Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : केंचुआ की कारस्तानी को टेलीग्राफ ने लीड बनाया है इंडियन एक्सप्रेस ने मोदी के ‘प्रचार’ को

द टेलीग्राफ की खबर में एसआईआर से संबंधित सभी जरूरी विवरण हैं और कायदे से लिखा है जबकि एसआईआर पर लगातार रिपोर्ट कर रहे इंडियन एक्सप्रेस की खबर वैसी नहीं है। एक्सप्रेस की दूसरी खासियत यह है कि प्रधानमंत्री के दावे या उनके प्रचार को लीड बना दिया है जबकि उसमें दम या तथ्य नहीं है। खबर तो वह इसीलये है कि प्रधानमंत्री ने कहा है। टेलीग्राफ की यह रिपोर्ट आदर्श कही जा सकती है, पाठकों की जानकारी और पत्रकारिता सीखने वालों के लिए पेश है उसका हिन्दी अनुवाद। हिन्दी अखबार में इससे बेहतर खबर मिले तो [email protected] पर मुझे जरूर बतायें। गौरतलब है कि एसआईआर पर कोई खबर नहीं करने वालों ने भी आज चुनाव आयोग का पक्ष छापा है। अमर उजाला ने भी शर्माते हुए छोटा सा।

संजय कुमार सिंह

बिहार में चल रहे एसआईआर के खिलाफ आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, बिहार का डाटा जारी, अगले चरण का पुनरीक्षण शुरू होगा। इसके साथ छपी खबर बताती है कि राज्य में मतदाताओं की संख्या 2005 के बाद पहली बार कम हो सकती है। द हिन्दू में पहले पन्ने पर चार कॉलम की खबर है, इंडिया (गठबंधन) चाहता है कि एसआईआर को रोका जाये, कहा कि यह नागरिकता स्थापित करने का साधन बन गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग ने कहा है कि बिहार के एसआईआर के संदर्भ में स्वयंसेवक मतदाताओं को सरकारी दस्तावेज प्राप्त करने में मदद करेंगे। बीएलओ की शिकायत, अभी भी कई लोग आवश्यक 11 दस्तावेजों में कोई एक दाखिल करने में सक्षम नहीं हैं। यह सरकारी या आयोग का पक्ष और उसका प्रचार है। टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर अंदर होने की सूचना सिंगल कॉलम की खबर के रूप में है। इसका शीर्षक है, बिहार की अंतरिम मतदाता सूची में 66 लाख नाम कट सकते हैं। दि एशियन एज ने सिंगल कॉलम की खबर से जानकारी दी है कि सुप्रीम कोर्ट में आज बिहार में चुनाव आयोग के एसआईआर के खिलाफ कई याचिकाओं की सुनवाई है। यह पूरी रिपोर्ट अंदर होने की सूचना भी है। अमर उजाला में सिंगल कॉलम की खबर से सूचना दी गई है कि बिहार में एसआईआर पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक है, बिहार के 7.24 करोड़ मतदाताओं ने जमा कराये एसआईआर के फॉर्म। देशबन्धु में चुनाव आयोग के साथ एडीआर का भी पक्ष है। फ्लैग शीर्षक है, चुनाव आयोग के दावे पर एडीआर ने उठाये सवाल। मुख्य शीर्षक है, मरे हुए लोग भी बिहार में भर रहे एसआईआर फॉर्म। उपशीर्षक है, याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को कहा कि चुनाव आयोग के आंकड़े कोई मायने नहीं रखते। 

