Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

वेब-सिनेमा

लल्लनटॉप पर ख़ुदा के अस्तित्व को लेकर लाइव बहस : जावेद अख्तर और मुफ्ती ने अपने अपने तर्क दिये! देखें वीडियो

कल रात जावेद अख़्तर और मौलवी शमाइल नदवी
साहब की डिबेट देखी । अल्लाह के अस्तित्व पर । अल्लाह की जगह भगवान, गॉड या और किसी परम शक्ति को भी रख सकते हैं । सौरभ द्विवेदी को बधाई कि इस बेहद नाज़ुक विषय पर इतनी अच्छी बहस कराई । हालाँकि कि कोई हल नहीं निकला । बहस क़ायम है, नए सवाल ज़रूर पैदा हुए, सबसे बड़ी कामयाबी यह कि लोग इस विषय पर खुले मंच पर बहस करने को तैयार हुए कि अल्लाह हैं या नहीं । विचार मंथन होते रहना चाहिए । बाक़ी मैं तो आस्तिक हूँ । रीति, रिवाज परंपराओं के बीच पला बढ़ा । अपनी आस्था ख़ुद तक सीमित रखी, किसी पर थोपी नहीं और सुकून में रहा पर दूसरे के विचारों और आस्तिकता या नास्तिकता दोनों को कभी ग़लत नहीं माना।

-सुधीर मिश्रा


रमेश कुमार-

लल्लनटॉप के सौरभ द्विवेदी ने मॉडरेटर के रूप में इस बहस को आयोजित कराया! जावेद अख्तर और मुफ्ती ने अपने तर्क दिये! मुफ्ती बढ़िया तैयारी के साथ आये थे लेकिन धार्मिक माइंड सेट और वर्ल्ड व्यू की अपनी एक सीमा है, सबकुछ अक़ीदा पर रुक जाता है! नास्तिकता आपको रेशनल बनाती है चीजों को मनाने-अस्तित्व का आधार उपलब्ध कराती है!

कुल मिलाकर आस्था/अक़ीदा और विश्वास में बुनियादी फर्क हैं और मानवता की बेहतरी तर्क, विवेक और रेशनल अप्रोच से ही संभव है! घिसे पिटे तर्को को सुनने के आदी लोंगो को जावेद साहब को समझना आसान नही हैं!

उक्त बहस में प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल और गौहर रजा साहब के सवाल महत्वपूर्ण रहे ! इस तरह की बहसों के लिए हमारे देश मे अभी जगह है,मेरे लिए यही सुकूनदायक है!
आप सुनिए दिमाग की खिड़की खुलेगी,

शानदार! इत्मीनान से हों तो देख लीजिए।

ख़ुदा है या नहीं! Does God Exist?

मैं तो जावेद अख़्तर साहब को पसंद करता हूँ लेकिन एक मित्र बता रहे थे कि भारत के “भक्त संप्रदाय” के भी ढेर सारे लोग आज इस डिबेट में मन ही मन जावेद साहब के साथ रहे ताकि ख़ुदा का न होना साबित हो जाए। वहीं, कुछ भक्त इसलिए मौलवी साहब के समर्थन में थे क्योंकि वे भी अनीश्वरवादियों को पसंद नहीं करते इसलिए पहले बाहरियों को हरा लें, बाद में “भगवान-ख़ुदा में कौन असली” वाला बहस कर लिया जाएगा, की रणनीति लगाए थे।

कुल मिलाकर डिबेट बहुत शिक्षाप्रद है।

ये ख़ुदा के होने न होने के समस्त तर्कों को सामने ले आता है।

मैंने जब लल्लनटॉप के इस वीडियो को देखना ख़त्म किया तो चार लाख दर्शक मेरे साथ देख चुके थे।

