हाशिमपुरा कांड : नाइंसाफी पर जवाब दें अखिलेश और मुलायम सिंह

लखनऊ : हाशिमपुरा जनसंहार पर आए अदालती फैसले पर रिहाई मंच कार्यालय पर बुधवार को हुई बैठक में विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक संगठनों ने अप्रैल में राजधानी लखनऊ में जन सम्मेलन करने व प्रदेश में जन अभियान चलाने का निर्णय लिया। बैठक में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, मेरठ, हाशिमपुरा, मलियाना, कानपुर, बिजनौर समेत विभिन्न सांप्रदायिक हिंसा व जनसंहार पर जांच हेतु गठित आयोगों की रिपोर्ट को सरकार पर छिपाने का आरोप लगाते हुए सपा सरकार से तत्काल इन्हें सार्वजनिक करने की मांग की गई।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि हाशिमपुरा जनसंहार के बाद जिस तरीके से पीएसी की 41 वीं बटालियन के कमांडेंट को मुकदमे से बाहर रखा गया, हत्यारों की राइफलों को जब्त न करके फारेंसिक जांच समेत ढेरों सबूतों को छुपाया नहीं बल्कि मिटाया गया, वो साफ करता है कि इस जनसंहार के मुख्य राजनीतिक व प्रशासनिक षडयंत्रकर्ताओं को बचाने के लिए 28 साल तक यह नाटक खेला गया। जिस तरीके के 9 साल बाद चार्जशीट पेश की गई तो वहीं जिस तरीके से यूपी में अपने को सेक्युलर कहने वाली सपा-बसपा जैसी सरकारों के बाद भी मुकदमे को चलाने के लिए 2002 में दिल्ली स्थानांतरित किया गया और इन्हीं सरकारों द्वारा हत्यारे पुलिस कर्मियों की नौकरी बरकरार रखते हुए असलहों से फिर से लैश कर दिया गया, ऐसी तमाम यह वो तथ्य हैं, जो साफ कर रहे हैं कि यूपी की सरकारें नहीं चाहती थीं कि हाशिमपुरा के पीड़ितों को इंसाफ मिले।

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि हाशिमपुरा के साथ-साथ मेरठ, मलियाना, कानपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई सांप्रदायिक हिंसा पर गठित रिपोर्टों को यूपी में आई सरकारों ने दबाकर सिर्फ नाइंसाफी ही नहीं की बल्कि सांप्रदायिक तत्वों के हौसले बुलंद किए। हाशिमपुरा पर आए फैसले के बाद सपा सरकार इसे न्यायालय का मामला बताकर अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से भाग रही है। 

ऐसे में मुलायम सिंह बताएं कि हाशिमपुरा-मलियाना सांप्रदायिक हिंसा पर गठित 6 आयोगों की रिपार्टों को किसको बचाने के लिए दबाकर रखा है। 13 अगस्त 1980 में मुरादाबाद में पुलिस की फायरिंग में 284 मुसलमानों की हत्या कर दी गई, जिसमें लाशों की बरामदगी तक नहीं की गई और न ही एफआईआर तक दर्ज हुआ। जिसपर हाईकोर्ट के जज एमपी सक्सेना की रिपोर्ट को यूपी सरकार ने आज तक सार्वजनिक नहीं किया।

वक्ताओं ने कहा कि निष्पक्ष विवेचना ही न्याय का आधार होती है पर जिस तरीके से विवेचना अधिकारी ने हाशिमपुरा जनसंहार में सबूतों को मिटाया है, ऐसे में अगर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने को सेक्युलर कहते हैं तो विवेचनाधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिखाएं। क्योंकि अगर यह मुकदमा हाईकोर्ट में जाता है तो कमजोर विवेचना के चलते पीडि़तों के इंसाफ के खिलाफ जाएगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई से जांच कराई जाए।

बैठक में रामकृष्ण, ओपी सिन्हा, इनायततुल्ला खान, अखिलेश सक्सेना, आदियोग, डा0 अली अहमद, सैयद मोइद, सत्येन्द्र, अजीजुल हसन, मोहम्मद इमरान खान, हरेराम मिश्र, फरीद खान, मोहम्मद मदनी अंसारी, मोहम्मद मकसूद, अनिल यादव समेत विभिन्न संगठनों के लोग मौजूद रहे।



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