मनोज अभिज्ञान-
सवाल है — जीत किसकी हुई?
अगर अमेरिका मानता है कि बातचीत तीसरे देश में होनी चाहिए, और पाकिस्तान पहले से ही न्यूट्रल जांच की मांग कर रहा था, जबकि भारत हमेशा तीसरे पक्ष या मध्यस्थता का विरोध करता रहा है — तो यह साफ़ दिखता है कि भारत ने अपने पुराने स्टैंड से पीछे हटने के संकेत दिए हैं।
इससे जुड़े कुछ ज़रूरी सवाल हैं:
- भारत की रणनीतिक दृढ़ता कहाँ गई?
भारत हमेशा कहता रहा है कि किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे पर बातचीत सिर्फ द्विपक्षीय रूप में होगी, तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं होगी। अब अगर बातचीत तीसरे देश में होती है, तो भारत की यह नीति कमजोर पड़ती दिखती है। - क्या यह पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत है?
पाकिस्तान लंबे समय से यही चाहता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मामले में दखल दे। अब अगर अमेरिका की शर्त पर भारत बातचीत को तैयार होता है, तो यह पाकिस्तान के नैरेटिव को बल देता है। - क्या भारत की विदेश नीति में लचीलापन दिखाना कमजोरी बन रहा है?
अमेरिका की दोस्ती की कीमत भारत अपनी रणनीतिक स्थिति से समझौता करके तो नहीं चुका रहा? - क्या यह संकेत है कि भारत अंतरराष्ट्रीय दबाव में है?
अमेरिका, कनाडा, और यूरोपीय देशों की हालिया आलोचनाओं के बाद भारत का यह रुख बताता है कि वैश्विक दबाव असर दिखा रहा है।
जब दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हों और अंततः समझौता भारत की उस नीति से पीछे हटकर हो, जिसे वह दशकों से दोहराता आया है, तो सवाल उठता है — क्या यह रणनीतिक दबाव में लिया गया कदम है?
वह शाम को टीवी डिबेट में देशभक्ति की चिल्लाहटों के बीच आपके दिल में पाकिस्तान के खिलाफ आग भरता है। पर क्या आपने कभी सोचा है—उसके हाथ में जो माइक्रोफोन है, वह किसका है? और उसके कान में जो फुसफुसाहट गूंज रही है, वह किसकी भाषा बोलती है?
हमारे मीडिया चैनलों में अधिकांश illegals बैठे हैं—जो पत्रकार नहीं, पार्टी के प्रचारक हैं। जो एजेंडा थोपते हैं, सच्चाई नहीं। जो दुश्मनी को टीआरपी की खाद से सींचते हैं, क्योंकि शांति नहीं बिकती, चीख बिकती है।
जब सीमा पर हलचल होती है, तो सबसे पहले एक्सक्लूसिव बनता है “Breaking News: पाकिस्तान की नापाक हरकत!” लेकिन जब वही हरकत नकली निकले, तो माफ़ी नहीं आती—सिर्फ अगला ब्रेकिंग तैयार होता है। उनके लिए दुश्मनी सीरियल है, जिसमें हर हफ्ते नया एपिसोड चाहिए, और हर एपिसोड में पाकिस्तान का कोई नया गुनाह।
जासूस अब सिर्फ सीमा पार से ही नहीं आते, वे यहां भी हैं—हमारे टीवी चैनलों में, हमारी भाषा में, हमारे बीच। जो हमें हर दिन सिखाते हैं कि शांति दुर्बलता है, युद्ध उत्सव है। जो यह नहीं बताते कि कौन जासूस है, बल्कि यह सुनिश्चित करते हैं कि हम सब एक-दूसरे पर शक करें।
और जब पूरा समाज एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगे, तो क्या फर्क रह जाता है दिल्ली और इस्लामाबाद में?
हमें अब पूछना ही होगा— वो जो हर रात टीवी पर चिल्लाता है, वाक़ई देशभक्त है या बस टीआरपी का एजेंट?
हम युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। हम जानते हैं कि युद्ध सिर्फ़ सरहदों को नहीं, दिलों और सपनों को भी जला देता है। हर युद्ध में सैनिक की जान जाती है, किसान की फसल सूखती है, और आम आदमी की रोटी महंगी हो जाती है। इसलिए हम शांति के हामी हैं—संवाद, समझदारी और सह-अस्तित्व के समर्थक। लेकिन अगर युद्ध थोपा जाएगा, अगर न्याय और सम्मान पर हमला होगा, अगर हमारे देश की नागरिकता, गरिमा या स्वतंत्रता को ललकारा जाएगा—तो हम चुप नहीं बैठेंगे। हम तब भी नफ़रत के लिए नहीं लड़ेंगे, हम लड़ेंगे न्याय के लिए। हमारा युद्ध, जब भी होगा, तो वह प्रतिक्रियावादी नहीं होगा—वह चेतन, विवेकपूर्ण प्रतिरोध होगा।
*Illegals उस ख़ुफ़िया जासूसी प्रणाली का नाम है जिसमें किसी देश के खुफिया एजेंट दूसरे देश में बिना राजनयिक या आधिकारिक पहचान के, आम नागरिक बनकर लंबे समय तक गुप्त रूप से रहते हैं और वहां की राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य जानकारियाँ अपने देश को भेजते हैं। इन्हें deep-cover agents या non-official cover (NOC) spies भी कहा जाता है।


