मनोज अभिज्ञान-
सोचिए कि आप सिर्फ सोचें और सोशल मीडिया पर वह सब टाइप होता जाए, जो आप सोच रहे हैं! दिलचस्प है न? लेकिन नामुमकिन नहीं। ब्रेन चिप तकनीक की मदद से भविष्य में ऐसा संभव है।
एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक की ब्रेन चिप तकनीक दुनिया भर के करीब 12 मरीजों में लगाई जा चुकी है। इसकी शुरुआत नोलैंड आर्बॉघ नाम के शख्स से हुई थी। 2024 में यह चिप उनके दिमाग में सर्जिकल रोबोट की मदद से इम्प्लांट की गई थी। नोलैंड एक एक्सीडेंट के बाद कंधों से नीचे तक लकवाग्रस्त हो गए थे और उनके लिए सामान्य जीवन लगभग नामुमकिन हो गया था। लेकिन न्यूरालिंक की चिप ने उनको फिर से उम्मीद दी। अब वे बिना किसी की मदद के कंप्यूटर चला सकते हैं, वीडियो गेम खेल सकते हैं, ऑनलाइन पढ़ाई कर सकते हैं और कुछ इलेक्ट्रॉनिक चीजें भी नियंत्रण में रख सकते हैं।
न्यूरालिंक की चिप में हजारों सूक्ष्म इलेक्ट्रोड होते हैं, जो दिमाग की कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स से जुड़ जाते हैं। जब भी व्यक्ति मन में कोई क्रिया सोचता है, तो ब्रेन में बनने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को यह चिप पकड़ लेती है। फिर मशीन लर्निंग और एआई सॉफ्टवेयर की मदद से उन सिग्नल्स को डिजिटल कमांड में बदला जाता है। ऐसे में अगर मरीज सिर्फ ‘सोच’ ले कि माउस का कर्सर दाईं ओर जाए, तो वास्तव में कर्सर स्क्रीन पर दाईं ओर ही चला जाएगा। नोलैंड ने घंटों तक गेम खेले, शतरंज ऑनलाइन खेली और कंप्यूटर का इस्तेमाल किया, वह भी बिना अपने हाथ-पैर हिलाए, केवल सोच के दम पर।
शुरुआत में कुछ चुनौतियां भी आईं। डिवाइस के लगभग 85 फीसदी थ्रेड्स दिमाग से बाहर निकल गए थे, जिससे कुछ समय तक सिस्टम का नियंत्रण सही नहीं रहा। लेकिन इंजीनियरों ने इसे फिर से कैलिब्रेट किया और नोलैंड ने फिर अधिकतर फंक्शनालिटी हासिल कर ली।
न्यूरालिंक की टीम मशीन को और अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने में जुटी है। इस बीच, कंपनी लगातार नए देशों में अपनी तकनीक का विस्तार कर अपनी क्लिनिकल ट्रायल टीमों में मरीजों की संख्या बढ़ा रही है। 2025 तक अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात में ट्रायल चल रहे हैं। कंपनी का लक्ष्य है कि साल के अंत तक और 20-30 मरीजों को इम्प्लांट लगाया जाए। इसके लिए न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर—जैसे लकवा या ALS से पीड़ित लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है ताकि वे अपने विचारों से डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकें।
यह डिवाइस पूरी तरह से वायरलेस है और इसे सर्जिकल रोबोट की मदद से दिमाग में लगाया जाता है, जिससे बाहरी तारों की जरूरत नहीं पड़ती। अब तक जितने मरीजों को चिप लगाई गई है, उन्होंने इसकी मदद से 15,000 घंटे से भी ज्यादा समय के लिए डिवाइस का इस्तेमाल किया है और हर दिन इसे औसतन 10 घंटे तक चलाया गया है।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि यह तकनीक अभी विकास के दौर में है, पूरी तरह से परखी नहीं गई है और आगे इसे बहुत सावधानी व सतर्कता के साथ ही बाजार में लाया जा सकेगा। इसमें नैतिक और मेडिकल सुरक्षा समेत ढेरों चुनौतियां बाकी हैं—जैसे डाटा की प्राइवेसी, लंबे वक्त का असर, लागत आदि। इसके बावजूद, नोलैंड जैसे मरीजों के लिए न्यूरालिंक ने उम्मीद की नई किरण पैदा की है। वे अब अपने जीवन में कुछ नया करने, पढ़ाई और कारोबार जैसे कामों के बारे में सोच सकते हैं। एक समय जो बातें केवल साइंस-फिक्शन में मुमकिन लगती थीं, न्यूरालिंक के ज़रिए आज की हकीकत बन रही हैं।
न्यूरालिंक आने वाले समय में कई बड़े और दिलचस्प कदम उठाने की तैयारी में है। कंपनी का सबसे बड़ा लक्ष्य है कि वह 2031 तक 20,000 लोगों में अपनी ब्रेन-चिप इम्प्लांट कर सके और इस तकनीक से 1 अरब डॉलर से ज्यादा का रेवेन्यू हासिल करे। इसके लिए कंपनी पांच बड़े क्लीनिक खोलने की योजना बना रही है जहां न्यूरालिंक की अलग-अलग तीन डिवाइस—‘टेलीपैथी’, ‘ब्लाइंडसाइट’, और ‘डीप’—सामने लाई जाएंगी। ‘टेलीपैथी’ नाम की डिवाइस लकवा व बाकी गंभीर बीमारियों के मरीजों को दिमाग से कंप्यूटर या मशीन कंट्रोल करने की सुविधा देगी। ‘ब्लाइंडसाइट’ उन लोगों के लिए है जो देख नहीं सकते, ताकि उन्हें दृष्टि वापस मिल सके। ‘डीप’ नामक डिवाइस पार्किंसन और कंपकंपी जैसी बीमारियों का इलाज करने के लिए बनी जा रही है।
