यशवंत सिंह-
हरदोई का भाग्य कब जागेगा? नरेश अग्रवाल ने हरदोई को विकसित नहीं होने दिया। साफ़ साफ़ आरोप लगाते हैं हरदोई वाले। न मेडिकल कॉलेज न इंजीनियरिंग कॉलेज न फैक्ट्री न उद्योग। लखनऊ से सौ किमी करीब ये शहर बहुत पोटेंशियल रखता है लेकिन इसका दुर्भाग्य किसी ने ख़त्म करने की कोशिश नहीं की। जाहिर है, प्राथमिक अपराधी यहाँ के राजनेता हैं। नरेश अग्रवाल को लोग सर्वाधिक इसलिए कोसते हैं क्योंकि उन्होंने सर्वाधिक सत्ता सुख भोगा। खुद का खूब उत्थान किया। पूरा साम्राज्य है इनका। लेकिन हरदोई रोता कलपता रहा।
किसी जिले में कोई एक कायदे का नेता हो जाए तो उस जिले की तक़दीर सँवर जाती है। लेकिन हरदोई को अब भी किसी क़ायदे के नेता का इंतज़ार है।
संजय सिन्हा फ़ेसबुक फ़ैमिली मीट के लिए हरदोई पहुँचने पर सबसे बढ़िया होटलों में शुमार होटल बसंत लीला पहुँचा। दो दिनी प्रवास के दौरान बहुत से लोगों से बातचीत हुई। आजतक मीडिया संस्थान से लंबे समय से जुड़े स्थानीय पत्रकार Prashant Pathak भी इस बात से सहमत दिखे कि हरदोई का अच्छा वक्त आना अभी बाक़ी है। मैंने सर्वोदय आश्रम से लौटते वक्त पत्रकार द्वय Aamir Kirmani और Alok Singh जी से जमीन का रेट पूछा तो बताया कि सर्वोदय आश्रम के आसपास जमीन पाँच लाख रुपये बीघा मिल जायेगा।
इतनी सस्ती जमीन सुन कर लगा क्यों न इधर ही डेरा डाल दिया जाए। अगर हरदोई का विकास हुआ होता तो जमीनों का रेट भी आसमान पर चढ़ा होता।
नरेश अग्रवाल ने हरदोई की मीडिया को भी खूब दबाया धमकाया। तस्वीर में दिख रहे आजतक वाले पत्रकार प्रशांत पाठक ने नरेश अग्रवाल की दबंगई के आगे झुकने से इनकार कर दिया था। ये बड़ी बात है। पत्रकार को साहसी होना ही चाहिए। जीवन के पचास बसंत देख चुके पाठक जी ने अब तक शादी नहीं की है और आगे भी इरादा नहीं है।
हालांकि शादी बियाह निजी मामला होता है लेकिन हम लोगों की पीढ़ी में ये मुद्दा बन जाता था। अब जो नई पीढ़ी है वो शादी को लेकर पजेसिव नहीं है। जब तक किसी के साथ निभे निभाइये नहीं तो अलग हो जाइए। हम दो हमारे दो वाला कॉन्सेप्ट पुराना पड़ चुका है। ऐसे में अब परिवार का कॉन्सेप्ट एकल व्यक्ति तक सीमित हो गया है।
कह सकते हैं बदलते दौर में ssfb Family का कॉन्सेप्ट ज़्यादा प्रासंगिक होगा क्योंकि हर कोई किसी न किसी फॉर्मेट में परिवार चाहता है जहाँ ज़िंदा रिश्ते जीवन को सरस बनाये रख सकें।
पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियां भी पढ़ें…
दीपक पुरी-
जय हो सत्य लिखने के लिए, हरदोई की जनता कब भड़ास निकालेगी यह नहीं पता, जनता भी दोषी है।
मयंक दीक्षित-
बिल्कुल ऐसा ही पाया मैंने हरदोई को, जब-जब वहां गया। वहां के लोग बेचारे दबे मन से नकारते तो हैं लेकिन सच वे भी जानते हैं कि यहां धूल और धूप के अलावा कुछ नहीं है।
फैजी खान-
सहमत नहीं है, कम जानकारी की आपने हरदोई की..मेडिकल कालेज पहली वाली खेप में ही मिल गया था, प्रॉपर वे में नहीं चल रहा वो दीगर..तमाम ऐसी चीजें है जो यूपी के कई जिलों से हमारे यहां बेहतर है. फैक्ट्री की मिसाल तो ये है एक उदाहरण में वेबले जैसी कंपनी यहां मौजूद है.
