ओम थानवी-
मुक्तिबोध के निधन (11 सितम्बर, 1964) को पूरे साठ साल हो गए। इस प्रसंग में मुक्तिबोध को अज्ञेय की श्रद्धांजलि का एक आलेख उनकी अपनी लिखाई में प्रस्तुत है।’माध्यम’ पत्रिका में यह विदा-लेख “आत्मा के मित्र को स्नेहांजलि” शीर्षक से छपा था।
जब मुक्तिबोध एम्स, दिल्ली में रोगशैय्या पर थे, उन्हीं दिनों में अज्ञेय को भी दिल का दौरा पड़ा था। अज्ञेय अपने प्रिय कवि को देखने एम्स गए। लेखकों की माँग पर प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने इलाज की उचित व्यवस्था की थी। अशोक वाजपेयी और श्रीकांत वर्मा हरदम सेवा में थे। पर मुक्तिबोध को नहीं बचाया जा सका। निगम बोधघाट पर अंतिम विदा देने अज्ञेय भी गए। बाद में जो शोकसभा हुई उसमें अज्ञेय नहीं जा सके, पर उनका यह आलेख सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने सभा में पढ़ा था।
इस आलेख का महत्त्व इसलिए भी है कि अज्ञेय और मुक्तिबोध को लेकर बहुत झूठ फैलाया जाता रहा है। बरसों पहले कलकत्ता (कोलकाता) में अज्ञेय के एक भाषण के बीच एक युवक ने अचानक उठकर कहा कि आपके हाथों में मुक्तिबोध का ख़ून लगा है।
अज्ञेय, जैसा कि स्वभाव था, संयत रहे। उन्होंने इतना ही कहा कि “यह तो हिंदी साहित्य का इतिहास बताएगा कि मैंने मुक्तिबोध को कितना मान दिया। हमारे संबंध बहुत आत्मीय थे। मैं उनकी कविताओं का प्रशंसक रहा हूँ। पता नहीं ऐसी बात आप कैसे कह रहे हैं। यह विचार ही अपने आप में क्रूर, वीभत्स और बेमानी है।” (स्वदेश भारती, अपने अपने अज्ञेय)
अज्ञेय ने 1943 में जो तार सप्तक संपादित किया, उसमें मुक्तिबोध अव्वल कवि थे। कविताएँ (और किताब छपवाने के लिए सातों कवियों में तय चंदा) मंगाने को लिखे गए अज्ञेय के पत्र दिलचस्प हैं। एक लम्बा पत्र तो रेलगाड़ी के भोजनयान से लिखा गया। तब अज्ञेय और मुक्तिबोध मंच पर साथ कविता पढ़ने जाते थे। प्रभाकर माचवे ने लिखा है कि मुक्तिबोध की चिकित्सा के दौरान अज्ञेय चुपचाप आर्थिक सहायता कर आए थे।
अज्ञेय के जीवनीकार अक्षय मुकुल के अनुसार अज्ञेय ने ज्ञानपीठ को पत्र लिखकर तार सप्तक की रॉयल्टी का एक भाग मुक्तिबोध की पत्नी शांताजी के नाम करने को कहा था। मुकुल लिखते हैं, “दोनों (कवियों) का मिज़ाज अलग था, लेकिन उनमें आपस में कोई बैर-भाव न था।”
पढ़ें अज्ञेय की हस्तलिपि में “आत्मा के मित्र” को वह दुर्लभ “स्नेहांजलि”।