मुझे लगता है कि इन सब खबरों और प्रस्तुतियों के मुकाबले द टेलीग्राफ की खबर में मुद्दे की बात है। इसका मुख्य शीर्षक है, हटाये गये मतदाताओं पर चुनाव आयोग चुप है। जाहिर है, ऊपर बताई गई अन्य अखबारों की खबरें चुनाव आयोग की विज्ञप्ति या दी गई सूचनाओं पर आधारित हैं तथा इनका मकसद आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दिन चुनाव आयोग या एसआईआर के पक्ष में प्रचार और माहौल बनाना भी हो सकता है। एसआईआर का विरोध इसीलिए है कि इसका मकसद कुछ जायज मतदाताओं को बाहर करना लगता है। दूसरे अखबारों की खबरों से इस उद्देश्य की पुष्टि होती लगती है लेकिन हटाये गये मतदाताओं के मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं है तो उसे बताया जाना सबसे जरूरी था। टेलीग्राफ ने इस काम को प्रमुखता से किया है। इस संबंध में विपक्ष का यह आरोप है कि एसआईआर नागरिकता निर्धारित करने का काम है। इसे इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी मूल खबर के साथ सिंगल कॉलम में छापा है जबकि इंडिया गठबंधन की मांग है कि एसआईआर को रोका जाये द हिन्दू में प्रमुखता से है। इस तरह, आज जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है तो चुनाव आयोग की बातें ही ज्यादा छपी हैं और ज्यादातर अखबारों ने पहले पन्ने पर अपनी ओर से ना पहले फील्ड रिपोर्ट दी ना आज दी है। लेकिन आज चुनाव आयोग की जरूरत है तो खबर पहले पन्ने पर जरूर है भले अलग-अलग है और विज्ञप्ति जस के तस नहीं छपी है। इसमें एसआईआर का सच नहीं के बराबर है।

द टेलीग्राफ का फ्लैग शीर्षक है, चुनाव आयोग ने कहा बिहार के 36 लाख मतदाता नहीं मिले पर अवैध घुसपैठियों के मामले में अस्पष्टता है। कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाता सूची में नाम लिखवाना राजोगार कार्यालय में नाम लिखवाने या पासपोर्ट बनवाने जैसा नहीं है। वैसे भी देश में शत प्रतिशत वोट नहीं पड़ते रहे हैं और 2024 के आम चुनाव में यह औसत 63.88 प्रतिशत ही था। चुनाव आयोग इस प्रतिशत को बढ़ाने के लिए तमाम प्रयास करता रहा है और यह जरूरी भी है। मतदान बढ़ाने के लिए उम्मीदवार के साधनों का उपयोग अनुचित है और उम्मीदवारों के लिए यह मना है। ऐसे में अगर लोग मतदान के लिए नहीं आते हैं तो वही लोग मतदाता सूची में नाम लिखवाने के लिए कितना धन, परिश्रम या समय खर्च करेंगे यह सोचने वाली बात होगी। अगर आपको लगता है कि बिहार में ऐसी बात नहीं है और वहां के लोग जागरूक हैं तो एसआईआर का यह अभियान उनके उत्साह को कम जरूर कर रहा है फिर भी चुनाव आयोग नहीं मान रहा है और अपनी जिद्द पर अड़ा है तो यह शक होना स्वाभाविक है कि वह अपना काम कर रहा है या किसी और की सेवा में लगा है। जो भी हो, मामला अदालत में है तो फैसला वहां होगा लेकिन अखबारों की भूमिका तो गौर करने लायक है ही। ऐसे में टेलीग्राफ ने अगर यह बताया है कि चुनाव आयोग का काम सत्तारूढ़ दल की विचारधारा या राजनीति के अनुकूल लग रहा है तो लीड के साथ की खबर से यह भी बताया है कि सत्तारूढ़ दल या दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की राजनीति से निपटने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल पार्टी की नेता ने भाषा को मुद्दा बनाया है उसपर आज बोलपुर में रैली है।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग से संबंधित द टेलीग्राफ की मूल खबर से चुनाव आयोग के दावे का भी पता चलता है। नई दिल्ली डेटलाइन से फिरोज एल विनसेन्ट की खबर इस प्रकार है (गूगल अनुवाद, संपादन मेरा), चुनाव आयोग ने रविवार को कहा कि उसने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के उद्देश्यों को प्राप्त कर लिया है और वह जल्द ही बिहार की मसौदा मतदाता सूची से संबंधित नामों को जोड़ने या हटाने के खिलाफ अपील करने की प्रक्रिया की घोषणा करेगा। इसका प्रकाशन एक अगस्त को होगा। एसआईआर के खिलाफ कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से एक दिन पहले जारी किए गए आयोग के इस बयान में यह नहीं बताया गया कि कितने नए मतदाता जोड़े गए हैं। आयोग ने इस बात की फिर से पुष्टि की कि चुनाव आयोग ने हटाए गए नामों को राजनीतिक दलों के साथ साझा किया है। हालांकि, रविवार को इंडिया ब्लॉक के पांच दलों ने दावा किया कि उन्हें हटाए गए नाम नहीं मिले हैं। कई विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार समूहों ने एसआईआर को असंवैधानिक करार देते हुए इसे रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि इसका दस्तावेज़-केंद्रित रुख कई गरीब, हाशिए पर पड़े और कम पढ़े-लिखे नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर देगा।