कंपनी ने 2029 तक अमेरिका से अपनी टेलीपैथी डिवाइस के लिए रेगुलेटरी मंजूरी पाने का टारगेट रखा है और हर साल 2,000 इम्प्लांटेशन की योजना पर काम हो रहा है। साथ ही, रोबोटिक आर्म और नर्व डिसऑर्डर से पीड़ित मरीजों के लिए एक नई स्टडी ‘CONVOY’ भी शुरू की गई है, जिसमें मरीज विचारों से आर्टिफिशियल रोबोटिक आर्म चला पाएंगे।
भविष्य में न्यूरालिंक का सपना यही नहीं थमेगा। कंपनी मेमोरी ट्रांसफर, ब्रेन-टू-ब्रेन कम्युनिकेशन, ब्रेन से मशीन और मशीन से ब्रेन कनेक्शन, और यहां तक कि डिजिटल दुनिया को सीधे दिमाग से एक्सेस करने जैसी तकनीकों की दिशा में रिसर्च कर रही है। आगे चलकर इसका इस्तेमाल लकवाग्रस्त लोगों को बोलने में मदद, नजर लौटाने, मेमोरी या भाषा स्किल को डायरेक्ट ब्रेन में ‘डाउनलोड’ करने के लिए भी किया जा सकता है। हालांकि ये सब अब भी रिसर्च और डेवेलपमेंट के स्तर पर हैं, लेकिन हर इम्प्लांट के साथ यह भविष्य थोड़ा और करीब आता दिख रहा है।
तकनीक की तेज़ी से बढ़ती दुनिया में न्यूरालिंक जैसी खोजें निश्चित ही चौंकाती हैं। इंसान का मन ही उसके लिए सबसे बड़ी ताकत है, और अब मशीनें उस ताकत को पकड़ कर उसे बाहर लाने लगी हैं। यह सब देखकर रोमांच होता है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इंसान को हर हाल में मशीनों का सहारा लेकर जीवन को खींचते जाना चाहिए? क्या स्वाभाविक जीवन, उसकी सीमाओं और उसकी समाप्ति सहित, अधिक सहज और पूर्ण नहीं है?
मृत्यु को अक्सर भय के रूप में देखा जाता है, लेकिन सच यह है कि वह जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। हर जीवित प्राणी का अंत तय है। अगर हम उसे रोकने या टालने की जिद करेंगे, तो क्या वास्तव में हम जीवन का असली अनुभव ले पाएंगे? मृत्यु विराम है, अवसर है, नए जीवन चक्र के लिए जगह बनाने का। इसे वरदान कहना भी गलत नहीं होगा, क्योंकि इसी के कारण जीवन का महत्व बना रहता है।
इसलिए यह ज़रूरी है कि तकनीक की खोजों के बावजूद मनुष्य को उसके स्वाभाविक जीवन के साथ जीने दिया जाए। बीमारी और पीड़ा में राहत देने की कोशिशें सही हैं, लेकिन अमरत्व या कृत्रिम विस्तार की होड़ शायद मनुष्य को और अधिक कृत्रिम बना देगी। जीवन की सुंदरता उसकी अपूर्णता और सीमितता में ही है। जब हम इस सच को स्वीकार कर लेते हैं, तभी जीवन वास्तव में अर्थपूर्ण लगता है।
तकनीक की तेज़ी से बढ़ती दुनिया में न्यूरालिंक जैसी खोजें निश्चित ही चौंकाती हैं। इंसान का मन ही उसके लिए सबसे बड़ी ताकत है, और अब मशीनें उस ताकत को पकड़ कर उसे बाहर लाने लगी हैं। यह सब देखकर रोमांच होता है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इंसान को हर हाल में मशीनों का सहारा लेकर जीवन को खींचते जाना चाहिए? क्या स्वाभाविक जीवन, उसकी सीमाओं और उसकी समाप्ति सहित, अधिक सहज और पूर्ण नहीं है?
मृत्यु को अक्सर भय के रूप में देखा जाता है, लेकिन सच यह है कि वह जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। हर जीवित प्राणी का अंत तय है। अगर हम उसे रोकने या टालने की जिद करेंगे, तो क्या वास्तव में हम जीवन का असली अनुभव ले पाएंगे? मृत्यु विराम है, अवसर है नए जीवन चक्र के लिए जगह बनाने का। इसे वरदान कहना भी गलत नहीं, क्योंकि इसी के कारण जीवन का महत्व बना रहता है।
इसलिए यह ज़रूरी है कि तकनीक की खोजों के बावजूद मनुष्य को उसके स्वाभाविक जीवन के साथ जीने दिया जाए। बीमारी और पीड़ा में राहत देने की कोशिशें सही हैं, लेकिन अमरत्व या कृत्रिम विस्तार की होड़ शायद मनुष्य को और अधिक कृत्रिम बना देगी। जीवन की सुंदरता उसकी अपूर्णता और सीमितता में ही है। जब हम इस सच को स्वीकार कर लेते हैं, तभी जीवन वास्तव में अर्थपूर्ण लगता है।
तकनीक की तेज़ी से बढ़ती दुनिया में न्यूरालिंक जैसी खोजें निश्चित ही चौंकाती हैं। इंसान का मन ही उसके लिए सबसे बड़ी ताकत है, और अब मशीनें उस ताकत को पकड़ कर उसे बाहर लाने लगी हैं। यह सब देखकर रोमांच होता है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इंसान को हर हाल में मशीनों का सहारा लेकर जीवन को खींचते जाना चाहिए? क्या स्वाभाविक जीवन, उसकी सीमाओं और उसकी समाप्ति सहित, अधिक सहज और पूर्ण नहीं है?
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