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सियासत

इमोशनल ब्लैकमेलिंग : गोधरा से लेकर पुलवामा और अब पहलगाम तक पैटर्न एक ही है!

राकेश कायस्थ-

शोषण के जितने भी प्रकार है, उनमें भावनात्मक शोषण सबसे ज्यादा क्रूर और अनैतिक है। नरेंद्र मोदी की सफलता का आधार यही भावनात्मक शोषण है। धर्म और देश दो ऐसे शब्द हैं, जिनके आते ज्यादातर लोगों में समर्पण का भाव आ जाता है। वे अपनी तार्किकता को ताक पर रख देते हैं और सिर्फ कमांड फोलो करते हैं।

युद्ध जैसा वातावरण था तो सारे प्रश्न स्थगित थे। लेकिन अब किसी का भी अपनी सरकार से यह पूछना बनता है कि आखिर आप हमारी सुरक्षा करने में विफल क्यों रहे? लेकिन आप यह सवाल ना पूछ पाये इसलिए आपके सामने एक और भावनात्मक मुद्दा उछाला जाता है और वो है पाकिस्तान से बदला।

चलो मान लिया बदला लेना ठीक है। लेकिन पाकिस्तान से बदला लेने के चक्कर में बीस से ज्यादा निर्दोष नागरिक मरे उनका बदला कौन लेगा? पाकिस्तान ने जान-बूझकर असैनिक ठिकानों पर हमला किया और आपने फिर भी सैनिक कार्रवाई रोक दी, आखिर क्यों?

आप कह रहे हैं कि पाकिस्तान गिड़गिड़ाने लगा इसलिए हम सीजफायर के लिए तैयार हो गये। क्या न्याय के सिद्दांत इस तरह काम करते हैं। इसका मतलब ये है कि पूरे देश को सिर के बल सिर्फ इसलिए खड़ा किया गया, क्योंकि ये मामला सिर्फ एक शासक के अहं की तुष्टि का था, पीड़ितों कि लिए न्याय सुनिश्चित करने का नहीं।

जिस निर्लज्जता से इस मामले का राजनीतिक दोहन शुरू हुआ है, वो ये बताता है कि देश के प्रधानमंत्री को भावनात्मक शोषण के अलावा कुछ नहीं आता। गोधरा से लेकर पुलवामा और अब पहलगाम तक पैटर्न एक ही है।

देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का काम यह सुनिश्चित करना है कि जनता से जुड़े सवाल कभी सिर ना उठा पायें। लेकिन जो लोग सदियों के संघर्ष से मिली आजादी की कीमत समझते हैं उन्हें बोलने का जोखिम उठाना ही पड़ेगा।


मनोज अभिज्ञान-

हर बार जब कश्मीर में खून बहता है, हर बार जब पाकिस्तान की ज़मीन से आए आतंकियों की गोलियों से मासूम मारे जाते हैं, तब भारतीय मीडिया और सरकार की ‘देशभक्ति’ की स्क्रिप्ट शुरू होती है—’करारा जवाब दिया जाएगा’, ‘भारत चुप नहीं बैठेगा’, ‘पूरी दुनिया भारत के साथ है’—जैसे जुमलों से देश का गुस्सा शांत करने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब धुआँ छँटता है, तब सच्चाई सामने आती है: भारत परमाणु हथियार संपन्न देश होकर भी दशकों से खून बहने दे रहा है और उसके जवाब में कुछ दिन की टीवी टीआरपी और कुछ रिट्वीट्स के सिवा कुछ नहीं कर पा रहा।

इस बीच, एक मज़ाक सोशल मीडिया पर घूम रहा है—ट्रंप को कश्मीर में बड़ा रिसॉर्ट खोलने दीजिए, उसे किराया-फ्री ज़मीन दीजिए, और देखिए आतंकवाद कैसे चमत्कारी ढंग से गायब हो जाता है। मज़ाक में कड़वी सच्चाई छिपी है: जब तक कश्मीर को सिर्फ सामरिक और धार्मिक नज़रिए से देखा जाएगा, और उसके पर्यटन, व्यापार, और जीवन को पुनर्जीवित करने की कोई ठोस कोशिश नहीं होगी, तब तक आतंकवाद के लिए ज़मीन बनी रहेगी।

मगर हकीकत ये है कि डोनाल्ड ट्रंप, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर शोर मचाने वाला व्यापारी कहा जाता है, उन्होंने कम से कम इस संघर्ष को टालने का काम किया। जब भारत ने पलटवार किया और पाकिस्तान के भीतर घुसकर हमला किया, तब दुनिया को लगा कि मामला काबू से बाहर जा सकता है—खासकर जब पाकिस्तान का नूर खान एयरबेस, जो उसके परमाणु शस्त्रों के पास है, खतरे में आया। तब ट्रंप ने दखल दिया और सौदेबाज़ी की भाषा में कहा: “अगर लड़ाई रुकी, तो व्यापार होगा, नहीं रुकी, तो कुछ नहीं मिलेगा।”

हुसैन हक्कानी जैसे समझदार पाकिस्तानियों ने भी स्वीकार किया कि ट्रंप का देर से हस्तक्षेप करना रणनीतिक रूप से असरदार था। ये वही हक्कानी हैं जो मानते हैं कि पाकिस्तान ने दशकों से आतंकवाद को भारत के खिलाफ राज्य की नीति के रूप में इस्तेमाल किया है, और उसकी परमाणु ढाल ने उसे बड़ी सज़ा से अब तक बचा रखा है।

फिर भी दुनिया भारत के साथ उस तरीके से नहीं खड़ी हुई, जैसा भारत चाहता था। क्यों? क्योंकि भारत ने सबूत नहीं जुटाए, प्रचार कर दिया, और प्रतिक्रिया में संतुलन नहीं रखा। दुनिया ‘पाकिस्तान को बदलना’ चाहती है, ‘उसे मिटाना’ नहीं। भारत गाज़ा की तरह पाकिस्तान को ट्रीट नहीं कर सकता, क्योंकि पाकिस्तान गाज़ा नहीं है। उसके पास परमाणु हथियार हैं और चीन का हाथ उसके सिर पर है।

भारत इस भ्रम में है कि वह इज़राइल बन सकता है, मगर न उसकी इंटेलिजेंस एजेंसी मोसाद जैसी है, न अमेरिका से उसका रिश्ता वैसा है। इज़राइल आतंकियों को चुपचाप ठिकाने लगाता है, बात नहीं करता। भारत अभी तक कैमरे में देखकर फौज की तारीफ और मंत्रियों के बयानों में ‘गर्व’ ढूँढता रहता है।

अगर भारत को सच में आतंक से निजात चाहिए, तो उसे टीवी स्टूडियो के शोर को बंद करना होगा, और दुनिया को अपनी बात समझाने के लिए कूटनीतिक और खुफिया कुशलता दिखानी होगी। सिर्फ बम फोड़ने से कुछ नहीं होता। युद्ध से ज़्यादा असरदार होता है विवेकपूर्ण कार्रवाई। भारत को अब छाती पीटना बंद कर, विवेक का इस्तेमाल करना होगा। तभी कश्मीर के फूल फिर से खिल सकेंगे।

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