-यशवंत सिंह


विजय सिंह ठकुराय-

आज #Lallantop ने जावेद अख्तर साहब और किसी मौलाने के मध्य एक डिबेट का आयोजन किया। विषय था – क्या ईश्वर है? डिबेट के दौरान पूरे वक़्त आठवीं पास मौलाना “Infinite Regress” का हवाला देकर ईश्वर अथवा खुदा के अस्तित्व को प्रमाणित करने का प्रयास कर रहा था। अब बेचारे जावेद अख्तर साहब नॉन-टेक्निकल आदमी हैं तो गच्चा खा गए। इसलिए एक विज्ञानी होने के नाते मैं लोकहित विमर्श के इस विषय पर मौलाने का थोड़ा ज्ञान बढाना चाहूंगा।
.
Infinite Regress अर्थात हिंदी में “अनावस्था तर्कदोष” बेसिकली “कार्य-कारण” सिद्धांत पर आधारित एक आस्तिक आर्गुमेंट है, जिसके अनुसार – संसार का हर कार्य किसी अन्य कारक पर निर्भर करता है, तो प्रथम कारक अर्थात “The First Cause” कौन हुआ, अगर ईश्वर नहीं?
.
सबसे पहली समझने वाली बात यह है कि संसार के सभी कार्य कुछ भौतिक कणों अर्थात क्वार्क, इलेक्ट्रान, न्यूट्रिनो इत्यादि की क्रिया-प्रतिक्रिया से सम्पन्न होते हैं। ये सभी कण मूल रूप में ऐसी तरंगे हैं, जो स्पेस-टाइम नामक ब्रह्मांड के मूल फैब्रिक में उत्पन्न होती हैं। ब्रह्मांड का कोई भी कार्य, सरल हो अथवा जटिल, इस स्पेस-टाइम नामक एनर्जी फील्ड से स्वतंत्र न होकर, इसके भीतर ही घटित होता है।
.
यह स्पेस-टाइम बिग-बैंग के समय पैदा नहीं हुआ था, बल्कि 14 अरब वर्ष पूर्व हमारे हिस्से का स्पेस-टाइम संकुचित रूप में था। यानी बिग-बैंग का अर्थ “ब्रह्मांड की शुरुआत” से नहीं, बल्कि हमारे पॉकेट यूनिवर्स में मौजूद स्पेसटाइम के फैलाव भर से है।

विज्ञान यह प्रमाणित कर चुका है कि स्पेसटाइम नामक इस एनर्जी फील्ड को न तो पैदा किया जा सकता है और न नष्ट नहीं किया जा सकता है। अर्थात – यह ब्रह्मांड और प्रकृति शाश्वत है। बस इसका रूप बदलता है। अब जो चीज श्वाश्वत हो, उसे बनाने के लिए किसी निर्माता की क्या जरूरत?
.
वास्तव में “इनफिनिट रिग्रेस” जटिल से सरल की ओर सृष्टि का मूल तलाशने का क्रम है, जो स्पेसटाइम पर पहुंच कर रुक जाना चाहिए क्योंकि स्पेसटाइम स्वयं एक मौलिक और सरलतम ईकाई है। दूसरा – यह एनर्जी फील्ड अनंतकाल से अस्तित्व में है। अब अगर आप कहें कि इस स्पेसटाइम का कोई निर्माता है तो यह अतार्किक और विज्ञान-विरोधी बात है क्योंकि यह बात विज्ञान की मूल फाउंडेशन है कि ऊर्जा को न बनाया जा सकता है, न नष्ट किया जा सकता है।

इसलिए अगर निर्माता का अस्तित्व साबित करना है तो ऊर्जा को नष्ट कर के दिखाओ अथवा बना के दिखाओ? नहीं कर सकते तो मान लो कि यह कायनात ही संसार की परम सत्ता है। इसे बनाने के लिए किसी खुदा या ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं। धन्यवाद।

P.S – मौलाने को आठवी पास मैंने इसलिए कहा क्योंकि नवीं क्लास में ऊर्जा संरक्षण का नियम पढा दिया जाता है।


आर पी विशाल-

जावेद अख्तर फिर निशाने पर हैं। ज़्यादातर इस्लाम के मानने वाले उनके ख़िलाफ़ हैं क्योंकि वह स्वयं मुस्लिम रहे हैं फिर हिंदू दक्षिणपंथी भी उनके ख़िलाफ़ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि जावेद अख्तर अंदर से तो एक मुस्लिम ही है इसलिए वो मुस्लिम धर्मगुरुओं के सामने थोड़े नर्म रहते हैं और थोड़े–थोड़े सभी खिलाफ हैं क्योंकि आख़िर ईश्वर, अल्लाह, गॉड, भगवान, देवी, देवता इत्यादि के वजूद पर भी कोई प्रश्नचिन्ह उठाते हैं क्या?