यूपी के कई जिलों से हरदोई में क्या चीजें बेहतर हैं भाई? प्रॉपर वे में मेडिकल कॉलेज न चले तो फिर मेडिकल कालेज का क्या मतलब? इसे प्रॉपर वे में चलवाने का काम भी राजनेता ही करता है। दिक्कतों को दूर कर फंक्शनिंग स्मूथ करता है। वेबले कंपनी क्या बनाती है? मेरे लिखे का आशय ये नहीं कि कुछ भी नहीं है हरदोई में। ज़रूर कुछ फैक्ट्रीज़ होंगी। लेकिन राजधानी के करीब का शहर होने के कारण जो लाभ मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला। आप पत्रकार अगर हैं तो हरदोई के विकास पर ज़रूर एक रिपोर्ट तैयार करें। चर्चा को आगे बढ़ाया जाएगा। – यशवंत सिंह
प्रशांत पाठक-
सहमत होना भी नहीं चाहिए एक जरा सा कमरा जिला पंचायत में जिसमे पत्रकारों ने अपना निजी पैसा लगाकर सार्वजनिक रूप से पत्रकारों के लिए मांग की थी वो चाभी मिलने के बाद वापस चला गया विकास की बात दूर एक छोटी सी कमरुल्ली तक न पा सके 50 बरस में।
आलोक सिंह-
हरदोई मे कंविन्स की प्रॉब्लम रही सुदूर इलाकों में, व्यापार इसीलिए नहीं पनप पाया, अब सड़कों का जाल सही हो रहा है, व्यापार और लघु उद्योग ही क्रांति ला सकते हैं अब… जमीन 5 लाख नहीं 2.50 लाख में भी है हरदोई के ग्रामीण इलाकों में।
प्रशांत पाठक-
अगर बीस बरस पहले एकाध निजी इंजीनियरिंग कॉलेज या मेडिकल कॉलेज खुल जाते हैं तो शायद हरदोई की जमीन पर ऐसे कॉलेजों की लाइन लग जाती बाहरी बच्चा और उनके परिजन हरदोई आते जाते रहते हैं तो हरदोई की इकोनॉमी निश्चित रूप से बढ़ती, विकास के नाम पर हरदोई में ई-रिक्शा की भीड़ और कभी ई रिक्शा वालों से भी चंदा वसूली यह किसी से छुपी नहीं है बहुत सालों बाद हरदोई से शाहजहांपुर हाईवे देखने को लोगों को मिला जो किसी अचंभे से कम नहीं है ऐसी कल्पना भी लोगों ने नहीं की थी हरदोई से संडीला तक फोरलेन और संडीला से हरदोई टू लेन इसके पीछे किस विकास पुरुष का हाथ था सब लोग जानते हैं कभी हरदोई चावल मिलो की खान हुआ करता था लेकिन तब पीडीएस चावल की कालाबाजारी बहुत होती थी जब से इस पर लगाम लगी चावल मिलों की संख्या कितनी हो गई अब किसी से छुपा नहीं है चुनिंदा लोग विकसित हुए आज भी हरदोई मंडी समिति में किसान की उपज तय करने का अधिकार किस तरीके से है यह किसी से छुपा नहीं खैर अब हरदोई के हैं तो यह पीड़ा तो रहेगी ही की आखिर हम इतना पीछे क्यों रह गए।
अरुणेश पाठक-
सादर चरण स्पर्श सहित, जनपद हरदोई को Prashant Pathak जी जैसा धनी व्यक्तित्व का पत्रकार मिला। यह अत्यंत गर्व की अनुभूति कराता है। बाकी अगर बेहतर शिक्षा में बड़े-बड़े इंस्टीट्यूट मेडिकल, पैरामेडिकल कॉलेज इंस्टीट्यूट नहीं है और 10 को बाद हाईवे मिल रहा है तथा मेडिकल कॉलेज अभी भी मेडिकल कॉलेज जैसा नहीं बन पा रहा है। अच्छी परिवहन व्यवस्था अभी भी समुचित रूप से नहीं है तो इसका प्रथम करण राजनेता ही है। सभी सरकारों में हरदोई से एक न एक मंत्री लगभग जरूर रहे हैं और इस समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार में हमारे जनपद हरदोई से तीन-तीन मंत्री हैं With Deputy chief minister.. कुछ समय पहले खबर मिली एक मंत्री और बढ़ाने वाले हैं लेकिन विकास के नाम पर आम जनमानस का अभी भी वही पगडंडियों पर जीवन कट रहा है। हम देखते हैं अगर 10 मरीज मेडिकल कॉलेज हरदोई में जाते हैं तो उनमें से 9 को लखनऊ मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया जाता है। जिसमें से लगभग 4 रास्ते में ही अपना दम तोड़ देते हैं यही है असली हरदोई का विकास और दशकों की राजनीति।