बिहार विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने से लगभग पांच महीने पहले 25 जून को शुरू की गई एसआईआर की आलोचना इस बात के लिए की गई है कि इसमें नागरिकता साबित करने का दायित्व मतदाताओं पर डाल दिया गया है और इसके लिए अपने व्यक्तिगत तथा माता-पिता के दस्तावेजों भी पेश किये जाने हैं। 25 जुलाई की समय सीमा तक संभावित मतदाताओं के भरे हुए आवेदन पत्र प्राप्त करने की जल्दबाजी में अधिकारियों द्वारा मनमानी की शिकायतें मिली हैं। चुनाव आयोग ने 24 जून को कहा था कि एसआईआर शुरू करने का एक कारण मौजूदा मतदाता सूची में “विदेशी अवैध प्रवासियों के नाम शामिल होना” था। एसआईआर के तहत, चुनाव आयोग ने निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को “नागरिकता अधिनियम के तहत संदिग्ध विदेशी नागरिकों के मामलों को सक्षम प्राधिकारी को भेजने” का निर्देश दिया था। हालांकि, आयोग के रविवार के बयान में ऐसे किसी भी मामले का उल्लेख नहीं किया गया है। हटाए गए 65 लाख नामों में मृत, बिहार में कई जगहों पर पंजीकृत और स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके या न मिले मतदाता शामिल हैं। बयान में 36 लाख मतदाताओं को तीसरी श्रेणी में रखा गया है। चुनाव आयोग ने इस तीसरी श्रेणी के संबंध में केवल अवैध घुसपैठ की ओर इशारा किया है।

बयान में कहा गया है, “बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर या बूथ स्तर के अधिकारी) इन मतदाताओं को नहीं ढूंढ पाए या उन्हें उनके आवेदन पत्र नहीं मिले क्योंकि: वे अन्य राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता बन गए थे या अस्तित्व में नहीं पाए गए या 25 जुलाई तक फॉर्म जमा नहीं किया या किसी कारणवश मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के इच्छुक नहीं थे (एसआईआर आदेश के पृष्ठ 17 पर आवेदन पत्र के पैरा IV का संदर्भ है)।” आगे कहा गया है, “इन मतदाताओं की सही स्थिति एक अगस्त 2025 तक ईआरओ/एईआरओ द्वारा इन फॉर्मों की जाँच के बाद पता चलेगी। वैसे, 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक दावे और आपत्ति की अवधि के दौरान वास्तविक मतदाताओं को मतदाता सूची में वापस जोड़ा जा सकता है।” आवेदन पत्र का पैरा IV मतदाता द्वारा इस बात की घोषणा को संदर्भित करता है कि फॉर्म में गलत घोषणा करना – जिसमें नागरिकता संबंधी जानकारी भी एकत्र की जाती है – एक दंडनीय अपराध है। (मेरा मानना है कि इसके बाद किसी दस्तावेज की जरूरत नहीं होनी चाहिये और यह घोषणा पर्याप्त है। वैसे भी, भारत में शपथ पत्रों से तमाम काम होते रहे हैं। लोगों को शिक्षित मान लिया जाता रहा है। एक मामले में तो सार्वजनिक शपथ पत्र की पुष्टि के लिए डिग्री के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनिवार्यता भी जरूरी नहीं समझी गई। फिर भी, बिहार में एसआईआर के लिए केंचुआ के 11 दस्तावेजों में शपथपत्र नहीं है। यही नहीं, मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की यह शर्त भी होती है कि पुरानी जगह से नाम कटवा दिया है या नाम आवेदन देने, बीएलओ की जांच / पुष्टि पर ही कटते हैं। इसका पालन नहीं होता रहा है और अभी भी नहीं किया जा रहा है। जबकि इस मामले में सख्ती की बात करके नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेजों की जरूरत से बचा जा सकता था और मतदाता बनना आसान हो सकता था। मतदाता बनाने-हटाने में बीएलओ की मनमानी की कहानी अलग है।)