खैर! यह तो सत्य है कि जावेद जी में अब वह ऊर्जा नहीं रही जिसके लिए वो जाने जाते हैं लेकिन उनके तर्क किसी भी आस्तिक से अधिक प्रासंगिक हैं। मैं इस डिबेट में शुरू में जुड़ चुका था और लगभग पूरी डिबेट देखी। इस्लामिक स्कॉलर नदवी एक पढ़ा–लिखा युवक है और आधुनिक पढ़ाई को उन्होंने कैसे धर्म तथा ईश्वर तक जोड़ने का प्रयत्न किया वह भी लगभग ठीकठाक प्रयास था लेकिन असफल भी था।

मैं हैरान इस बात से था कि जो नीचे समर्थक थे वो अधिकांश नादवी के समर्थन में वहां आए थे और गज़ब यह कि डिबेट अभी शुरू भी नहीं हुई थी भीड़ ने अपना फैसला देना शुरू कर दिया था। यह आलम अभी भी जारी है चाहे वह प्रगतिशील मुस्लिम हों, रूढ़िवादी मुस्लिम हों, लेफ्ट, राइट मुस्लिम हों या फिर कोई भी हों उन्होंने जावेद अख्तर को खूब गरिया दिया और नादवी को विजेता करार दे दिया जबकि उन्होंने पूरी डिबेट सुनी, समझी नहीं है।

इसलिए धर्म की मुख्य निष्कर्ष उस आचरण में होता है जिसके लोग अनुयाई, समर्थक या हितैषी होते हैं। यदि नदवी की जगह कोई अन्य धर्म का व्यक्ति होता तो समर्थन, विरोध का अनुपात लगभग बराबर का होता यह भी समझने वाली बात है। यह भी जानना जरूरी है कि यह डिबेट इस्लाम पर नहीं अल्लाह, खुदा, ईश्वर,भगवान, गॉड जिसे सभी धर्मों के मानने वाले अपना सर्वशक्तिमान मानते हैं उसके संदर्भ में थी। फिर भी यह डिबेट इस्लाम बनाम अन्य तक ही पहुंची है।

कुलमिलाकर बात यह कि डिबेट और भी होती रहनी चाहिए क्योंकि हर स्कॉलर अपनी बुद्धिमता से धर्म तथा ईश्वर को परिभाषित करते हैं जबकि विषय तर्क से अधिक तथ्यों और परिणामों का है जो कि नदारद है। कभी ज़ाकिर नाइक, सद्गुरु, श्री श्री रविशंकर इत्यादि भी ऐसी डिबेट कर चुके हैं और उनके मानने वाले आज भी मानते हैं लेकिन आधुनिक धर्मों से पहले कई लोग ऐसी डिबेट में मारे जा चुके हैं और फिर कई धर्म उनके ईश्वर भी समय के साथ स्वयं ही मर चुके हैं।

संभव है कई वर्षों बाद कुछ अन्य धर्म, ईश्वर भी अस्तित्व में आए और वह भी सबसे पौराणिक होने का दावा करे। कुछ संभव है भविष्य में हों ही ना लेकिन प्रश्न तब भी बाकी ही रहेगा कि क्या ईश्वर है या नहीं। इसके लिए सब लड़ रहे होंगे। मानने वाले कहेंगे कि है और ना मानने वाले कहेंगे कि नहीं है। कुछ होंगे जो तब भी जानने की प्रक्रिया में होंगे। वो बाकी कुछ ना जान पाएंगे लेकिन इतना जरूर जान जाएंगे कि धर्म और ईश्वर की कल्पना ना होती तो यह दुनिया और भी सुंदर हो सकती थी।

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन