट कर यदि वे स्वयं भी पीछे देखते तो पाते कि उन्होंने लगभग एक सौ अस्सी डिग्री की यात्रा कर ली थी. मनुष्य का निर्माण एक सतत, निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. कोई बहुत खाद पानी के बाद भी नहीं फूलता और कोई थोड़ी सी रौशनी से ही अपने लिए रास्ता तलाश लेता है. भवानी भाई जैसे विकसित हुए थे, वो भी उसी प्रक्रिया का नतीजा थे, मनुष्य के निर्मित होने, विकसित होने और उन्नत होने की प्रक्रिया. उनके आकस्मिक रूप से चले जाने में यह अफ़सोस भी गहरे तक शामिल है कि भवानी भाई को एक बेहतर मनुष्य बनाने वाली वह प्रक्रिया पूरी तरह धराशायी हो गयी. 

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(लेखक ई-मेल संपर्क : [email protected])

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