रविवार को चुनाव आयोग द्वारा साझा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार के 7.89 करोड़ मतदाताओं (मौजूदा मतदाता सूची में शामिल संख्या) में से केवल 16 लाख ने ही अपने आवेदन पत्र ऑनलाइन जमा किए थे और अन्य 13 लाख ने फॉर्म डाउनलोड करके उन्हें बीएलओ के पास व्यक्तिगत रूप से जमा किया था। 2011 की जनगणना से पता चला है कि बिहार की सात प्रतिशत से ज़्यादा आबादी राज्य से बाहर प्रवास कर गई थी, जो भारत के किसी भी अन्य राज्य से ज़्यादा है। मतदाता सूची में प्रवासी नामांकन के लिए 246 समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित किए गए थे, और सभी राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र में बिहार से आए अस्थायी प्रवासियों से संपर्क करने के लिए कहा गया था। एसआईआर ने बिहार के मतदाताओं की संख्या घटाकर 7.24 करोड़ कर दी है। चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि एसआईआर से पहले और बाद में, बिहार में भाजपा के पास बूथ-लेवल एजेंट (बीएलए) की संख्या सबसे ज़्यादा थी। इसके बाद राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड का स्थान था। हालाँकि, 53,338 बीएलए वाली भाजपा के पास भी हर मतदान केंद्र क्षेत्र में एक बीएलए नहीं था। बिहार में 77,895 बूथ हैं। आम आदमी पार्टी, जिसने बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है, के पास राज्य में केवल एक पंजीकृत बीएलए है। चुनाव आयोग ने दोहराया: “20 जुलाई 2025 तक, सीईओ /डीईओ /ईआर ओ/बीएलओ ने राजनीतिक दलों के साथ उन मतदाताओं की बूथ-स्तरीय सूचियाँ साझा कीं, जिन्हें मृत मतदाता बताया गया था या जिनके आवेदन गणना प्रपत्र प्राप्त नहीं हुए थे, या जिनके स्थायी रूप से प्रवासित होने की सूचना थी या जिनका पता नहीं लगाया जा सका था, ताकि उनसे ऐसे मतदाताओं के बारे में केंद्रित तरीके से पूछताछ करने का अनुरोध किया जा सके।” इसमें आगे कहा गया: “बाद में, राजनीतिक दलों के प्रयासों को देखते हुए, ऐसी अद्यतन सूचियों को फिर से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ साझा किया गया।”

इंडियन एक्सप्रेस की लीड प्रधानमंत्री का दावा या उनका विचार है। वही शीर्षक है, ऑपरेशन सिन्दूर से साबित हुआ कि आतंकवादियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि उनका यह कहना हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग न भी हो तो ध्यान भटकाना जरूर है। मुझे इस पर ज्यादा बात करने की जरूरत नहीं लगती है। दूसरी ओर, कल अमर उजाला की सेकेंड लीड के शीर्षक भी ऐसा ही था। लगातार दूसरे दिन ऐसी बात करना संदेह पैदा करता है कि प्रधानमंत्री की यही कोशिश होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि ऑपरेशन सिन्दूर नाम ही राजनीतिक था। उसका आतंकवाद से कोई संबंध नहीं था और रहा भी हो तो पहलगाम के हमलावरों का न पकड़ा जाना तथा अचानक युद्ध खत्म हो जाना उसकी असफलता का सबूत है। प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं वह इसकी झेंप मिटाने के लिए भी हो सकता है तथ्य तो नहीं ही है। कल अमर उजला का एक शीर्षक, “आतंक के आकाओं की आज भी नींद उड़ाये हुए हैं भारत में बने हथियार : मोदी” भी ऐसा ही था। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा होता तो पहलगाम कैसे होता या उन हथियारों का क्या लाभ है अगर पहलगाम हो गया और हमलवार अभी तक पकड़े नहीं जा सके हैं। लगभग ऐसा ही पुलवामा के मामले में है। अब वह सब मुद्दा नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री छोड़ नहीं रहे हैं।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन