मजीठिया पर बहस के संकेत नकारात्मक

मजीठिया वेतनमान को लेकर राज्य सभा टीवी पर बहस नकारात्मक संकेत दे रही है। इस बहस से साफ हो गया है कि सरकार भी यह मानती है कि मजीठिया वेतनमान देना छोटे समाचार पत्रों के लिए संभव नहीं। और बड़े प्रेस मालिक छोटों का रोना रोकर अपनी तिजोरी भरने के प्रयास में है। लेकिन यह सब भ्रमक बातें है, मजीठिया वेतनबोर्ड की अनुशंसा में प्रेस मालिक, पत्रकार और जज शामिल होते है। लंबे समय के मंथने के बाद आय के आधार पर पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन की अनुशंसा की गई। इस अनुशंसा को बड़े समाचार पत्रों ने चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने 4 साल की बहस के बाद इसे बाजिब माना। 

परेशानी यह है कि प्रेस मालिक पत्रकारों को यह वेतनमान देना ही नहीं चाहते। वे जर्नलिस्ट एक्ट को ताक पर रखकर काम कर रहे है। सरकार और कोर्ट को भी सोचना चाहिए कि जब मनिसाणा वेतन बोर्ड से लेकर भचाभच वेतन बोर्ड की अनुशंसा नहीं मानी गई तो जाहिर है कि समाचार पत्र के मालिक वेतनमान देना ही नहीं चाहते। फिर यह क्यों कहते है कि संस्थान बंद हो जाएगा हमें घाटा होगा। यदि मनिसाणा वेतन भी पत्रकारों को मिलता तो वर्तमान में पत्रकारों की दैनिय दशा नहीं होती। अब समाचार पत्र संस्थान के मालिक इस वेज बोर्ड का हवाला देकर सरकार से और वित्तीय सहायता चाहते है। 

तुझ जैसा पत्रकार मैं हर दिन पैदा करता हूं, कल से प्रेस की सीढ़ी मत चढ़ना, तुझे शब्द ज्ञान नहीं है, अपने आपकों पत्रकार लगता है, अमुक खबर छूट गई क्या कर रहा था, उसके बाद गालि। तू अमुक अधिकारी से कैसी बातें कर रहा था, पता नहीं वहां हमारी ठेकेदारी चलती है यह काम कराने पड़ते है चल उससे माफी मांग, अबे क्या खबर लाया है वह हमारा रिश्तेदार है उसके खिलाफ ऐसी खबर नहीं छाप सकते है। उस व्यापारी को फोन क्यों लगाया था तुझे पता नहीं वह हमारा विज्ञापन पार्टी है। उस ठेकेदार के खिलाफ क्यों लिखा वह हमारा बिजनेश पाटनर है। उस नेता, मंत्री के खिलाफ मत लिखना है, चल उसकी पाजिटिव खबर बना आदि-आदि ना जाने कितनी गालियां प्रेस मालिक और उसके चमचे देते रहते है। कोई नौकरी मांगने जाए तो बात वेतन पर रूक जाती है। सब कुछ फाइनल होने के बाद हर संस्थान यही कहता है कि इतना वेतन तो हम नहीं दे पाएगे। अब यदि पत्रकार ने पूछा कि कितना देंगे तो बोलेगा बहुत कम 6 हजार 7 हजार। जो राजी हुआ तो ठीक है नहीं तो कहेगा ठीक है मैं मालिक से बातकर 10 हजार करवा दूंगा। नतीजन आज भी पत्रकारों का औसत वेतन 15 हजार से ज्यादा नहीं है। पत्रकारों के काम के घंटे का कोई निश्चत समय नहीं है। नौकरी की गारंटी नहीं है। प्रेस मालिक किसी को भी पत्रकार बना देते है कोई योग्यता निर्धारित नहीं है। ना जाने कितनी बुराइयां है। और ज्यादा से ज्यादा लाभ के लिए अब उपसंपादक से पेज लगवाने लगे, पत्रकारों से मेटर चलवाने लगे, प्रूफ रीडर का पद समाप्त कर दिया गया। पत्रकार से ही विशेष रिपोर्ट मंगाने लगे अर्थात् विशेष संवाददाता का काम रिपोर्ट से लेने लगे। मशीन में बदलाव किए जिससे स्टाप कम हो गए। प्रेस मालिकों की 10 उगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में है।

मजीठिया वेतन के अवमानना मामले में प्रेस मालिकों ने जाने-माने वकीलों को खड़ाकर सजा से बचने का प्रयास किया है। दरअसल वे भी जानते है कि कानून और औपचारिक दृष्टि से हम कहीं सही नहीं है। यदि यह कहते है कि मजीठिया वेतनमान देने से संस्थान बंद हो जाएगी या भारी वित्तीय घाटा होगा तो इस पर भी 4 साल सुप्रीम कोर्ट में बहस हो चुकी है। और कोर्ट ने यह पाया कि कोई संस्थान बंद नहीं होगा ना ही घाटा होगा। अब प्रेस मालिक समाचार पत्रों और टीवी बहस से मजीठिया वेतनबोर्ड के विरोध में मंच तैयार करना चाहते है। इसलिए हम सभी पत्रकार साथियों को अपने हुनर का बखूबी उपयोग करते हुए प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, वेव और सोशल मीडिया में मजीठिया वेतन बोर्ड की मांग और जोर-शोर से उठानी होगी। अपनी कलम के ताकत का एहसास कराना होगा कि चाहे कोई भी हो पत्रकारों हक और हित के आगे बौना है। पहली बार प्रेस मालिक बैकफुट पर है इसलिए नियम कानून का पाठ पढ़ाना होगा। 



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