शरद द्विवेदी-
विकास के नाम पर अपनी तिजोरी भरी है। और पता नहीं कितने नवयुवक की जिंदगी फर्जी मुकदमे के कारण खराब हुई।हरदोई में जलभराव की समस्या दरबार के गुर्गों ने तालाब की जमीन पर प्लाटिंग कर दी ऊर्जा मंत्रालय रहा लेकिन बांस पर तार आज भी लटक रहे हैं हरदोई देहात नानक गंज ग्रांट चांद बेहटा ग्राम सभा में जमीनों का जमकर खेल हुआ और तिजोरी भरी गई। एक विशेष जाति हरदोई के राष्ट्रीय पक्षी है जिन्होंने विकास के नाम पर अपने लिए सोने का पिंजड़ा बनवाया जनता को बेवकूफ। हरदोई में रोजगार स्वास्थ्य की सुविधाएं शून्य है रोजगार अगर है तो अड्डे पर चंदा वसूलों, हरदोई के समस्त संसाधन एक ही जाति विशेष के पास है आज ब्राह्मण ठाकुर के बच्चे इन्हीं राष्ट्रीय पक्षी के यहां 5 दस हजार की नौकरी करने को मजबूर है ।मेरा किसी व्यक्ति से नहीं अपितु व्यवस्था का विरोध है और मैने जितना लिखा शायद ही हरदोई में किसी ने लिखा हो। सत्ता ने सैफई गांव को शहर बना दिया उसी सत्ता ने हरदोई को विकास पुरुष दिया और हरदोई बदहाल की बदहाल ही रही। रही बात प्रशांत जी की तो शायद पूरी दुनिया में वही एक व्यक्ति है जिनका मै दिल से सम्मान करता हूं जिनका कोई भी कथन मेरे लिए सिरमौर होता है। बाकी लोग मेरे बारे में क्या राय रखते हैं मै इस विषय पर विचार नहीं करता।
मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है
राकेश पांडेय-
कोई भी क्षेत्र हो, दमदार राजनेता के दम से विकसित होता है। हरदोई का दुर्भाग्य रहा कि यह एक विकसित शहर और जिला न बन सका। विकास के एक मायने यह है कि यहाँ रोजगार के अवसर हो, पढ़ने के लिये तकनीकी/व्यवसायिक शिक्षा के अच्छे संस्थान हो। अच्छे अस्पताल हो। यहाँ का कथित सरकारी मेडिकल कालेज सिर्फ रेफर करने का काम करता है। आपने सही कहा अगर विकसित होता तो जमीन के रेट आसमान छूते। हरदोई लखनऊ मार्ग ने बरसों 4 लेन न हो पाने का दंश झेला। आज भी गंगा एक्सप्रेस और आगरा एक्सप्रेस वे के लिए फास्ट कनेक्टिविटी नहीं है। शहर को बरसो बायपास न मिला अब मिला भी है तो निर्माण धीमी गति से हो रहा है। शासन पर पालिटिकल दबाब न होने से जो काम हो रहा है वह प्रशासन की मनमानी का शिकार है। सबसे बड़ा सवाल तो हरदोई नगरपालिका क्षेत्र के विस्तार की लटकी फाइल है। शहर से सटे मोहल्ले ग्रामसभा के अधिकार क्षेत्र में हैं।
अरुणेश पाठक-
सादर चरण स्पर्श सहित,
जनपद हरदोई को Prashant Pathak जी जैसा धनी व्यक्तित्व का पत्रकार मिला
यह अत्यंत गर्व की अनुभूति कराता है
बाकी अगर बेहतर शिक्षा में बड़े-बड़े इंस्टीट्यूट मेडिकल, पैरामेडिकल कॉलेज इंस्टीट्यूट नहीं है और 10 को बाद हाईवे मिल रहा है तथा मेडिकल कॉलेज अभी भी मेडिकल कॉलेज जैसा नहीं बन पा रहा है
अच्छी परिवहन व्यवस्था अभी भी समुचित रूप से नहीं है तो इसका प्रथम करण राजनेता ही है
सभी सरकारों में हरदोई से एक न एक मंत्री लगभग जरूर रहे हैं और इस समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार में हमारे जनपद हरदोई से तीन-तीन मंत्री हैं
कुछ समय पहले खबर मिली एक मंत्री और बढ़ाने वाले हैं लेकिन विकास के नाम पर आम जनमानस का अभी भी वही पगडंडियों पर जीवन कट रहा है
हम देखते हैं अगर 10 मरीज मेडिकल कॉलेज हरदोई में जाते हैं तो उनमें से 9 को लखनऊ मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया जाता है
जिसमें से लगभग 4 रास्ते में ही अपना दम तोड़ देते हैं यही है असली हरदोई का विकास और दशकों की राजनीति



