गणेश पांडेय-
तीस लाख की रॉयल्टी – चेक से या हवाला से?
चुप रहूं तो अपनी ही नज़रों में गिर जाऊंगा। इसलिए हिन्दी साहित्य के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी रॉयल्टी संबंधी घोषणा पर कुछ सवाल उठाना ज़रूरी है।
शुरुआत में ही यह स्पष्ट कर दूं कि मैं प्रकाशन की दुनिया में सकारात्मक और गुणात्मक बदलाव का समर्थन करता हूं। यदि ‘हिन्द युग्म’ हिन्दी का सबसे ज़्यादा किताबें बेचने वाला और सबसे अधिक रॉयल्टी देने वाला प्रकाशक बन जाए, तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है?
लेकिन सवाल इच्छा का नहीं, सच्चाई का है।
हिन्द युग्म के शैलेश भारतवासी ने दावा किया है कि उन्होंने विनोद कुमार शुक्ल को एक साल में तीस लाख रुपए रॉयल्टी दी है। यह घोषणा अब तक की सबसे बड़ी बात कही जा रही है। लेकिन क्या यह सच है या महज एक जुमला?
यहाँ मुझे वाणी प्रकाशन की याद आती है जिसने कभी मंचीय कवि कुमार विश्वास के कविता संग्रह के लिए एक करोड़ रुपये का अनुबंध किया था। किंतु वह मामला अलग है—कुमार विश्वास मंचों पर लोकप्रिय हैं, भले ही साहित्यिक प्रतिष्ठा न हो। वहीं विनोद कुमार शुक्ल हिन्दी साहित्य के एक प्रतिष्ठित नाम हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता और पाठकवर्ग का दायरा मंचीय कवियों जैसा व्यापक नहीं हो सकता।
यहाँ सवाल उठता है:
- क्या विनोद कुमार शुक्ल की किताबें वास्तव में लाखों में बिकी हैं?
- क्या उनकी लोकप्रियता सुरेंद्र मोहन पाठक जैसी है?
- क्या उनके कविता संग्रह या उपन्यास देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के छात्र खरीदते हैं?
ज्यादातर बीए-एमए के छात्र भी विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ते हों, ऐसा दावा करना मुश्किल है। मंचों की कविताएं जिनकी भाषा सरल, सपाट और मसालेदार होती है, उनका पाठक-वर्ग अलग होता है—कम उम्र, कम पढ़ा-लिखा और तात्कालिक भावनाओं में बहने वाला।
तो फिर यह तीस लाख की रॉयल्टी किस आधार पर दी गई?
यदि यह सच है, तो सवाल यह भी उठता है कि-
- सुरेंद्र मोहन पाठक को तीस करोड़ से कम क्यों मिले होंगे?
- उदय प्रकाश को वाणी प्रकाशन ने अब तक कितनी रॉयल्टी दी है?
मुझे स्वयं ‘नयी सदी की कविता’ के लिए वाणी से एक रुपये की भी रॉयल्टी नहीं मिली। मैंने कभी शिकायत भी नहीं की, न ही करूंगा। लेकिन ऐसे अनुभवों के बीच जब कोई प्रकाशक तीस लाख की रॉयल्टी की बात करता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब बात सिर्फ इतनी नहीं कि शैलेश भारतवासी ने यह दावा किया है, बल्कि यह भी कि अगर विनोद कुमार शुक्ल जैसे गंभीर लेखक को इतनी बड़ी रॉयल्टी मिली है, तो फिर उनके मुकाबले कम गंभीर लेकिन अधिक बिकाऊ लेखक – जैसे दिव्य प्रकाश दुबे, सत्य व्यास आदि – को कितनी रॉयल्टी मिली होगी? करोड़ों?
क्या उनकी किताबें विनोद कुमार शुक्ल से अधिक बिकी हैं या कम?
इन सभी सवालों के जवाब शैलेश भारतवासी के प्रबंधन ढांचे से भी जुड़े हैं— क्या हिन्द युग्म का वितरण नेटवर्क वाणी या राजकमल से बड़ा है? कितने शहरों में शाखाएं हैं? कितनी बड़ी टीम है?
इन सारी बातों को देखते हुए मुझे यह घोषणा प्रकाशन की दुनिया में एक राजनीतिक जुमले जैसी लगती है—जिसका उद्देश्य प्रकाशक को चमकाना ज़्यादा है, पारदर्शिता दिखाना कम।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि शैलेश भारतवासी सच में हिन्दी प्रकाशन जगत के ‘सूर्य और चंद्र’ बनें, सभी लेखकों के लिए एक प्रेरणास्रोत बनें। मैं उनके भले की कामना करता हूं—लेकिन हिन्दी साहित्य के साथ छल की नहीं।
और आखिर में, एक निर्णायक बात:
सच और झूठ का फैसला सिर्फ कह देने या चुप रहने से नहीं होता। अगर यह तीस लाख वाकई दिए गए हैं, तो इसका ज़िक्र शैलेश भारतवासी और विनोद कुमार शुक्ल के इनकम टैक्स रिटर्न में होना चाहिए। वहीं से सच्चाई साबित होगी।
क्योंकि आज नहीं तो कल, हिन्दी का पाठक भी सच जानना चाहता है।




Ami
May 25, 2025 at 8:31 am
एक नंबर का झूठा है..फ्राॅड
इनकम टैक्स को एक्शन लेना चाहिए